Business
oi-Oneindia Staff
Tata
Group
News:
देश
के
सबसे
भरोसेमंद
कॉरपोरेट
हाउस
टाटा
ग्रुप
में
इन
दिनों
अंदरूनी
हलचल
तेज़
है।
Tata
Trusts
की
गवर्नेंस
पर
उठे
सवाल
और
शक्ति
संघर्ष
अब
सीधे
केंद्र
सरकार
तक
पहुंच
चुके
हैं।
रिपोर्ट्स
के
मुताबिक,
हालात
इतने
गंभीर
हो
गए
कि
गृहमंत्री
अमित
शाह
और
वित्त
मंत्री
निर्मला
सीतारमण
को
खुद
दखल
देना
पड़ा।
दरअसल,
टाटा
ट्रस्ट्स,
जो
टाटा
संस
जिसके
पास
करीब
66%
शेयर
हैं
और
यह
ग्रुप
की
सबसे
बड़ी
शेयरधारक
इकाई
है,
उसके
अंदर
हाल
के
महीनों
में
पावर,
नॉमिनेशन
और
डिसिजिन
मेकिंग
प्रक्रिया
को
लेकर
टकराव
बढ़
गया
है।
इसी
आंतरिक
कलह
को
शांत
करने
के
लिए
केंद्र
सरकार
ने
कदम
उठाया
है।

बिजनेस
वर्ल्ड
पर
छपे
एक
आलेख
के
मुताबिक,
केंद्रीय
गृह
मंत्री
अमित
शाह
और
वित्त
मंत्री
निर्मला
सीतारमण
ने
टाटा
ट्रस्ट
के
अध्यक्ष
नोएल
टाटा,
उपाध्यक्ष
वेनु
श्रीनिवासन
और
टाटा
संस
के
चेयरमैन
एन.
चंद्रशेखरन
जैसे
शीर्ष
अधिकारियों
से
मुलाकात
की।
करीब
45
मिनट
चली
इस
अहम
बैठक
में
सरकार
ने
साफ
संदेश
दिया
कि
टाटा
समूह
की
स्थिरता
सिर्फ
एक
कॉरपोरेट
मसला
नहीं,
बल्कि
राष्ट्रीय
महत्व
का
विषय
है।
माना
जा
रहा
है
कि
शाह
और
सीतारमण
ने
स्पष्ट
निर्देश
दिए
हैं
कि
टाटा
ट्रस्ट्स
में
चल
रही
किसी
भी
गवर्नेंस
गड़बड़ी
को
जल्द
से
जल्द
सुलझाया
जाए,
ताकि
समूह
की
साख
पर
कोई
असर
न
पड़े।
बड़ी
बातें:
इस
मामले
से
संबंधित
कुछ
मुख्य
बिंदु
इस
प्रकार
है
जो
अभी
तक
के
घटनाक्रम
को
बयां
करती
है।
-
टाटा
ट्रस्ट्स
और
टाटा
संस
के
बीच
नियंत्रण
को
लेकर
खींचतान
जारी। -
सरकार
ने
ट्रस्ट्स
के
प्रमुख
सदस्यों
को
तलब
किया। -
शाह
और
सीतारमण
ने
समूह
में
स्थिरता
बनाए
रखने
के
दिए
निर्देश। -
कॉर्पोरेट
जगत
में
इसे
अब
“बोर्डरूम
से
पावर
रूम
तक”
की
लड़ाई
माना
जा
रहा
है।
क्या
है
विवाद
की
जड़?
बताया
जा
रहा
है
कि
इस
पूरे
विवाद
की
जड़
टाटा
ट्रस्ट्स
के
भीतर
बने
दो
धड़े
हैं।
इनमें
से
एक
है
स्टेटस-क्वो
कैंप
जो
चीजों
को
यथावत
रखना
चाहता
है
और
दूसरा
रिफॉर्मिस्ट
कैंप
जो
सुधार
चाहता
है।
स्टेटस
क्वो
कैंप
(Status
Quo
Camp)
इस
धड़े
का
नेतृत्व
नोएल
टाटा
कर
रहे
हैं,
जो
रतन
टाटा
के
सौतेले
भाई
हैं।
इनके
साथ
हैं
इंडस्ट्री
के
वरिष्ठ
चेहरे
वेनु
श्रीनिवासन
और
पूर्व
नौकरशाह
विजय
सिंह।
इनका
मानना
है
कि
बदलाव
धीरे-धीरे
और
परंपरा
के
अनुरूप
होना
चाहिए।
यह
समूह
स्थिरता
को
प्राथमिकता
देता
है
और
नियामक
अस्थिरता
के
दौर
में
प्रयोग
से
बचने
की
सलाह
देता
है।
रिफॉर्मिस्ट
कैंप
(Reformist/Dissenters)
दूसरी
ओर
हैं
मेहली
मिस्त्री,
अनुभवी
बैंकर
प्रमित
झावेरी,
जहांगीर
एच.सी.
जहांगीर
और
कानूनी
विशेषज्ञ
दारियस
खंबाटा।
यह
धड़ा
बोर्ड
में
नए
नामों
और
विविध
पेशेवर
पृष्ठभूमि
वाले
डायरेक्टर
जोड़ने
की
मांग
कर
रहा
है।
इनका
तर्क
है
कि
टाटा
संस
को
वैश्विक
और
रेगुलेटरी
माहौल
में
आगे
बढ़ने
के
लिए
ताज़ा
सोच
और
संरचनात्मक
बदलाव
की
जरूरत
है।
वर्तमान
स्थिति
3-4
के
अनुपात
में
बंटी
हुई
है
–
यानी
टाटा
ट्रस्ट्स
जैसी
एकमत
इकाई
के
लिए
यह
डेडलॉक
की
स्थिति
है।
आरबीआई
का
दबाव:
लिस्टिंग
बनाम
डीरजिस्ट्रेशन
भारतीय
रिजर्व
बैंक
(RBI)
ने
इस
विवाद
को
और
जटिल
बना
दिया
है।
RBI
ने
Tata
Sons
को
“Upper
Layer
NBFC”
(Non-Banking
Financial
Company)
के
रूप
में
वर्गीकृत
किया
है,
जिसके
तहत
इसे
तय
समय
सीमा
में
स्टॉक
मार्केट
में
लिस्ट
होना
अनिवार्य
है।
लेकिन
दूसरी
ओर
Tata
Sons
ने
खुद
को
NBFC
श्रेणी
से
डीरजिस्टर
कराने
का
आवेदन
दिया
है,
ताकि
यह
नियम
लागू
न
हो।
कंपनी
का
तर्क
है
कि
वह
एक
होल्डिंग
कंपनी
है,
न
कि
फाइनेंशियल
संस्थान
–
इसलिए
NBFC
के
नियम
उस
पर
लागू
नहीं
होने
चाहिए।
इस
बीच,
शापूरजी
पालोनजी
ग्रुप
(SP
Group),
जिसके
पास
18.37%
हिस्सेदारी
है,
लिस्टिंग
के
पक्ष
में
है,
क्योंकि
इससे
उसे
बड़ी
नकद
राहत
मिल
सकती
है।
यानी,
अब
यह
विवाद
तीन
स्तरों
पर
है
–
नियामक
दबाव,
शेयरहोल्डर
हित
और
ट्रस्ट-स्तरीय
गवर्नेंस।
सरकार
की
मध्यस्थता
स्थिति
बिगड़ती
देख
भारत
सरकार
ने
हस्तक्षेप
का
फैसला
किया
है।
सूत्रों
के
मुताबिक,
अमित
शाह
और
निर्मला
सीतारमण
की
नोएल
टाटा,
वेनु
श्रीनिवासन,
एन.
चंद्रशेखरन
और
दारियस
खंबाटा
से
बैठक
तय
है।
मकसद
है
दोनों
पक्षों
को
समझौते
की
ओर
लाना
और
टाटा
समूह
की
स्थिरता
सुनिश्चित
करना।
यह
हस्तक्षेप
इसलिए
अहम
है
क्योंकि
टाटा
ग्रुप
भारत
की
अर्थव्यवस्था
में
लगभग
7%
BSE
मार्केट
कैपिटलाइजेशन
का
प्रतिनिधित्व
करता
है।
समूह
में
9
लाख
से
ज्यादा
कर्मचारी,
100
से
अधिक
देशों
में
उपस्थिति,
और
टाटा
स्टील,
टाटा
मोटर्स,
TCS,
टाइटन,
टाटा
पावर
जैसे
दिग्गज
ब्रांड
शामिल
हैं।
एन.
चंद्रशेखरन
की
“टाइटरोप
वॉक”
बीच
में
फंसे
हैं
एन.
चंद्रशेखरन
(चंद्रा)
–
टाटा
संस
के
चेयरमैन,
जिन्होंने
समूह
को
हाल
के
वर्षों
में
मुनाफे
और
विस्तार
की
नई
ऊंचाई
दी।
वे
किसी
पक्ष
में
खुलकर
नहीं
हैं।
तटस्थ
भूमिका
निभा
रहे
हैं
ताकि
समूह
की
दैनिक
गतिविधियां
प्रभावित
न
हों।
हालांकि,
लंबे
समय
तक
जारी
यह
गतिरोध
उनके
लिए
भी
चुनौतियां
पैदा
कर
सकता
है।
लिस्टिंग
पर
फंसा
सारा
खेल
लिस्टिंग
समर्थक
मानते
हैं
कि
पब्लिक
मार्केट्स
में
आने
से
पारदर्शिता
बढ़ेगी,
निवेशकों
का
भरोसा
मजबूत
होगा
और
रणनीतिक
फैसले
तेज
होंगे।
विरोधी
पक्ष
का
कहना
है
कि
इससे
ट्रस्ट
की
परोपकारी
भावना
और
दीर्घकालिक
दृष्टि
पर
“क्वार्टरली
नतीजों
का
दबाव”
हावी
हो
जाएगा।
RBI
का
रुख
निर्णायक
साबित
हो
सकता
है
–
यदि
डीरजिस्ट्रेशन
का
अनुरोध
खारिज
होता
है,
तो
लिस्टिंग
अनिवार्य
हो
जाएगी।
पुरानी
गूंज,
नया
टकराव
यह
संकट
2016
में
सायरस
मिस्त्री
विवाद
की
याद
दिलाता
है।
फर्क
सिर्फ
इतना
है
कि
तब
मामला
व्यक्तित्वों
के
टकराव
का
था,
और
अब
यह
संरचनात्मक
गवर्नेंस
मॉडल
की
दिशा
तय
करने
वाला
संघर्ष
है।
दोनों
पक्षों
में
दारियस
खंबाटा,
मेहली
मिस्त्री,
प्रमित
झावेरी
बनाम
नोएल
टाटा,
वेनु
श्रीनिवासन
और
विजय
सिंह
जैसे
अनुभवी
और
प्रभावशाली
चेहरे
हैं।
आगे
क्या
रास्ते
हैं?
समझौते
की
कोशिशें:
सरकार
दोनों
धड़ों
के
बीच
बोर्ड
अपॉइंटमेंट
पर
समझौता
करा
सकती
है।
स्वतंत्र
मध्यस्थता:
किसी
वरिष्ठ
कॉरपोरेट
लीडर
या
पूर्व
न्यायाधीश
की
निगरानी
में
समाधान
निकाला
जा
सकता
है।
RBI
का
निर्णय:
यदि
डीरजिस्ट्रेशन
अस्वीकार
होता
है,
तो
लिस्टिंग
अनिवार्य
होगी।
डेडलॉक
जारी:
लंबे
गतिरोध
से
समूह
की
निवेश
और
अधिग्रहण
योजनाएं
प्रभावित
हो
सकती
हैं।
यह
सिर्फ
एक
बोर्डरूम
विवाद
नहीं
बल्कि
यह
भारतीय
कॉरपोरेट
गवर्नेंस
का
टर्निंग
पॉइंट
है।
फिलहाल,
टाटा
ट्रस्ट्स
की
गवर्नेंस
पर
यह
संकट
भारत
की
कॉर्पोरेट
दुनिया
में
एक
बड़ा
सवाल
खड़ा
कर
रहा
है।
इस
बीच
यक्ष
प्रश्न
यह
है
कि
क्या
सरकार
का
यह
हस्तक्षेप
भविष्य
में
अन्य
बड़े
बिज़नेस
समूहों
के
लिए
नई
मिसाल
बनेगा
और
इस
बीच
यह
समझा
जा
रहा
है
कि
आने
वाले
हफ्तों
में
टाटा
ग्रुप
का
हर
कदम
भारत
की
कॉरपोरेट
दिशा
तय
करेगा।
(स्रोत:
बिजिनेस
वर्ल्ड
में
प्रकाशित
रुहैल
अमीन
के
आर्टिकल
पर
आधारित)
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