तेजेंदर सिंह सोढ़ी.
आसमान की ऊंचाइयों पर प्लेन उड़ाने वाले जांबाज ही जब दहशतगर्दी की राह पर चल निकलें, तो दुनिया का सहमना वाजिब है. हाल ही में फ्लाईदुबई के विमान में ओमान के को-पायलट ने 174 यात्रियों की जान खतरे में डालते हुए प्लेन पर कब्जा करने की खौफनाक कोशिश की, जिसे भारतीय कैप्टन स्मित मच्छार ने अपनी जान पर खेलकर नाकाम कर दिया. लेकिन यह कोई पहला वाकया नहीं है. करीब तीन दशक पहले, अमेरिका से कमर्शियल पायलट की ट्रेनिंग ले चुके कश्मीर के नदीम खाताब ने भी ओमानी पायलट की तर्ज पर आसमान की उड़ान छोड़कर आतंकवाद का खूनी रास्ता चुना था और अल-बद्र का आतंकी बन गया था. दोनों के रास्ते अलग थे, लेकिन मकसद मासूमों की जान लेना था. यह हैरान करने वाली सच्चाई साबित करती है कि बेहतरीन एजुकेशन और ग्लोबल एक्सपोजर भी किसी को कट्टरपंथ से नहीं बचा सकता.
करीब तीन दशक पहले नादिम खतीब की कहानी इससे बिल्कुल उलट दिशा में गई थी. वह अमेरिका में प्रशिक्षित कमर्शियल पायलट था. वह फ्लाइट इंस्ट्रक्टर भी बना. उसके पास पढ़ाई थी, पेशा था और विदेश में करियर का मौका था. लेकिन बाद में वो पाकिस्तान गया और अल-बद्र से जुड़ गया. हथियार प्रशिक्षण के बाद वह कश्मीर में आतंकवाद से जुड़ा. इन दोनों कहानियों के बीच कोई संबंध नहीं है. दोनों की परिस्थितियां भी अलग थीं. लेकिन दोनों घटनाएं एक बड़ा सवाल जरूर सामने लाती हैं. आखिर ऐसा क्या होता है कि कोई व्यक्ति अपनी शिक्षा, पेशे और भविष्य को छोड़कर हिंसा की राह चुन लेता है?
कहानी पलटकर करीब 30 साल पीछे जाती है
अब आते हैं नादिम खतीब पर. खतीब का जन्म 1967 में श्रीनगर में हुआ था. उनके पिता इनायतुल्लाह खतीब सरकारी इंजीनियर थे. उन्होंने श्रीनगर के टिंडेल बिस्को स्कूल में पढ़ाई की. इसके बाद उनका लक्ष्य विमान उड़ाना बना. 1990 के दशक की शुरुआत में वह प्लेन उड़ाने की ट्रेनिंग के लिए अमेरिका गए. जॉर्जिया के एक फ्लाइंग स्कूल से उन्होंने वाणिज्यिक पायलट का प्रशिक्षण लिया. इसके बाद वह उसी संस्थान में फ्लाइट इंस्ट्रक्टर भी बने. यहां कहानी का यह हिस्सा खास है. खतीब केवल विमान उड़ाना सीखने वाला छात्र नहीं था. वह दूसरों को भी विमान उड़ाने की ट्रेनिंग दे रहा था. उसके पास वह करियर था जिसे हासिल करने के लिए हजारों लोग सपना देखते हैं.
फिर अमेरिका से पाकिस्तान तक कैसे पहुंची कहानी?
बाद में खतीब का झुकाव इस्लामी उग्रवादी विचारधारा की ओर बढ़ा. हालांकि उसके कट्टरपंथी बनने की पूरी व्यक्तिगत प्रक्रिया के बारे में सार्वजनिक रिकॉर्ड सीमित हैं. बाद में वह अमेरिका छोड़कर पाकिस्तान पहुंचा. वहां उपलब्ध विवरणों के मुताबिक वह अल-बद्र से जुड़ा. इस संगठन का नाम जम्मू-कश्मीर में सशस्त्र उग्रवाद से जुड़ा रहा है. बताया जाता है कि खतीब ने वहां हथियार चलाने की ट्रेनिंग ली. इसके बाद वह जम्मू-कश्मीर लौटा और सशस्त्र गतिविधियों में शामिल हुआ. यानी जिस व्यक्ति की जिंदगी कॉकपिट और फ्लाइट स्कूल के आसपास घूम रही थी, उसकी दिशा अब पूरी तरह बदल चुकी थी.
परिवार को भी नहीं थी पूरी जानकारी
खतीब की कहानी का एक और पहलू बेहद चौंकाने वाला है. उसके परिवार को शुरुआत में उसके इस बदलाव की जानकारी नहीं थी. उसने परिवार को यह बताया था कि वह अमेरिका लौटकर एयरलाइन में नौकरी तलाशने जा रहा है. परिवार को लगा कि वह अपने विमानन करियर को आगे बढ़ा रहा है. लेकिन वह पाकिस्तान पहुंच चुका था और अल-बद्र के प्रशिक्षण ढांचे में शामिल हो चुका था. यानी एक तरफ परिवार उसके करियर की कल्पना कर रहा था. दूसरी तरफ वह हथियारों का प्रशिक्षण ले रहा था. यहीं से कहानी का सबसे कठिन सवाल सामने आता है. क्या परिवार, दोस्त और समाज हमेशा पहचान पाते हैं कि कोई व्यक्ति अंदर से बदल रहा है?
पढ़ाई और करियर भी हमेशा सुरक्षा कवच नहीं
नादिम खतीब की कहानी इसलिए चर्चा में आती है क्योंकि वह उस आम धारणा को चुनौती देती है कि आतंकवाद या कट्टरपंथ सिर्फ अशिक्षा और बेरोजगारी से जुड़ा होता है. खतीब शिक्षित था. उसके पास पेशेवर प्रशिक्षण था. उसने विदेश में समय बिताया था. उसके पास करियर था. वह अमेरिका में काम कर रहा था. फिर भी उपलब्ध विवरणों के मुताबिक वह उग्रवादी संगठन से जुड़ गया. इसका मतलब यह नहीं कि शिक्षा या रोजगार की कोई भूमिका नहीं होती. सामाजिक जुड़ाव, परिवार, रोजगार और बेहतर शिक्षा कई परिस्थितियों में सुरक्षा कवच की तरह काम कर सकते हैं. लेकिन कोई भी एक चीज कट्टरपंथ के खिलाफ गारंटी नहीं है.
कट्टरपंथ की प्रक्रिया कई स्तरों पर काम कर सकती है. इसमें विचारधारा, पहचान, राजनीतिक असंतोष, व्यक्तिगत अनुभव, सामाजिक नेटवर्क और प्रचार जैसी चीजें शामिल हो सकती हैं. हर व्यक्ति की कहानी अलग होती है. इसलिए किसी एक उदाहरण से पूरी प्रक्रिया का निष्कर्ष निकालना भी सही नहीं होगा.
एक कॉकपिट में जान बचाने की जंग, दूसरे में जिंदगी का उलटफेर
यहीं दोनों कहानियों का सबसे बड़ा विरोधाभास सामने आता है. सिमट मक्छार के सामने संकट आया तो उन्होंने अपने ट्रेनिंग और जिम्मेदारी का इस्तेमाल यात्रियों की सुरक्षा के लिए किया. खुद घायल होने के बावजूद उन्होंने विमान को बचाने की कोशिश की. नादिम खतीब के मामले में कहानी दूसरी दिशा में गई. उन्होंने विमानन का करियर छोड़ दिया और हथियारबंद संगठन का हिस्सा बन गए. एक व्यक्ति ने संकट में अपने पेशे की जिम्मेदारी निभाई. दूसरे ने अपने पेशे से दूरी बनाकर हिंसक संघर्ष का रास्ता चुना. दोनों कहानियों का समय अलग है. परिस्थितियां अलग हैं. मंशाएं भी अलग थीं. इसलिए इन्हें एक जैसा मामला नहीं माना जा सकता. लेकिन तुलना से एक बड़ा सवाल जरूर निकलता है.
आखिर कट्टरपंथ की शुरुआत कहां से होती है?
यही सवाल आज की दुनिया के लिए सबसे महत्वपूर्ण है. कोई व्यक्ति अचानक एक दिन कट्टरपंथी नहीं बन जाता. कई मामलों में विचार धीरे-धीरे प्रभाव डालते हैं. इंटरनेट, प्रचार, सामाजिक संपर्क, पहचान का संकट और किसी विचारधारा से जुड़ने की चाह इसमें भूमिका निभा सकती है. लेकिन हर मामले में कारण एक जैसे नहीं होते. इसलिए किसी व्यक्ति के पेशे, शिक्षा या आर्थिक स्थिति के आधार पर उसके भविष्य के व्यवहार का अनुमान नहीं लगाया जा सकता. नादिम खतीब का मामला यही दिखाता है कि पेशेवर सफलता भी किसी व्यक्ति की विचारधारा को हमेशा तय नहीं करती.
खतीब का अंत कैसे हुआ?
उपलब्ध ऐतिहासिक विवरणों के मुताबिक नादिम खतीब 1990 के दशक के अंत में जम्मू-कश्मीर में सशस्त्र गतिविधियों से जुड़ा था. 21 फरवरी 1999 को उसकी सुरक्षा बलों के साथ मुठभेड़ में मौत हो गई. उपलब्ध स्रोत इस मुठभेड़ को तत्कालीन उधमपुर जिले के गोल क्षेत्र से जोड़ते हैं. वह करीब 32 वर्ष का था. उस समय तक उसके परिवार के सामने उसकी जिंदगी की वास्तविक दिशा सामने आ चुकी थी. जिस बेटे के अमेरिका में विमानन करियर की उम्मीद की जा रही थी, वह हथियारबंद उग्रवाद से जुड़ चुका था.
दो पायलटों की कहानी से क्या समझ आता है?
सिमट मक्छार और नादिम खतीब की कहानियां लगभग तीन दशक के अंतर से सामने आती हैं. एक कहानी कॉकपिट में साहस की है. दूसरी विचारधारा के प्रभाव में जीवन बदलने की. मक्छार ने उस समय अपने प्रशिक्षण और जिम्मेदारी को प्राथमिकता दी, जब उनके सामने जान का खतरा था. नादिम खतीब के बारे में उपलब्ध रिकॉर्ड बताते हैं कि उन्होंने विमानन की दुनिया छोड़कर हथियारबंद संगठन का रास्ता चुना. इन दोनों घटनाओं के बीच कोई ज्ञात संबंध नहीं है. इसलिए तुलना का मतलब दोनों को एक ही श्रेणी में रखना नहीं है.
असल सवाल इससे बड़ा है
एक पायलट को वर्षों की ट्रेनिंग के बाद सैकड़ों लोगों की सुरक्षा की जिम्मेदारी मिलती है. लेकिन उस व्यक्ति की निजी विचारधारा और मानसिक दुनिया को सिर्फ उसके पेशे से नहीं समझा जा सकता. यही वजह है कि कट्टरपंथ को समझने की कोशिश सिर्फ शिक्षा, नौकरी या आर्थिक स्थिति तक सीमित नहीं रह सकती. आज कॉकपिट में बैठा कोई पायलट अपनी ट्रेनिंग के मुताबिक संकट में लोगों की जान बचा सकता है. वहीं इतिहास यह भी दिखाता है कि किसी व्यक्ति की विचारधारा उसके पेशे से बिल्कुल अलग दिशा ले सकती है. सिमट मक्छार की कहानी बताती है कि संकट के बीच पेशेवर जिम्मेदारी कितनी महत्वपूर्ण होती है. नादिम खतीब की कहानी बताती है कि कट्टरपंथ किसी व्यक्ति की बनाई हुई पूरी जिंदगी को किस तरह बदल सकता है.

