India
oi-Smita Mugdha
West
Bengal
News:
पश्चिम
बंगाल
में
आगामी
विधानसभा
चुनावों
से
पहले
राज्यपाल
सी.
वी.
आनंद
बोस
का
नया
फैसला
चर्चा
में
है।
उनके
हालिया
आदेश
ने
राजनीतिक
और
सांस्कृतिक
हलकों
में
नई
चर्चा
छेड़
दी
है।
राज्यपाल
ने
अपने
आधिकारिक
पत्राचार
में
पारंपरिक
रूप
से
इस्तेमाल
होने
वाले
शब्द
‘भवदीय’
की
जगह
अब
‘वंदे
मातरम्’
लिखने
का
निर्णय
लिया
है।
कुछ
ही
महीनों
में
विधानसभा
चुनाव
हैं
और
इससे
पहले
यह
फैसला
प्रशासनिक
बदलाव
भर
नहीं
है।
यह
बंगाल
की
सांस्कृतिक
विरासत,
राष्ट्रवाद
और
चुनावी
माहौल
से
जुड़ा
एक
अहम
संकेत
भी
है।
प्रदेश
की
राजनीति
में
सांस्कृतिक
अस्मिता
और
बंगाल
के
कद्दावर
हस्तियां
हमेशा
एक
अहम
मुद्दा
रहे
हैं।

राज्यपाल
कार्यालय
की
ओर
से
जारी
किया
गया
आदेश
राज्यपाल
कार्यालय
की
ओर
से
जारी
जानकारी
के
अनुसार,
यह
फैसला
बंकिम
चंद्र
चट्टोपाध्याय
द्वारा
रचित
‘वंदे
मातरम्’
की
ऐतिहासिक
और
सांस्कृतिक
महत्ता
को
ध्यान
में
रखते
हुए
लिया
गया
है।
लोक
भवन
के
आधिकारिक
सोशल
मीडिया
हैंडल
पर
भी
इस
निर्णय
को
साझा
किया
गया
है।
West
Bengal
News:
चुनाव
से
पहले
राज्यपाल
का
अहम
आदेश
–
राज्यपाल
के
आदेश
में
बताया
गया
है
कि
लोग
इस
गीत
को
केवल
औपचारिक
आयोजनों
तक
सीमित
न
रखें,
बल्कि
अपनी
रोजमर्रा
की
जिंदगी
का
हिस्सा
बनाएं।
–
विधानसभा
चुनावों
के
मद्देनजर
यह
फैसला
इसलिए
भी
अहम
माना
जा
रहा
है
क्योंकि
‘वंदे
मातरम’
बंगाल
की
धरती
से
निकला
गीत
है।
इस
गीत
ने
स्वतंत्रता
आंदोलन
के
दौरान
देशभर
में
राष्ट्रभावना
को
मजबूती
दी
थी।
–
राजनीतिक
जानकारों
का
मानना
है
कि
राज्यपाल
का
यह
कदम
सांस्कृतिक
राष्ट्रवाद
के
विमर्श
को
और
तेज
कर
सकता
है।
शीतकालीन
सत्र
में
भी
वंदे
मातरम
पर
10
घंटे
की
लंबी
बहस
चली
थी।
Vande
Mataram
गीत
बंगाल
की
राजनीति
में
रहा
है
अहम
रोल
बंगाल
की
सियासत
में
जहां
पहले
से
ही
भाषा,
संस्कृति
और
पहचान
के
मुद्दे
हावी
रहे
हैं।
राज्यपाल
का
यह
फैसला
आने
वाले
विधानसभा
चुनावों
में
एक
नए
विमर्श
को
जन्म
दे
सकता
है।
प्रदेश
की
सियासत
में
वंदे
मातरम
का
अलग
और
भावनात्मक
स्थान
रहा
है।
गीत
के
रचनाकार
बंकिम
चंद्र
भी
बंगाल
से
थे।
बंगाली
समुदाय
के
लिए
यह
गीत
अस्मिता
और
संस्कृति
से
जुड़ाव
का
माध्यम
है।
ममता
बनर्जी
खुद
कई
बार
वंदे
मातरम
को
लेकर
भावुक
बयानबाजी
कर
चुकी
हैं।
उन्होंने
बीजेपी
पर
इसे
लेकर
राजनीति
करने
का
भी
आरोप
लगाया
है।
हाल
ही
में
‘वंदे
मातरम’
गीत
की
150वीं
वर्षगांठ
के
मौके
पर
भी
राज्यपाल
आनंद
बोस
ने
इसे
केवल
एक
गीत
नहीं,
बल्कि
देशभक्ति,
विविधता
में
एकता
और
मातृभूमि
के
प्रति
समर्पण
का
प्रतीक
बताया
था।
उन्होंने
कहा
था
कि
यह
गीत
नागरिकों
को
अपने
कर्तव्यों
के
प्रति
सजग
रहने
और
देश
की
प्रगति
में
योगदान
देने
की
प्रेरणा
देता
है।
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