जब से सरकार ने ऐलान किया है कि वो संसद का आकार बढ़ाने वाला बिल लेकर आ रही है, जिसे लोकसभा सीटों की संख्या 543 से बढ़कर 850 हो जाएगी, तब से हंगामा मचा हुआ. विपक्षी दल कह रहे कि सीटों के पुनर्निर्धारण का जो आधार है वो दक्षिणी राज्यों के लोकसभा में प्रतिनिधित्व को कम कर सकता है. कई नेता तो यहां तक दावा कर रहे कि परिसीमन के बाद दक्षिण भारत का राजनीतिक वजूद खतरे में पड़ जाएगा. विपक्ष का नैरेटिव यह था कि जिन राज्यों ने जनसंख्या नियंत्रण में बेहतरीन काम किया है, उन्हें लोकसभा में कम सीटें देकर ‘सजा’ दी जाएगी, जबकि उत्तर भारत के राज्यों का दबदबा बढ़ जाएगा. लेकिन अब केंद्र सरकार के शीर्ष सूत्रों ने इन सभी आशंकाओं और राजनीतिक दावों को सिरे से खारिज कर दिया है. सरकार ने स्पष्ट किया है कि आगामी परिसीमन के बाद भी राज्यों के बीच लोकसभा सीटों का अनुपात बिल्कुल वैसा ही रहेगा, जैसा आज है. केंद्र के एक नए और बेहद पारदर्शी ’50 प्रतिशत फॉर्मूले’ ने दक्षिण राज्यों की चिंताओं को पूरी तरह से दूर कर दिया है. तो कहानी है क्या…
परिसीमन का मतलब जनसंख्या के आधार पर चुनाव क्षेत्रों की सीमाओं का फिर से निर्धारण करना. दक्षिण भारतीय राज्यों जैसे तमिलनाडु, केरल, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश आदि की सबसे बड़ी चिंता यह थी कि 1970 के दशक के बाद से उन्होंने परिवार नियोजन और जनसंख्या नियंत्रण को सख्ती से लागू किया. इसके विपरीत, उत्तर भारत के राज्यों जैसे उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश में जनसंख्या तेजी से बढ़ी है. विपक्षी नेताओं का तर्क था कि अगर केवल मौजूदा जनसंख्या जैसे 2011 या आगामी जनगणना के आधार पर लोकसभा सीटों का बंटवारा हुआ, तो उत्तर भारत की सीटें बेतहाशा बढ़ जाएंगी और दक्षिण भारत की हिस्सेदारी संसद में सिकुड़ जाएगी. विपक्ष इसे ‘उत्तर बनाम दक्षिण’ का राजनीतिक मुद्दा बनाकर केंद्र सरकार पर हमलावर था.
केंद्र सरकार का ‘50% फॉर्मूला’ है जवाब
उच्च सरकारी सूत्रों ने स्पष्ट किया है कि दक्षिणी राज्यों को परिसीमन से किसी भी प्रकार का नुकसान नहीं होगा. सरकार ने जो समाधान निकाला है, वह बेहद सीधा और न्यायसंगत है. मौजूदा अनुपात को हर हाल में बनाए रखा जाएगा. राज्यों के बीच सीटों के अनुपात में कोई भी बदलाव नहीं होगा.
फॉर्मूला यह है कि लोकसभा की कुल सीटें करीब 50 प्रतिशत बढ़ाकर 850 के आसपास कर दी जाएंगी. इसके साथ ही, हर राज्य की मौजूदा सीटों में भी उसी अनुपात में 50 प्रतिशत की वृद्धि की जाएगी. यानी, जिस राज्य का आज लोकसभा में जितना प्रतिशत प्रतिनिधित्व है, परिसीमन के बाद भी उसका प्रतिशत बिल्कुल उतना ही रहेगा. न किसी का राजनीतिक कद घटेगा और न ही किसी को अनुचित लाभ मिलेगा.
समझिए कैसे दूर हुआ दक्षिण का नुकसान
अगर परिसीमन पूरी तरह से केवल 2011 की जनगणना के आधार पर होता, तो दक्षिण और पूर्वी राज्यों को भारी नुकसान उठाना पड़ता. लेकिन नए ‘50% आनुपातिक फॉर्मूले’ से उनकी सीटें काफी बढ़ जाएंगी. इसे राज्यों के हिसाब से समझते हैं.
- तमिलनाडु: तमिलनाडु के पास वर्तमान में लोकसभा की 39 सीटें हैं. अगर परिसीमन सिर्फ 2011 की जनगणना के आधार पर होता, तो उसे केवल 49 सीटें मिलतीं, जिससे उसका राष्ट्रीय अनुपात गिर जाता. लेकिन भारत सरकार के सभी राज्यों का हिस्सा आनुपातिक रूप से 50% बढ़ाने के फॉर्मूले के अनुसार, अब तमिलनाडु के पास 59 सीटें होंगी.
- कर्नाटक: कर्नाटक में अभी लोकसभा की 28 सीटें हैं. 2011 के जनसंख्या आंकड़ों के आधार पर यह संख्या 41 होती. लेकिन नए 50% वृद्धि फॉर्मूले के लागू होने पर, कर्नाटक के खाते में अब 42 सीटें आएंगी.
- आंध्र प्रदेश : आंध्र प्रदेश में वर्तमान में 25 लोकसभा सीटें हैं. सिर्फ 2011 की जनगणना को आधार मानने पर राज्य को 33 सीटें मिलतीं. लेकिन केंद्र सरकार के नए आनुपातिक फॉर्मूले के तहत, अब आंध्र प्रदेश के पास 37 सीटें होंगी.
- केरल: केरल जनसंख्या नियंत्रण में सबसे आगे रहा है. वर्तमान में इसके पास 20 सीटें हैं. 2011 के फॉर्मूले से उसे मात्र 23 सीटें मिलतीं, जो उसके लिए सबसे बड़ा नुकसान होता. लेकिन 50% आनुपातिक वृद्धि के फॉर्मूले से अब केरल की लोकसभा सीटें बढ़कर 30 हो जाएंगी.
- तेलंगाना: तेलंगाना के पास मौजूदा समय में 17 सीटें हैं. पुरानी जनगणना (2011) के आधार पर इसे 24 सीटें मिलतीं. नए फॉर्मूले के तहत इसमें और वृद्धि होगी और राज्य के पास अब 25 सीटें होंगी.
- ओडिशा: पूर्वी राज्य ओडिशा में अभी लोकसभा की 21 सीटें हैं. 2011 की जनगणना के आधार पर इसे 28 सीटें दी जातीं. लेकिन नए 50% आनुपातिक वृद्धि फॉर्मूले के अनुसार, अब ओडिशा के पास 31 सीटें होंगी.
संघीय ढांचे को मजबूती मिलेगी
सरकारी सूत्रों का यह बयान विपक्ष के उन तमाम दावों का करारा जवाब माना जा रहा है, जो परिसीमन को लेकर भ्रम और क्षेत्रीय असंतोष पैदा करने की कोशिश कर रहे थे. सूत्रों ने स्पष्ट किया कि परिसीमन का उद्देश्य किसी विशेष राज्य या क्षेत्र को लाभ या नुकसान पहुंचाना नहीं है, बल्कि भारत के बढ़ते लोकतंत्र को और अधिक प्रतिनिधित्वपूर्ण बनाना है.
वर्तमान में एक सांसद पर औसतन 25 से 30 लाख की आबादी का भार है. लोकसभा की क्षमता बढ़ाकर 850 करने से एक सांसद के लिए अपने क्षेत्र की जनता तक पहुंचना और विकास कार्य करना अधिक आसान हो जाएगा. यही कारण है कि नई संसद भवन की लोकसभा में 888 सांसदों के बैठने की व्यवस्था की गई है, जो सरकार की इसी दूरदर्शी योजना का हिस्सा है.

