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oi-Divyansh Rastogi
Ukraine War: यूक्रेन युद्ध को लेकर दुनिया भर में हलचल मची हुई है। इस बीच अमेरिका और रूस के शीर्ष अधिकारियों ने सऊदी अरब में शांति वार्ता शुरू की है, लेकिन यूक्रेन को इसमें शामिल नहीं हुआ। यह वार्ता तीन साल से चल रहे युद्ध (Russia Ukraine War) को खत्म करने की कोशिश का हिस्सा है।
यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोडिमिर जेलेंस्की (Ukraine Volodymyr Zelensky) ने इस वार्ता को पूरी तरह बेकार बताया है और कहा कि यूक्रेन के बिना शांति समझौते का कोई मतलब नहीं। वहीं, रूस ने इस बातचीत को ‘अहम कूटनीतिक कदम’ कहा है। आइए जानते हैं इस वार्ता में क्या-क्या हुआ…

सऊदी अरब में रूस-अमेरिका की शांति वार्ता में कौन-कौन शामिल?
अमेरिकी प्रतिनिधिमंडल:
- मार्को रुबियो – विदेश मंत्री
- माइक वाल्ट्ज – राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार
- स्टीव विटकॉफ – मध्य पूर्व के लिए विशेष दूत
रूसी प्रतिनिधिमंडल:
- सर्गेई लावरोव – विदेश मंत्री
- यूरी उशाकोव – पुतिन (Putin)के विदेश नीति सलाहकार
- दिमित्री रायबोलोवलेव – रूसी प्रत्यक्ष निवेश कोष (RDIF) के प्रमुख
यह बैठक रियाद के दिरियाह पैलेस में हो रही है। इसमें मुख्य रूप से यूक्रेन में युद्ध समाप्त करने और अमेरिका-रूस के तनावपूर्ण संबंधों में सुधार पर चर्चा हो रही है।
यूक्रेन की प्रतिक्रिया: जेलेंस्की ने कहा- ‘बिना हमारे कुछ नहीं होगा’
यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोडिमिर जेलेंस्की इस वार्ता से खुश नहीं हैं। उन्होंने अमेरिका पर रूस के पक्ष में रियायतें देने का आरोप लगाया और कहा कि इस वार्ता में यूक्रेन को नजरअंदाज करना एक बड़ी गलती है।
- जेलेंस्की ने कहा: “हम सिर्फ प्रशंसा पाने के लिए किसी समझौते पर हस्ताक्षर नहीं करेंगे। यह हमारे देश का भविष्य तय करेगा।”
- उन्होंने यह भी जोड़ा कि “अमेरिका से कोई स्पष्ट सुरक्षा गारंटी नहीं मिली है, जिससे यूक्रेन को भरोसा हो कि रूस दोबारा हमला नहीं करेगा।”
रूस की अमेरिका से उम्मीद और ट्रंप-पुतिन मुलाकात की संभावना
रूस के सॉवरेन वेल्थ फंड के प्रमुख किरिल दिमित्रिएव ने इस वार्ता को सकारात्मक बताया और उम्मीद जताई कि अमेरिका रूस के दृष्टिकोण को सुनेगा।
- क्रेमलिन ने कहा: ‘पुतिन शांति वार्ता के लिए तैयार हैं, लेकिन अपने लक्ष्यों को भी हासिल करना चाहते हैं।’
- अमेरिका और रूस की इस वार्ता से डोनाल्ड ट्रंप और व्लादिमीर पुतिन की मुलाकात का रास्ता साफ हो सकता है।
यूरोपीय नेताओं की बैठक: पेरिस में अलग चर्चा
जहां सऊदी अरब में अमेरिका और रूस की वार्ता चल रही थी, वहीं फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने यूरोपीय नेताओं की एक अलग बैठक बुलाई।
- इस बैठक में अमेरिका के रूस के साथ बातचीत करने के फैसले पर असहमति जताई गई।
- यूरोपीय देश चाहते हैं कि यूक्रेन को समर्थन दिया जाए और उसके बिना कोई भी फैसला न लिया जाए।
यूक्रेन में भारतीय सैनिकों की तैनाती? चीन के सुझाव पर विवाद
पूर्व चीनी कर्नल और डिफेंस एक्सपर्ट झोउ बो ने एक बड़ा बयान देते हुए कहा कि भारत को यूक्रेन में शांति सैनिक भेजने चाहिए।
- झोउ बो ने कहा कि भारत और अन्य गैर-नाटो देशों को मिलकर यूक्रेन में शांति बनाए रखने में मदद करनी चाहिए।
- उन्होंने सुझाव दिया कि चीन भी इसमें अहम भूमिका निभा सकता है।
यह बयान भारत और अन्य देशों के लिए एक नई चुनौती पैदा कर सकता है, क्योंकि भारत पहले ही रूस-यूक्रेन युद्ध में किसी भी पक्ष का सीधा समर्थन करने से बचता रहा है।
क्या यह वार्ता युद्ध खत्म कर पाएगी?
सऊदी अरब में चल रही यह वार्ता तीन साल से जारी युद्ध को खत्म करने के लिए एक महत्वपूर्ण कदम हो सकती है, लेकिन इसमें यूक्रेन को शामिल नहीं करना इसे विवादास्पद बना रहा है।
- रूस चाहता है कि यूक्रेन उसके कब्जे वाले इलाकों को छोड़ दे।
- यूक्रेन इसे पूरी तरह खारिज कर रहा है और सुरक्षा गारंटी की मांग कर रहा है।
- अमेरिका वार्ता को आगे बढ़ाने की कोशिश कर रहा है, लेकिन यूरोप इसका विरोध कर रहा है।
यूक्रेन में रूसी ड्रोन हमला: मां और बच्चे घायल
यूक्रेन के डोलिंस्का शहर में एक रूसी ड्रोन हमले में एक मां और उसके दो बच्चे घायल हो गए। कुल 176 रूसी ड्रोन दागे गए, जिनमें से 103 को मार गिराया गया। ड्रोन के मलबे से कीव के औद्योगिक क्षेत्र में आग लग गई। यूक्रेन का कहना है कि रूस की यह आक्रामकता दिखाती है कि शांति वार्ता के बावजूद वह युद्ध को जारी रखना चाहता है।
रूस पर यूक्रेनी हमला: तेल संयंत्र तबाह
यूक्रेनी ड्रोन ने रूस के क्रास्नोडार क्षेत्र में एक तेल पंपिंग स्टेशन को निशाना बनाया, जिससे कई महीनों तक आपूर्ति बाधित रहने की संभावना है।
- यूक्रेन का दावा: यह संयंत्र रूसी सेना की मदद कर रहा था, इसलिए इसे निशाना बनाया गया।
- यह हमला रूस-कजाकिस्तान तेल पाइपलाइन को प्रभावित कर सकता है, जिससे वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति प्रभावित हो सकती है।
अगले कुछ हफ्तों में यह साफ होगा कि यह वार्ता किसी नतीजे पर पहुंचती है या सिर्फ एक और कूटनीतिक प्रयास बनकर रह जाती है।
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