नई दिल्ली: पॉलिटिक्स में टाइमिंग का बहुत महत्व होता है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार ने महिला आरक्षण बिल को डीलिमिटेशन (परिसीमन) के साथ जोड़कर एक ऐसी बिसात बिछाई है, जिसने विपक्ष को कशमकश में डाल दिया है. पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु जैसे राज्यों में होने वाले चुनावों से ठीक पहले इस मुद्दे को हवा देना महज एक इत्तेफाक नहीं है. यह एक गहरी और सोची-समझी रणनीति का हिस्सा है. इस कदम के जरिए बीजेपी ने न केवल महिला वोटर्स को साधने की कोशिश की है, बल्कि भविष्य के चुनावी विमर्श की रूपरेखा भी तय कर दी है.
भारतीय राजनीति में पिछले एक दशक में महिला वोटर्स एक निर्णायक ब्लॉक बनकर उभरी हैं. पुरुषों की तुलना में महिलाएं अब अधिक निरंतरता और स्पष्टता के साथ वोट कर रही हैं. पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों में हमने देखा है कि कैसे कल्याणकारी योजनाओं के प्रति भरोसे ने सत्ता की चाबी महिलाओं के हाथ में थमा दी. मोदी सरकार इसी भरोसे को अब एक बड़े और स्थायी ढांचे में बदलना चाहती है.
विपक्ष के लिए यह बिल ‘धर्मसंकट’ क्यों बन गया है?
कुछ साल पहले जब यह बिल संसद में आया था, तब विपक्ष ने सरकार का मजाक उड़ाया था. तब कहा गया था कि जनगणना और परिसीमन के बिना इसे लागू करना मुमकिन नहीं है. विपक्ष का तर्क था कि इसके लिए 2034 तक इंतजार करना होगा. लेकिन अब केंद्र सरकार ने इस प्रक्रिया को फास्ट-ट्रैक पर डालने के संकेत देकर विपक्ष के तर्कों की हवा निकाल दी है.
अब विपक्षी पार्टियों के सामने एक अजीब स्थिति है. वे इस बिल का विरोध नहीं कर सकतीं क्योंकि ऐसा करने पर उन पर ‘महिला विरोधी’ होने का ठप्पा लग जाएगा. वहीं, अगर वे बिना शर्त समर्थन करती हैं, तो सारा श्रेय प्रधानमंत्री मोदी और बीजेपी को चला जाएगा.
संसद में इस बार क्या यह बिल पास हो पाएगा?
अगर बिल पास हो जाता है, तो यह उनकी ऐतिहासिक जीत होगी. अगर बिल किसी संसदीय समिति में फंसता है या विपक्ष के कारण रुकता है, तो बीजेपी इसे महिला वोटर्स के बीच एक बड़े चुनावी मुद्दे के रूप में ले जाएगी. वे कह पाएंगे कि हमने तो कोशिश की, लेकिन विपक्ष ने महिलाओं का रास्ता रोक दिया.
क्या परिसीमन से दक्षिण भारत के राज्यों का दबदबा कम हो जाएगा?
- इस पूरे गेमप्लान का दूसरा और सबसे जटिल हिस्सा परिसीमन है. यह वह जगह है जहां चुनावी अंकगणित संघीय राजनीति से टकराता है.
- तमिलनाडु और केरल जैसे दक्षिण भारतीय राज्यों को लंबे समय से यह डर सता रहा है कि अगर जनसंख्या के आधार पर सीटों का निर्धारण हुआ, तो उनकी ताकत कम हो जाएगी.
- इन राज्यों ने जनसंख्या नियंत्रण में बेहतरीन काम किया है. अब उन्हें लग रहा है कि अच्छे शासन के लिए उन्हें सजा दी जा रही है और उत्तर भारतीय राज्यों को अधिक जनसंख्या के लिए अधिक सीटें मिलेंगी.
- केंद्र सरकार ने इस डर को खत्म करने के लिए एक तकनीकी और राजनीतिक काट निकाली है. सरकार लोकसभा की सीटों को बढ़ाकर लगभग 850 करने का प्रस्ताव दे रही है.
- तर्क यह है कि किसी भी राज्य की सीटें कम नहीं होंगी, बल्कि सभी की बढ़ेंगी. इस मॉडल के तहत तमिलनाडु की सीटें 39 से बढ़कर 59, केरल की 20 से बढ़कर 30 और कर्नाटक की 28 से बढ़कर 42 हो सकती हैं.
सरकार का नैरेटिव सीधा है कि प्रतिनिधित्व बढ़ रहा है, तो नुकसान का डर कैसा?
मोदी सरकार के मास्टरस्ट्रोक की इनसाइड स्टोरी: महिला आरक्षण बिल का पूरा गेमप्लान. (PTI Photo)
क्या तमिलनाडु और बंगाल में बीजेपी का यह जादू चलेगा?
राजनीति सिर्फ आंकड़ों का खेल नहीं है, यह सापेक्ष शक्ति (Relative Power) का मामला है. तमिलनाडु में डीएमके इसी मुद्दे पर सरकार को घेर रही है. उनका कहना है कि भले ही उनकी सीटें बढ़ जाएं, लेकिन कुल लोकसभा में उनका प्रतिशत कम हो सकता है. इससे राष्ट्रीय स्तर पर उनकी आवाज कमजोर हो जाएगी. डीएमके इसे ‘केंद्र बनाम राज्य’ की लड़ाई बना रही है. वे इसे क्षेत्रीय गौरव और भाषाई पहचान से जोड़कर पेश कर रहे हैं.
वहीं पश्चिम बंगाल में स्थिति अलग है. वहां बीजेपी का मुकाबला ममता बनर्जी से है, जिन्होंने महिलाओं के लिए ‘लक्ष्मी भंडार’ जैसी कई योजनाएं चला रखी हैं. बीजेपी इस नेशनल बिल के जरिए ममता के उस महिला वोट बैंक में सेंध लगाना चाहती है. वे यह दिखाना चाहते हैं कि दीदी ने केवल योजनाएं दीं, लेकिन मोदी जी सम्मान और भागीदारी दे रहे हैं.
क्या 2029 की तैयारी अभी से शुरू हो चुकी है?
देखा जाए तो यह एक लंबी रेस का हिस्सा है. न तो महिला आरक्षण और न ही परिसीमन तुरंत चुनावी नतीजे बदल देंगे. इनका असली असर 2029 के बाद दिखेगा जब लोकसभा का पूरा स्वरूप बदल चुका होगा. लेकिन बीजेपी ने आज इन मुद्दों को छेड़कर भविष्य की पिच तैयार कर दी है. वे चाहते हैं कि आने वाले सालों में बहस उन्हीं के द्वारा तय किए गए मुद्दों पर हो.
विपक्ष फिलहाल प्रक्रियात्मक और संवैधानिक चिंताओं में उलझा है. उनकी दलीलें मजबूत हो सकती हैं, लेकिन जनता के बीच उन्हें समझाना मुश्किल है. दूसरी ओर, बीजेपी के पास एक सरल संदेश है- ‘अधिक महिलाएं, अधिक सीटें, और मजबूत भारत.’ यह मुकाबला दो अलग-अलग नजरियों के बीच है. एक तरफ विस्तार और सुधार की कहानी है, तो दूसरी तरफ संतुलन और संघीय ढांचे की सुरक्षा का सवाल है. आने वाले चुनावों में यह देखना दिलचस्प होगा कि जनता किस कहानी पर ज्यादा भरोसा करती है.

