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धान की रोपाई के बाद किसानों को खैरा रोग से सतर्क रहने की जरूरत है. कृषि वैज्ञानिकों के अनुसार यह रोग मुख्य रूप से जिंक की कमी के कारण होता है, जिससे पत्तियां पीली और बाद में कत्थई होकर सूखने लगती हैं. समय पर जिंक सल्फेट और यूरिया का घोल बनाकर छिड़काव करने से इस रोग पर प्रभावी नियंत्रण पाया जा सकता है.
इस समय धान की रोपाई का काम चल रहा है. बारिश के मौसम में रोपाई के बाद फसल में रासायनिक उर्वरकों का इस्तेमाल किया जाएगा. इसके साथ ही कीट और रोग नियंत्रण के लिए भी कई दवाओं का प्रयोग किया जाता है. इन्हीं रोगों में धान का सबसे प्रमुख खैरा रोग है. यह रोग धान की पत्तियों को प्रभावित करता है. इसकी वजह से पत्तियां पहले पीली पड़ती हैं और बाद में सूख जाती हैं. इससे पौधे का विकास रुक जाता है. ऐसे में किसानों को अभी से इसके प्रति सतर्क रहने की जरूरत है. जैसे ही पौधे जड़ पकड़ें, फसल की नियमित निगरानी करें, खैरा रोग के लक्षणों की पहचान करें और समय रहते इसका उपचार करें. आज हम जानेंगे कि खैरा रोग क्या होता है और इसका प्रभावी निदान कैसे किया जा सकता है.
कैसे दूर करें खैरा रोग
कृषि वैज्ञानिक डॉ. ए.के. सिंह ने बताया कि अगर आपके धान के खेत में खैरा रोग के लक्षण दिखाई दे रहे हैं, तो 5 किलोग्राम जिंक सल्फेट को 20 किलोग्राम यूरिया के साथ मिलाकर 1000 लीटर पानी में घोल तैयार करें और प्रति हेक्टेयर की दर से धान की फसल पर छिड़काव करें. इस उपाय से धान के पौधों में खैरा रोग का प्रभाव कम हो जाता है और फसल के विकास में किसी तरह की रुकावट नहीं आती.
क्या होता है खैरा रोग
कृषि विज्ञान केंद्र, सुलतानपुर में कार्यरत कृषि वैज्ञानिक डॉ. ए.के. सिंह ने लोकल 18 से बातचीत में बताया कि खैरा रोग मुख्य रूप से मिट्टी में पोषक तत्वों, विशेषकर जिंक की कमी के कारण होता है. कई क्षेत्रों की मिट्टी में जिंक की कमी होने के चलते धान की फसल में बुवाई के 20-25 दिन बाद ही खैरा रोग के लक्षण दिखाई देने लगते हैं. जिन खेतों की मिट्टी में क्षारीयता (Alkalinity) और कैल्शियम की मात्रा अधिक होती है, वहां धान की खेती में खैरा रोग का खतरा बढ़ जाता है. इस रोग से प्रभावित पौधों की पत्तियां हल्के भूरे और लाल रंग की पड़ने लगती हैं, इसलिए इसकी समय पर पहचान करना बेहद जरूरी है.
खैरा रोग के लक्षण
डॉ. ए.के. सिंह ने बताया कि धान की फसल में खैरा रोग का प्रकोप होने पर पत्तियों पर पहले हल्के पीले रंग के धब्बे दिखाई देते हैं, जो बाद में कत्थई रंग के हो जाते हैं. इस रोग से प्रभावित धान का पौधा बौना रह जाता है और उसकी जड़ें भी कत्थई रंग की दिखाई देने लगती हैं. ऐसे लक्षण दिखाई देते ही तुरंत उपचार करना चाहिए, क्योंकि समय पर नियंत्रण नहीं होने पर पौधों की वृद्धि रुक जाती है.
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विवेक कुमार एक सीनियर जर्नलिस्ट हैं, जिन्हें मीडिया में 10 साल का अनुभव है. वर्तमान में न्यूज 18 हिंदी के साथ जुड़े हैं और हरियाणा, उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड की लोकल खबरों पर नजर रहती है. इसके अलावा इन्हें देश-…और पढ़ें

