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Home » All News » एक बंगला जो कभी प्रधानमंत्री आवास नहीं बना, लेकिन दिलों का घर बन गया – former pm chandrashekhar birth centenary anniversary 3 south avenue lane
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एक बंगला जो कभी प्रधानमंत्री आवास नहीं बना, लेकिन दिलों का घर बन गया – former pm chandrashekhar birth centenary anniversary 3 south avenue lane

HawkNewsBy HawkNewsApril 17, 2026No Comments9 Mins Read
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Chandrashekhar Bungalow Story: भारत के पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर के जीवन से लुटियंस दिल्ली के 3 साउथ एवेन्यू लेन वाले बंगले का गहरा भावनात्मक संबंध रहा. वे 10 नवंबर 1990 से 21 जून 1991 तक देश के प्रधानमंत्री रहे, लेकिन इस दौरान उन्होंने प्रधानमंत्री आवास 7, रेसकोर्स रोड (वर्तमान में लोक कल्याण मार्ग) में शिफ्ट नहीं किया. चंद्रशेखर ने 6 मार्च 1991 को प्रधानमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया था. इसके बाद अगले प्रधानमंत्री के चुने जाने तक, यानी 21 जून 1991 तक उन्होंने पद संभाला. कुल मिलाकर वे मात्र सात महीने प्रधानमंत्री रहे. 3 साउथ एवेन्यू लेन के इस बंगले में उनकी पत्नी दूजा देवी और दोनों पुत्र पंकज तथा नीरज का बचपन बीता. यहीं दोनों पुत्रों का विवाह भी हुआ. उनके दो भाइयों के परिवार भी दशकों तक यहीं रहे. चंद्रशेखर 1960 के दशक के अंत में इस बंगले में रहने आए थे.

संयोग से आज पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर की जन्म शताब्दी है. देशभर में उनके चाहने वाले और मित्र उनके शताब्दी वर्ष को मना रहे हैं. कुछ स्रोतों के अनुसार उनका जन्म 1 जुलाई 1927 को हुआ था.

क्यों नहीं शिफ्ट किया?

चंद्रशेखर चाहते तो अकबर रोड, जनपथ या सफदरजंग रोड जैसे प्रतिष्ठित इलाकों में सरकारी बंगला आसानी से ले सकते थे. लेकिन उन्होंने दिल्ली में अंत तक 3 साउथ एवेन्यू लेन के एक सामान्य बंगले को ही अपना निवास बनाए रखा. यह बंगला आमतौर पर सांसदों के लिए आवंटित किए जाने वाले बंगलों में से एक था. यह उनके सादगीपूर्ण जीवन और जनसाधारण से गहरे जुड़ाव को दर्शाता था. साउथ एवेन्यू लेन संसद भवन और अन्य महत्वपूर्ण सरकारी भवनों के निकट स्थित है, जहां सांसदों और गणमान्य व्यक्तियों के लिए सरकारी बंगले एवं फ्लैट आवंटित किए जाते हैं. 3 साउथ एवेन्यू लेन का यह बंगला चंद्रशेखर के व्यक्तित्व का प्रतीक था – सादा, सरल और उनके समाजवादी मूल्यों से पूर्णतः मेल खाता. यहां टाइप-V या टाइप-VI श्रेणी के बंगले होते हैं, जिनमें छोटा लॉन, आवश्यक कमरे और बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध होती हैं.

1989 के लोकसभा चुनाव के बाद यह तय हुआ कि जनता दल की सरकार बनेगी. उड़ीसा भवन में हुई बैठक में तय हुआ कि देवीलाल जी प्रधानमंत्री पद के लिए नाम प्रस्तुत करेंगे और फिर खुद नाम वापस लेकर चंद्रशेखर जी का नाम आगे बढ़ाएंगे. लेकिन संसद एनेक्सी भवन में सांसदों की बैठक में देवीलाल जी ने अचानक विश्वनाथ प्रताप सिंह का नाम प्रस्तुत कर दिया. चंद्रशेखर जी के लिए यह वज्रपात जैसा था.

बंगले की पहचान चंद्रशेखर जी से

लुटियंस दिल्ली के कुछ बंगलों की पहचान उन दिग्गज महान शख्सियतों से हो जाती है जो लंबे समय तक वहां रहे. 3 साउथ एवेन्यू लेन का बंगला भी उन्हीं में से एक है. चंद्रशेखर जी के पुत्र नीरज शेखर ने एक बार बताया था, ‘उनका दिन सुबह साढ़े चार बजे शुरू होता था. वे पहले योग करते, व्यायाम करते, फिर पढ़ते और लिखते थे. रोजाना आठ-दस किलोमीटर पैदल चलते थे.’ चंद्रशेखर जी का निधन 2007 में हुआ. यहीं से उनकी अंतिम यात्रा निकली थी. उनके निधन के बाद उनके सांसद पुत्र नीरज शेखर को भी यही बंगला आवंटित हो गया.

परिवार और जनता दोनों के प्रति समर्पण

चंद्रशेखर जी के साथ लंबे समय तक काम करने वाले लेखक अनिल अत्रे बताते हैं कि वे बड़े नेता थे और पूरे देश में उनके लाखों चाहने वाले थे, फिर भी वे परिवार की संस्था में पूर्ण विश्वास रखते थे. उनके बंगले में उनका और उनके दोनों भाइयों का परिवार दशकों तक साथ रहा. सबका भोजन एक साथ बनता था. यहां वे अपने समाजवादी सहयोगियों, जनता दल के नेताओं और आम लोगों से बिना किसी औपचारिकता के मिलते थे. यह बंगला उनके ‘जननायक’ व्यक्तित्व को जीवंत रूप से दर्शाता था.

खुला मंच: 3 साउथ एवेन्यू लेन

चंद्रशेखर जी ने अपने बंगले को एक खुले मंच की तरह इस्तेमाल किया, जहां राजनीतिक चर्चाएं, सामाजिक मुद्दों पर विचार-विमर्श और ग्रामीण भारत के विकास से जुड़ी योजनाएं बनाई जाती थीं. उनकी प्रसिद्ध ‘भारत यात्रा’ (1983) के दौरान एकत्रित अनुभवों को वे इसी बंगले में बैठकर सहयोगियों के साथ साझा करते थे. कन्याकुमारी से नई दिल्ली तक 4,260 किलोमीटर की इस पैदल यात्रा ने उन्हें भारत की ग्रामीण समस्याओं और जनता की आकांक्षाओं को गहराई से समझने का अवसर दिया. चंद्रशेखर जी के घर में बलिया के रहने वाले सीएस यादव 1983 से 2007 तक केयरटेकर रहे. वे कहते हैं कि साउथ एवेन्यू का यह बंगला उस विचारधारा का प्रतीक बन गया जो चंद्रशेखर ने अपनी यात्रा और पूरे राजनीतिक जीवन में अपनाई थी.

1984 के लोकसभा चुनाव में चंद्रशेखर जी रायबरेली से हार गए थे. उस समय वे जनता पार्टी के अध्यक्ष थे. इंदिरा गांधी की हत्या के बाद कांग्रेस के पक्ष में सहानुभूति की लहर थी. कई बड़े नेता उसमें हार गए थे. चंद्रशेखर जी को अपना बंगला खाली करना था, लेकिन वे नहीं छोड़े.

राजनीतिक गतिविधियों का गढ़

दिल्ली में भोजपुरी समाज के प्रमुख अजीत दूबे दर्जनों बार 3 साउथ एवेन्यू लेन में चंद्रशेखर जी से मिलने आए. वे बताते हैं कि 1990 में जब जनता दल टूटा और चंद्रशेखर जी ने समाजवादी जनता पार्टी बनाई, तब कई महत्वपूर्ण राजनीतिक निर्णय इसी बंगले में लिए गए. उस समय राजीव गांधी के नेतृत्व वाली कांग्रेस ने चंद्रशेखर जी को समर्थन दिया था, जिसके कारण वे प्रधानमंत्री बने. इस बंगले में हुई बैठकों में उनकी अल्पकालिक सरकार की कई नीतियां और रणनीतियां तय हुईं.

हालांकि, कांग्रेस ने बाद में राजीव गांधी पर जासूसी के आरोप लगाकर समर्थन वापस ले लिया और उनकी सरकार केवल सात महीने चली. मशहूर लेखक राज खन्ना ने अपनी किताब ‘इंडिया अर्थात भारत’ में लिखा है कि चंद्रशेखर जी कहते थे, ‘कांग्रेस ने मेरी सरकार गिराने के लिए खुफिया पुलिस का बहाना बनाया. यह बहाना मुझे दबाव में लेने के लिए बनाया गया था.’

सुषमा स्‍वराज पूर्व पीएम चंद्रशेखर के साथ. (फाइल फोटो/PTI)

यादें एक्सक्लूसिव इंटरव्यू की

मुझे वर्ष 1993 में 3 साउथ एवेन्यू लेन में चंद्रशेखर जी का हिन्दुस्तान टाइम्स और हिन्दुस्तान अखबारों के लिए एक्सक्लूसिव इंटरव्यू करने का मौका मिला था. कद्दावर नेता का अकेले इंटरव्यू करना था, इसलिए कुछ घबराहट भी थी. बंगले के बाहर उनके समर्थक और फरियादी खड़े थे. मुझे इंटरव्यू वाले कमरे के बाहर बिठाया गया. कुछ देर बाद मैं चंद्रशेखर जी के सामने बैठा. इंटरव्यू शुरू होते ही हरियाणा के पूर्व मुख्यमंत्री ओम प्रकाश चौटाला भी आ गए और सोफे पर बैठ गए. चंद्रशेखर जी मेरे सवालों का जवाब विस्तार से दे रहे थे और मंद-मंद मुस्करा रहे थे. एक सवाल का जवाब देने लगे तो चौटाला जी बीच में बोलने लगे. चंद्रशेखर जी ने तुरंत उन्हें टोका- आप शांत रहिए.

इंटरव्यू समाप्त होने के बाद उन्होंने मुझसे और मेरे परिवार के बारे में संक्षिप्त जानकारी ली. कमरे से बाहर निकला तो दिल्ली कांग्रेस के वरिष्ठ नेता रमेश दत्ता मिल गए, जो चंद्रशेखर जी को अपना गुरु मानते थे. मुझे याद है कि 1995 के दिल्ली नगर निगम चुनाव में कांग्रेस ने मिन्टो रोड सीट से अपने सिटिंग पार्षद रमेश दत्ता को टिकट नहीं दिया. रमेश दत्ता ने आजाद उम्मीदवार के रूप में चुनाव लड़ा. चंद्रशेखर जी उनके समर्थन में मिन्टो रोड पहुंचे और एक पूर्व प्रधानमंत्री होने के बावजूद नगर निगम चुनाव में आजाद उम्मीदवार के लिए वोट मांगे. यह चंद्रशेखर जी ही कर सकते थे.

साउथ एवेन्यू से भोंडसी आश्रम

चंद्रशेखर जी का साउथ एवेन्यू बंगला उनके भोंडसी (गुरुग्राम, हरियाणा) स्थित भारत यात्रा आश्रम से गहराई से जुड़ा हुआ था. उन्होंने 1983 में स्थापित यह आश्रम ग्रामीण विकास और सामाजिक कार्यों के लिए समर्पित था. दिल्ली में रहते हुए वे साउथ एवेन्यू के बंगले में ठहरते थे, लेकिन अक्सर भोंडसी आश्रम में समय बिताते थे. यह आश्रम उनकी भारत यात्रा के अनुभवों पर आधारित था और उनके लिए एक वैचारिक केंद्र था. साउथ एवेन्यू का बंगला इस आश्रम का शहरी विस्तार बन गया था.

हारने के बाद भी नहीं छोड़ा बंगला

1984 के लोकसभा चुनाव में चंद्रशेखर जी रायबरेली से हार गए थे. उस समय वे जनता पार्टी के अध्यक्ष थे. इंदिरा गांधी की हत्या के बाद कांग्रेस के पक्ष में सहानुभूति की लहर थी. कई बड़े नेता उसमें हार गए थे. चंद्रशेखर जी को अपना बंगला खाली करना था, लेकिन वे नहीं छोड़े. जाने-माने पत्रकार अरविंद कुमार सिंह बताते हैं कि राजीव गांधी की पहल पर सरकार ने फैसला लिया कि लोकसभा चुनाव में जो दल के नेता हार गए हैं, उन्हें सरकारी आवास खाली करने की आवश्यकता नहीं है. इसी फैसले के कारण चंद्रशेखर जी 3 साउथ एवेन्यू लेन में रहते रहे.

जेठमलानी के साथ क्या हुआ था?

1989 के लोकसभा चुनाव के बाद यह तय हुआ कि जनता दल की सरकार बनेगी. उड़ीसा भवन में हुई बैठक में तय हुआ कि देवीलाल जी प्रधानमंत्री पद के लिए नाम प्रस्तुत करेंगे और फिर खुद नाम वापस लेकर चंद्रशेखर जी का नाम आगे बढ़ाएंगे. लेकिन संसद एनेक्सी भवन में सांसदों की बैठक में देवीलाल जी ने अचानक विश्वनाथ प्रताप सिंह का नाम प्रस्तुत कर दिया. चंद्रशेखर जी के लिए यह वज्रपात जैसा था.

इसी माहौल में राम जेठमलानी ने घोषणा की कि अगर चंद्रशेखर जी विश्वनाथ प्रताप सिंह को नेता नहीं मानते तो वे उनके आवास के सामने धरना देंगे. चंद्रशेखर जी ने उन्हें फोन कराया, लेकिन बात नहीं हो सकी. अंततः 30 नवंबर 1989 को जेठमलानी 3 साउथ एवेन्यू लेन के सामने धरने पर बैठ गए. नाराज चंद्रशेखर समर्थकों ने जेठमलानी को घेर लिया और भोजपुरी गालियों के साथ लातों-घूंसों की बौछार कर दी. अरविंद कुमार सिंह, जो घटना के प्रत्यक्षदर्शी थे, बताते हैं कि जेठमलानी ने इसकी पुलिस में शिकायत तक नहीं की.

विरासत आज भी जीवित

आज भी 3 साउथ एवेन्यू लेन के आसपास छोटी-मोटी दुकान चलाने वाले या सरकारी बंगलों में काम करने वाले लोग इस बंगले को ‘नेता जी का बंगला’ ही कहते हैं. यह बंगला चंद्रशेखर जी की सादगी, जनसेवा और अटूट जनता से जुड़ाव की अमिट विरासत को आज भी जीवित रखे हुए है.

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