नई दिल्ली: 15 अगस्त पर जब लाल किले की प्राचीर से तिरंगा शान से लहराता है. जब टीवी स्क्रीन पर परेड के दौरान हर तरफ तिरंगा नजर आता है, तो मन में एक सवाल जरूर आता है कि आखिर हमारा राष्ट्रीय ध्वज बनता कैसे है? इसके तीन रंगों को कपड़े पर कैसे उतारा जाता है? अशोक चक्र की 24 तीलियों को इतनी सटीकता से कैसे तैयार किया जाता है? इन सवालों के जवाब छिपे हैं दिल्ली के सदर बाजार की उन गलियों में, जहां कई दशकों से तिरंगा बनाने का काम चल रहा है.
1962 से तिरंगा बनाने की परंपरा, तीसरी पीढ़ी भी जुटी
दिल्ली की ऐतिहासिक झंडे वाली गली में आज भी एक परिवार तीन पीढ़ियों से तिरंगा बनाने का काम कर रहा है. यहां मिले अब्दुल मालिक बताते हैं कि उनके परिवार ने 1962 में इस काम की शुरुआत की थी. उनके पिता ने तिरंगा बनाना शुरू किया और बाद में उनके बड़े भाई अब्दुल गफ्फार ने भी इस काम को आगे बढ़ाया. उन्हें फ्लैग अंकल के नाम से भी पहचान मिली लेकिन इनके निधन के बाद अब उनके भाई अब्दुल मालिक ये काम संभाल रहे हैं. एक समय ऐसा भी था जब इस परिवार ने एक दिन में करीब 1 से 1.5 लाख तिरंगे तैयार किए. आज भी यहां रोजाना हजारों तिरंगे तैयार किए जाते हैं.
छह महीने पहले शुरू हो जाती है तैयारी
मोहम्मद स्माइल ने बताया कि तिरंगा तैयार करना सिर्फ कपड़े की सिलाई का काम नहीं है. इसके लिए कई चरणों से गुजरना पड़ता है. तिरंगे के लिए कपड़ा करीब चार से छह महीने पहले मंगाया जाता है. शुरुआत में खादी के कपड़े से तिरंगा बनाया जाता था, लेकिन अब आधुनिक दौर में अलग-अलग तरह के कपड़ों का इस्तेमाल किया जाता है. सबसे पहले सादा कपड़ा यानी ग्रे कपड़ा लिया जाता है. इसे धोने और प्रोसेस करने के बाद प्रिंटिंग के लिए भेजा जाता है. इसके बाद तिरंगे के तीनों रंग कपड़े पर उतारे जाते हैं. रंग को पक्का करने के लिए उसे आगे की प्रोसेसिंग से गुजारा जाता है. इसके बाद धुलाई, फिनिशिंग और आखिर में सिलाई और पैकिंग होती है.
अशोक चक्र की 24 तीलियों पर खास नजर
तिरंगे की पहचान उसके तीन रंगों के साथ-साथ बीच में बने अशोक चक्र से भी है. यही वजह है कि अशोक चक्र को तैयार करते समय खास सावधानी बरती जाती है. इसमें 24 तीलियां होती हैं. प्रिंटिंग के दौरान इनकी सही जगह और आकार का विशेष ध्यान रखा जाता है. तिरंगा बनाने वाले कारीगरों के लिए यह सिर्फ एक डिजाइन नहीं, बल्कि देश का राष्ट्रीय ध्वज है. इसलिए प्रिंटिंग से लेकर सिलाई तक हर चरण में सटीकता का ध्यान रखा जाता है.
10 मिनट से लेकर 25 मिनट तक में तैयार होता है तिरंगा
तिरंगे का आकार जितना बड़ा होता है, उसे तैयार करने में उतना ही ज्यादा समय लगता है. छोटे 12×18 इंच के तिरंगे को तैयार करने में करीब 10 से 15 मिनट लगते हैं, जबकि बड़े आकार के झंडे को तैयार करने में 20 से 25 मिनट तक का समय लग सकता है. यहां 24×36, 36×54 और 48×72 इंच समेत अलग-अलग आकार के झंडे तैयार किए जाते हैं. ध्वजारोहण के लिए भी बड़े आकार के तिरंगे तैयार किए जाते हैं.
हजारों महिलाओं के हाथों से तैयार होता है तिरंगा
इस काम में महिलाओं की भी बड़ी भूमिका है. अब्दुल जी के मुताबिक, उनके साथ करीब 3 से 4 हजार महिलाएं काम करती हैं. इनमें लगभग 80 फीसदी महिलाएं हैं. अलग-अलग इलाकों में सामग्री पहुंचाई जाती है. जहां महिलाएं सिलाई और फिनिशिंग का काम करती हैं. यानी एक तिरंगे के पीछे सिर्फ एक मशीन या एक कारीगर नहीं, बल्कि बड़ी संख्या में लोगों की मेहनत जुड़ी होती है.
कश्मीर से कन्याकुमारी तक पहुंचता है तिरंगा
झंडे वाली गली में तैयार होने वाला तिरंगा सिर्फ दिल्ली तक सीमित नहीं रहता. यहां से देश के अलग-अलग राज्यों में तिरंगे की सप्लाई होती है. विदेशों में रहने वाले भारतीयों तक भी इन तिरंगों की पहुंच है. अब्दुल जी बताते हैं कि उनके बनाए झंडे अलग-अलग खास मौकों पर कई जगहों तक पहुंचे हैं. उनके मुताबिक, रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह के लिए भी एक बेहद बड़ा झंडा तैयार किया गया था. जिसे लखनऊ में लगाया गया था.
तीन रंगों में छिपा है देश का संदेश
तिरंगे का हर रंग अपने आप में खास संदेश देता है. केसरिया साहस और त्याग का प्रतीक है, सफेद शांति और सत्य का संदेश देता है, जबकि हरा रंग समृद्धि और हरियाली को दर्शाता है. तीनों पट्टियां बराबर होती हैं. बीच में नीले रंग का अशोक चक्र होता है.
तिरंगा बनाना हमारे खून में है
जब अब्दुल जी से पूछा गया कि उनके लिए तिरंगा बनाना सिर्फ जिम्मेदारी है या देश के प्रति प्यार, तो उनका जवाब बेहद भावुक था. उन्होंने कहा कि तिरंगा बनाना उनके खून में है. उनका मानना है कि देश की आजादी के लिए उनके बुजुर्गों ने अपना खून-पसीना दिया और इसलिए तिरंगा बनाना उनके लिए गर्व की बात है.यही जज्बा इस काम को सिर्फ रोजगार नहीं रहने देता, बल्कि इसे देशभक्ति से जोड़ देता है.
तिरंगे के साथ देशभक्ति का सामान भी तैयार
झंडे के अलावा यहां देशभक्ति से जुड़े कई सामान भी तैयार किए जाते हैं. महिलाओं के लिए तिरंगे की चूड़ियां और झुमके, बच्चों के लिए छोटे झंडे और गुब्बारे, हैंडबैग, बाइक पर लगाने वाले झंडे और दूसरे कई सामान यहां देखने को मिलते हैं.

