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Kargil Vijay Diwas: तोलोलिंग में जीत के बाद भारतीय जांबाजों को ऐसा लगा कि वह दुश्मन की गोलियों से तो बच गए, लेकिन भूख और प्यास उनकी जान ले लेगी. इसी बीच, पाकिस्तानी किचन में मेवों की खीर संग कराची हलवे की दावत और जहरीली बर्फ ने पूरे घटनाक्रम को नया मोड़ दे दिया. कारगिल के युद्ध से जुड़ा क्या है यह दिलचस्त और रोमांचक मामला, जानने के लिए पढ़ें आगे…
पाकिस्तानी किचन में भारतीय जांबाजों का जश्न और जहरीली बर्फ की परत… बड़ी दिलचस्त है यह कहानी. (एआई इमेज)
Kargil Vijay Diwas: कारगिल युद्ध की पहली जीत तोलोलिंग की चोटियों पर भारतीय सैनिकों का इंतजार कर रही थी. वहीं, भारतीय जांबाजों ने भी यह फैसला कर लिया था कि इस बार चाहे जो भी हो, वह तोलोलिंग पर भारतीय परचम लहरा कर ही रहेंगे. दुश्मन से मुकाबले के दौरान गोला-बारूद कम ना पड़े, लिहाजा भारतीय जांबाजों ने अपने बैग में खाने की जगह गोलियां और हैंडग्रेनेड भर लिए थे. इसके बाद, तय हुआ कि भारतीय सैनिकों की टीम पहले दुश्मनों पर हमला करेगी. तोलोलिंग पर कब्जे के बाद दूसरी टीम रसद और दवाइयां लेकर मौके पर पहुंचेगी. पूरी रात और दिन की लड़ाई के बाद भारतीय जांबाजों ने दुश्मन के ज्यादातर सैनिकों को मार गिराया. इस लड़ाई में जो बचे वह मौका छोड़ भाग खड़े हुए.
इस लड़ाई का हिस्सा रहे कैप्टन अखिलेश सक्सेना बताते हैं कि भारतीय जांबाजों ने कारगिल युद्ध की पहली जीत दर्ज करने के बाद तोलोलिंग की चोटी पर भारतीय तिरंगा फहरा दिया. दुश्मन ने कभी सपने में भी नहीं सोचा था कि लगभग असंभव सी दिखने वाली यह लड़ाई भारतीय सेना जीत लेगी. इसी बौखलाहट में पाकिस्तानी सेना ने तोलोलिंग की चोटी और उसके जुड़ने वाले सभी इलाकों में शेलिंग कर गोलों की बरसात कर दी थी. उस समय आसमान से सिर्फ आग और लोहा ही बरस रहा था. इसका नतीजा यह हुआ कि भारतीय जवानों की जो टीम खाने का समान लेकर आने वाली थी, वह रास्ते में ही अटक गई. इधर, बीते 24 घंटे से भूखे प्यासे जवान एक-एक बूंद पानी के लिए तरस रहे थे.
एक बार हम सभी को लगा कि दुश्मन की गोलियों से भले ही बच गए हों, लेकिन अब भूख और प्यास उनकी जान ले लेगी. चूंकि बीते 48 घंटे से भी ज्यादा समय से दोनों तरफ से शेलिंग हो रही थी. हमारी लड़ाई में सैकड़ों हैंडग्रेनेड फटे थे. गोलियों की तो लगभग बरसात सी हुई थी. लिहाजा तोलोलिंग की चोटी पर जमा बर्फ पूरी तरह से जहरीली हो चुकी थी. अब हमारे पास यह भी विकल्प नहीं था कि हम बर्फ चूस कर अपनी जान बचा सकें. – कैप्टन अखिलेश सक्सेना, कारगिल वार हीरो
और फिर पाकिस्तानी स्ट्रक्चर में दिखी जीवन की आस
- कैप्टन अखिलेश सक्सेना के अनुसार, चूंकि अब जिंदा रहने के लिए मुंह में कुछ जाना जरूरी था. हमारे जहन में यह बात भी है कि यह कितना दुर्भाग्यपूर्ण होगा कि हम दुश्मन की गोलियों से तो बच गए, लेकिन भूख और प्यास ने हमारी जान ले ली. इसके बाद, हमने यह भी तय किया कि कुछ भी हो जाए, एक भी जवान की जान भूख और प्यास से नहीं जाने देंगे.
- सबसे पहले हमने बर्फ को खोदने का फैसला किया. कुछ फीट की खुदाई के बाद हमे साफ सुथरी बर्फ मिल गई. इस बर्फ को ओठों पर लगाकर कर हमने कुछ देर जिंदा रहने का इंतजाम कर लिया. अचानक उनके दिमाग में यह ख्याल आया कि दुश्मन यहां पर तीन महीने से बैठा हुआ है. उसने अपने खाने और पीने का कुछ तो इंतजाम कर ही रखा होगा.
- दुश्मन सैनिकों के पास दवाइयां और मेडिकल का ऐसा इंतजाम भी होगा. इसी ख्याल के साथ हमने दुश्मन सैनिकों के बैग पैक और आसपास देखना शुरू किया, लेकिन सब कुछ खंगालने के बावजूद हमें कुछ नहीं मिला. इसी बची हमारी नजर दो पीक्स के बीच बने एक स्ट्रक्चर पर गई. पता नहीं हमें ऐसा क्यों लगा कि इस स्ट्रक्चर में खाने-पीने का सामान जरूर होगा.
- लेकिन उस स्ट्रक्चर तक पहुंचना इतना आसान नहीं था. सामने की चोटी पर बौखलाया दुश्मन घात लगाकर बैठा था. हम जैसे ही एक कदम बढ़ाते वह हमपर गोलियों की बरसात कर देता. अब हमारे सामने दो ही विकल्प थे, पहला दुश्मन की गोलियां से शहीद हो जाए और दूसरा भूख-प्यास से मार जाएं. हमने फिर अपने संकल्प को दोहराया कि कुछ भी भूख और प्यास से नहीं मरेंगे.
- इसके बाद, मैंने एक दूसरे अफसर के साथ मिलकर नीचे जाने का फैसला किया. हम दोनों ने अपने पीठ पर खाली बैग बांधे और स्मोक बम लेकर नीचे दौड़ना शुरू कर दिया. हमें अपनी तरफ इस तरह से दौड़ता देख दुश्मन भी चकरा गया था. उसे समझ में नहीं आया कि सिर्फ दो लोग इस तरह उनकी तरफ भागकर क्यों आ रहे हैं. जब तक वह कुछ समझता और गोली चलाता, हम स्ट्रक्चर तक पहुंच चुके थे.
पाकिस्तानी स्ट्रक्चर में छिपा था हमारी खुशी का खजाना
कैप्टन अखिलेश सक्सेना ने बताया कि जैसे ही हम उस स्ट्रक्चर में दाखिल हुए तो हमारी आंखें खुली की खुली रह गई. स्ट्रक्चर के अंदर कढ़ाई पर मेवों की खीर तैयार रखी थी. उससे आ रही केसर की खुशबू हमें अपनी तरफ खींच रही थी. पास ही, भारी तादाद में ड्राईफ्रूट्स और कराची हलवा रखा हुआ था. इस स्ट्रक्चर में घायल जवानों के लिए दवाई भी मौजूद थीं. दरअसल, दुश्मन यह मानकर बैठा था कि बीते कुछ अटैंप्ट की तरह इस बार भी भारतीय सेना उन तक नहीं पहुंच पाएगी. लड़ाई खत्म करने के बाद उन्होंने दावत की तैयारी कर रखी थी. लेकिन इस बात बाजी पलट गई. भारतीय सेना ने दुश्मन को जहन्नुम का रास्ता दिखा दिया था. अब उनकी रसोई और खाने में भारतीय सेना का कब्जा था.
खाना तो मिल गया, लेकिन मुश्किल था मुंह तक लाना
कैप्टन अखिलेश सक्सेना बताते हैं कि खाना तो अब हमारे सामने था, लेकिन उसे मुंह तक ले जाना इतना आसान नहीं था. इसकी दो वजहें थी. पहला- हमें पता था कि दुश्मन की बंदूकें हमारी तरफ तनी हुईं हैं और हमारे बाहर निकलते ही गोलियों की बौछार शुरू हो जाएगी. दूसरा यह कि हम खाने का पहला निवाला उनको खिलाएंगे, जो युद्ध में बुरी तरह से जख्मी हो गए है. लिहाजा, हमने जितना संभव था खाना अपने बैग पैक में रखा और स्मोक बम फायर कर ऊपर की तरफ दौड़ पड़े. कुछ देर में हम अपने जवानों के साथ थे. इसके बाद, शुरू हुआ पाकिस्तानी की रसोई पर बनी मेवों की खीर, कराची हलवा, बिरियानी से भारतीय जवानों की जीत का जश्न. इसके बाद, जब तक रिइंफोर्समेंट ऊपर नहीं पहुंची, तब तक हमने पाकिस्तानी किचन में रखे खाने से अपना काम चलाया.
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Anoop Kumar Mishra is currently serving as Assistant Editor at News18 Hindi Digital, where he leads coverage of strategic domains including aviation, defence, paramilitary forces, international…
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