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बालाघाट में 100 साल से ज्यादा समय तक नैरोगेज ट्रेन सेवाएं चलती रही. फिर 1997 में तत्कालीन रेल मंत्री राम विलास पासवान ने ब्रॉडगेज रेल लाइन का शिलान्यास किया था. ब्रॉडगेज संघर्ष समिति के राष्ट्रीय अध्यक्ष अनूप सिंह बैस ने बताया कि उस समय यात्रा के समय के समय को कम करने के लिए ब्रॉडगेज की मांग की गई थी. ऐसे में तब शहर बंद से लेकर युवाओं ने आत्मदाह की चेतावनी भी दी थी.
प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी ने 17 जुलाई को हरियाणा से देश भर के 13 रेलवे स्टेशनों का लोकार्पण किया. इसमें मध्य प्रदेश के तीन रेलवे स्टेशन शामिल था. इसमें बालाघाट, नैनपुर और छिंदवाड़ा शामिल है. यह स्टेशन सरकार ने अमृत भारत स्टेशन योजना के तहत उनका कायाकल्प हुआ है. बालाघाट जबलपुर संभाग का एक अहम रेलवे स्टेशन है. यहाँ पर आठ करोड़ की लागत से इसका जीर्णोद्धार हुआ. ऐसे में स्थानीय प्रतिनिधि सहित लोग भी मौजूद रहे. लेकिन क्या आपको पता है कि बालाघाट के रेलवे स्टेशन का इतिहास क्या है. कैसे इसमें बदलाव आए है.
1899 में हुई थी शुरुआत
भारत में पहली सन 16 अप्रैल 1853 में ट्रेन ठाने से पुणे तक चली थी. इसमें 34 किलोमीटर का सफर 1 घंटे 15 में पूरा हुआ था. इस इतिहास के गवाह बने थे 400 यात्री, जो इस ट्रेन में सवार थे. इसके ठीक 46 साल बाद बालाघाट से भी ट्रेन चलाने की योजना शुरू हुई थी. इसमें बालाघाट की कनेक्टिवीटी जबलपुर तक जोड़ने की तैयारी थी. वहीं, 1901 में यह सेवा शुरु हुई थी. पहली बार 10001 सतपुड़ा एक्सप्रेस चली थी. तब नैरोगेज चली थी. तब नैरोगेज ट्रेन चला करती थी, जिसे लोग छूक-छूक ट्रेन के नाम से भी जानते हैं. बालाघाट से जबलपुर जाने में करीब 8 घंटे लगते थे. इसके बावजूद इस ट्रेन को अनूठा गौरव प्राप्त था. दरअसल, नैरोगेज लाइन की सबसे तेज ट्रेन बालाघाट में ही चलती थी.
फिर ऐसी ही चली थी एक शताब्दी तक सेवाएं
बालाघाट में 100 साल से ज्यादा समय तक नैरोगेज ट्रेन सेवाएं चलती रही. फिर 1997 में तत्कालीन रेल मंत्री राम विलास पासवान ने ब्रॉडगेज रेल लाइन का शिलान्यास किया था. ब्रॉडगेज संघर्ष समिति के राष्ट्रीय अध्यक्ष अनूप सिंह बैस ने बताया कि उस समय यात्रा के समय के समय को कम करने के लिए ब्रॉडगेज की मांग की गई थी. ऐसे में तब शहर बंद से लेकर युवाओं ने आत्मदाह की चेतावनी भी दी थी. ऐसे धीरे-धीरे अलग-अलग क्षेत्रों में नैरोगेज ब्रॉडगेज में बदलती रही.
ऐसे बदली पूरी तस्वीर
पहले खंड में बालाघाट से महाराष्ट्र के गोंदिया के बीच साल 2005 -06 के बीच नैरोगेज से ब्रॉडगेज बनी. यह पहला मौका था जब बालाघाट नेशनल रेल नेटवर्क से जुड़ा था. फिर पहली बार गया-चेन्नई सेंट्रल फेस्टिवल स्पेशल ट्रेन गेज के बदलने के बाद चलने वाली पहली यात्री ट्रेन बनी.
फिर दूसरे फेज में 6 मई 2010 को बालाघाट से कटंगी तक नैरोगेज को ब्रॉडगेज में बदला गया. फिर उसी समय कटंगी से तिरोड़ी रेल लाइन का प्रस्ताव भी शामिल हुआ. इस 12 किलोमीटर रेल लाइन की कनेक्टिविटी के बाद महाराष्ट्र के नागपुर तक का सटीक रास्ता तैयार हुआ. लेकिन विकास की राह में जिन किसानों की जमीन की कीमत तो मिली लेकिन वादे के मुताबिक रेलवे में नौकरी मिलने वाली थी उससे भी वह वंचित रह गए.
23 साल बाद पूरी हुई ब्रॉडगेज रेल
1997 में जब तत्कालीन रेल मंत्री रामविलास पासवान ने बालाघाट-जबलपुर रेल लाइन को नैरोगेज से ब्रॉडगेज में परिवर्तन की परियोजना को मंजूरी दी, तब इस परियोजना को पूरा होने में दो दशक से भी ज्यादा का समय लगा. यह काम 7 फेज में पूरा हुआ. इसकी तेजी के लिए अनूप सिंह बैंस के नेतृत्व में ब्रॉडगेज रेल संघर्ष समिति ने कई बार प्रदर्शन किए और कई बार ज्ञापन भी सौंपे. आखिर में 25 दिसंबर 2020 से यह बालाघाट और जबलपुर से ब्रॉडगेज की ट्रेन शुरु हुई.
अब चल रही इतनी ट्रेनें
बालाघाट में 6 लोकल ट्रेनें चल रही है. कटंगी-तिरोड़ी और नागपुर की ओर जाने वाली तीन ट्रेन शामिल है. वहीं, गोंदिया की ओर जाने वाली एक ट्रेन है. वहीं, जबलपुर के लिए महज एक ही ट्रेन है. इसके अलावा रायपुर जाने के लिए भी यहां पर कनेक्टिविटी है. इसके अलावा गया-चेन्नई सेंट्रल फेस्टिवल स्पेशल, रीवा-इतवारी स्पेशल, जबलपुर-चंदा फोर्ट इंटरसिटी एसएफ स्पेशल ट्रेनें बालाघाट के यात्रियों को सुविधा मिल रही है.
ट्रेनों की लेटलतीफी से परेशान लेकिन डबल की आस
बालाघाट में ट्रेनें कई घंटे की देरी से चलती है. इससे स्कूल, कॉलेज, अस्पताल और अपनी नौकरी पर जाने वाले लोग काफी परेशान होते हैं. लेकिन अब डबल रेल लाइन का प्रस्ताव पास हुआ है. लेकिन पूरा कब होगा इसकी कोई डेडलाइन तय नहीं है. जब बालाघाट से जबलपुर जब नैरोगेज थी तब दो दशक का समय लगा था. ऐसे में ट्रेनों की लेटलतीफी की समस्या से कब मुक्ति मिलेगी. इसका जवाब वक्त ही बताएगा.

