लखनऊ. सपा सुप्रीमो अखिलेश यादव से 27 अक्टूबर 2026 को पत्रकारों ने नगीना सांसद चंद्रशेखर आजाद की आजाद समाज पार्टी से गठबंधन को लेकर सवाल पूछा तो, उन्होंने उस पत्रकार को कहा- ‘तुम्हें क्या लेना-देना’. अखिलेश यादव का यह जवाब को केवल एक तात्कालिक प्रतिक्रिया मानकर खारिज नहीं किया जा सकता, लेकिन इसे गठबंधन का संकेत मान लेना भी जल्दबाजी होगी. इसके राजनीतिक मायने समझने के लिए तीन सवाल अहम हैं. पहला, क्या सपा दलित वोटों के बीच अपनी पहुंच बढ़ाना चाहती है? क्या चंद्रशेखर आजाद के साथ तालमेल से बसपा के पारंपरिक समर्थक वर्ग में सेंध लगाने की संभावना बनती है? और क्या यह समीकरण असदुद्दीन ओवैसी की AIMIM जैसी पार्टियों के जरिए होने वाली मुस्लिम वोटों की दावेदारी से अलग कोई राजनीतिक रास्ता खोल सकता है?
27 अक्टूबर को लखनऊ में पत्रकारों से बातचीत के दौरान अखिलेश यादव ने चंद्रशेखर आजाद के साथ गठबंधन के सवाल पर कहा, ‘बिना समझौते के हमारे नेता जीते हैं, क्यों होगा कोई समझौता किसी से?’ एक अन्य रिपोर्ट के मुताबिक, अखिलेश ने चंद्रशेखर के साथ गठबंधन को लेकर सवाल उठाते हुए कहा कि उनकी पार्टी उनके बिना भी चुनाव जीत सकती है.
इस बयान के तीन संभावित सियासी मायने निकाले जा सकते हैं.
पहला, अखिलेश यादव फिलहाल गठबंधन के लिए अपनी तरफ से कोई उत्सुकता नहीं दिखाना चाहते. दूसरा, वह चंद्रशेखर आजाद को यह संदेश दे सकते हैं कि सपा के साथ आने के लिए केवल बीजेपी विरोध का तर्क पर्याप्त नहीं होगा, बल्कि सीटों और राजनीतिक हिस्सेदारी पर भी सहमति जरूरी होगी. तीसरा, सपा नेतृत्व अपने पीडीए समीकरण को इस भरोसे के साथ पेश करना चाहता है कि पार्टी को चुनावी मजबूती के लिए हर छोटे-बड़े दल के साथ समझौता करने की जरूरत नहीं है.
उत्तर प्रदेश की राजनीति में इस संभावित समीकरण का सबसे अहम पहलू दलित राजनीति है.
चंद्रशेखर आजाद और अखिलेश क्या आएंगे साथ?
उत्तर प्रदेश की राजनीति में इस संभावित समीकरण का सबसे अहम पहलू दलित राजनीति है. कभी प्रदेश की सत्ता पर मजबूत पकड़ रखने वाली बहुजन समाज पार्टी के सामने अपना जनाधार बनाए रखने की चुनौती है. इसी राजनीतिक जगह में चंद्रशेखर आजाद की आजाद समाज पार्टी (कांशीराम) अपनी मौजूदगी बढ़ाने की कोशिश कर रही है. द इंडियन एक्सप्रेस ने फरवरी 2026 की अपनी रिपोर्ट में भी दलित वोटों के बीच नए राजनीतिक विकल्पों की तलाश को 2027 के चुनाव की एक अहम कड़ी बताया था.
आजाद समाज पार्टी से गठबंधन के फायदे
चंद्रशेखर आजाद के साथ गठबंधन होने पर सपा को तीन स्तरों पर संभावित लाभ मिल सकता है. पहला, दलित मतदाताओं तक पहुंच. चंद्रशेखर का दलित और अंबेडकरवादी राजनीति में अपना आधार है. उनके साथ गठबंधन से सपा को उन इलाकों में राजनीतिक संवाद बढ़ाने का अवसर मिल सकता है, जहां बसपा का परंपरागत प्रभाव रहा है. दूसरा, पीडीए की सामाजिक व्यापकता. सपा का पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक वर्गों को जोड़ने का राजनीतिक प्रयास किसी सहयोगी दल के जरिए नया विस्तार पा सकता है. तीसरा, सीटों पर स्थानीय तालमेल. जिन विधानसभा क्षेत्रों में दोनों दलों के समर्थकों के बीच सामाजिक और राजनीतिक मेल हो, वहां गठबंधन वोटों के बंटवारे को कम करने की कोशिश कर सकता है.
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लेकिन यहां एक अहम अंतर समझना होगा. चंद्रशेखर आजाद के समर्थकों का वोट अपने आप सपा के खाते में नहीं जाएगा और न ही बसपा के सभी मतदाता उनके साथ आने पर पाला बदल लेंगे. दलित मतदाताओं के बीच जाटव, गैर-जाटव और अन्य समुदायों की राजनीतिक प्राथमिकताएं अलग-अलग हो सकती हैं. स्थानीय उम्मीदवार, संगठन, नेतृत्व और मुद्दे भी मतदान को प्रभावित करते हैं.
ओवैसी के साथ गठबंधन में सपा की क्या मुश्किल है?
आजाद समाज पार्टी ने जुलाई 2026 में 45 विधानसभा सीटों के लिए संभावित उम्मीदवारों की पहली सूची जारी की थी. इनमें अनुसूचित जाति के 18, ओबीसी के 16 और मुस्लिम समुदाय के 10 उम्मीदवार शामिल थे. यह संकेत था कि पार्टी अपनी सामाजिक पहुंच को दलित आधार से आगे बढ़ाने का प्रयास कर रही है. असदुद्दीन ओवैसी की एआईएमआईएम और चंद्रशेखर आजाद की आजाद समाज पार्टी, दोनों की राजनीति का सामाजिक आधार और राजनीतिक प्राथमिकताएं एक जैसी नहीं हैं. इसलिए इन दोनों के साथ गठबंधन के सवाल को अलग-अलग देखना होगा.
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सपा के लिए ओवैसी के साथ गठबंधन का सवाल मुस्लिम प्रतिनिधित्व, नेतृत्व और मुस्लिम मतदाताओं के बीच राजनीतिक प्रतिस्पर्धा से जुड़ सकता है. ओवैसी पहले भी अखिलेश यादव पर मुस्लिम हितों के सवालों को लेकर निशाना साध चुके हैं. वहीं, अखिलेश ने अक्टूबर की शुरुआत में कहा था कि 2024 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी को हराने वाला सपा-कांग्रेस गठबंधन 2027 में भी जारी रहेगा. उन्होंने एआईएमआईएम के साथ गठबंधन की संभावना पर भी मौजूदा इंडिया गठबंधन का हवाला दिया था.
ऐसे में ओवैसी के साथ गठबंधन न करने की वजह को केवल मुस्लिम वोट बैंक तक सीमित करना सही नहीं होगा. इसमें नेतृत्व की प्रतिस्पर्धा, सीटों का बंटवारा, गठबंधन की मौजूदा संरचना और चुनावी रणनीति भी शामिल हैं. दूसरी तरफ, चंद्रशेखर आजाद के साथ संभावित गठबंधन सपा को दलित राजनीति के साथ अपना तालमेल बढ़ाने का विकल्प दे सकता है. इस लिहाज से दोनों नेताओं के बीच बातचीत की संभावना और उसके राजनीतिक लाभ का आकलन अलग-अलग किया जाना चाहिए.
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क्या ओवैसी की काट बन सकते हैं चंद्रशेखर आजाद?
यह सवाल इसलिए अहम है क्योंकि यूपी में विपक्षी दलों के सामने बीजेपी का मुकाबला करने के साथ-साथ अपने समर्थक वर्गों को एकजुट रखने की चुनौती भी है. हालांकि, चंद्रशेखर आजाद को सीधे ओवैसी की काट के रूप में देखना दोनों नेताओं की अलग-अलग राजनीतिक भूमिका को सीमित कर देगा. ओवैसी की राजनीति में मुस्लिम राजनीतिक प्रतिनिधित्व और AIMIM की स्वतंत्र पहचान प्रमुख है. चंद्रशेखर आजाद की राजनीति का मुख्य आधार दलित अधिकार, अंबेडकरवादी विचारधारा और सामाजिक न्याय है. उनकी पार्टी ने ओबीसी और मुस्लिम समुदायों तक भी पहुंच बढ़ाने की कोशिश की है.
अगर सपा और आजाद समाज पार्टी के बीच गठबंधन होता है, तो उसका असर उन क्षेत्रों में अधिक महत्वपूर्ण हो सकता है जहां दलित, पिछड़े और मुस्लिम मतदाताओं के बीच स्थानीय स्तर पर तालमेल संभव हो. इसके अलावा, अगर सपा चंद्रशेखर के साथ गठबंधन करती है, तो सीटों की हिस्सेदारी पर सवाल उठेंगे. चंद्रशेखर आजाद पहले ही विपक्षी दलों के साथ व्यापक गठबंधन की वकालत कर चुके हैं. अक्टूबर के आखिर में उन्होंने कहा कि गठबंधन के सभी रास्ते खुले हैं और वोटों का बंटवारा नहीं होना चाहिए. वहीं, अखिलेश यादव की ताजा टिप्पणियां फिलहाल गठबंधन को लेकर अनिच्छा दिखाती हैं.

