India
oi-Divyansh Rastogi
Mumbai Attack Tahawwur Rana NIA Inside News: मुंबई 26/11 हमले के जख्म अब भी भारत की आत्मा पर दर्ज हैं। और उन्हीं जख्मों को फिर कुरेद रहा है एक नाम-तहव्वुर हुसैन राणा। अमेरिका से भारत की मेहनत, सबूतों और 16 साल 4 महीने के इंतजार के बाद प्रत्यर्पित किया गया ये आतंकी भारत की सरजमीं पर कदम रखते ही मानो फिर से ‘सुरक्षा कवच‘ ओढ़े बैठा है।
बेड़ियों में, हथकड़ियों में, मगर बेफिक्री में डूबा हुआ। अमेरिका से भारत अपने ही खर्चे पर उस ‘कातिल’ को लाया, जिसकी साजिशों ने 166 मासूमों की जान ले ली। लेकिन ताज्जुब ये है कि जिसे जंजीरों में होना चाहिए था, वो संधियों के साए में सुरक्षित है। जैसे ही राणा की एंट्री भारत में हुई, उसके साथ प्रत्यर्पण संधि की ढाल भी चली आई – एक ऐसा कानूनी कवच, जो उसे सजा से नहीं, पर सजा की सख्ती से जरूर बचा रहा है।

न सजा का डर, न सिस्टम का खौफ – माथे पर शिकन तक नहीं। हाई-सिक्योरिटी सेल में बैठा ये आतंकी, न तो पेशी से डरा, न पूछताछ से। चेहरे पर वही पुराना इत्मीनान, जैसे 26/11 की यादें भी अब उसे बेचैन नहीं करतीं – शायद इसलिए क्योंकि उसने डर का सौदा कानून की किताबों में छुपा दिया है। 26/11 का गुनहगार, भारत में मगर बेपरवाह….
NIA के घेरे में राणा: जंजीरें हैं, मगर ज़ुबान पर ताले
भारत की सबसे तेज़ और खतरनाक जांच एजेंसी एनआईए की कस्टडी में होना किसी भी आतंकी के लिए सबसे डरावना अनुभव होता है। लेकिन तहव्वुर राणा इस डर से भी अछूता है। दिल्ली के लोधी रोड पर एनआईए मुख्यालय की उस बेहद सुरक्षित कोठरी में वह आज भी अपनी मनमर्जी के मुताबिक़ वक्त काट रहा है।
पहले दिन की पूछताछ: ज़ुबान बंद, इरादे खुले
एनआईए अफसरों ने पूछताछ शुरू की – सवालों की लिस्ट लंबी थी, लेकिन जवाब… तीन शब्दों में सिमट गए: ‘ना’, ‘पता नहीं’, ‘याद नहीं’। तीन घंटे चली पूछताछ में राणा हर जवाब से बचता रहा, जैसे उसकी जुबान ने अमेरिका से निकलते वक्त ही काम करना छोड़ दिया हो। ये वही राणा है, जिसने हमले से पहले मुंबई की सड़कों पर चहलकदमी की थी – अब उसी मुंबई का नाम सुनकर ज़ुबान पर ताले डाल रहा है।
मनोवैज्ञानिक चाल: कबूल नहीं, इनकार भी नहीं
एनआईए को पता है कि राणा चुप है – क्योंकि वह सिर्फ बोलकर नहीं, चुप रहकर भी खेल रहा है। उसके हर ‘ना’ में एक रणनीति छुपी है। कबूल कर लिया, तो केस फास्ट ट्रैक में चला जाएगा। इनकार कर दिया तो झूठ पकड़ा जा सकता है। लेकिन ‘याद नहीं’? ना सच्चा, ना झूठा। ना सहायक, ना विरोधी। लेकिन पूरी जांच को धीमा और उलझा देने वाला एक शातिर कार्ड।
NIA के भीतर कैसा है राणा?
पहली बात: वही पुराना चश्मा, वही पुराना स्टाइल
एनआईए ने अब तक कोई क्लोज-अप तस्वीर जारी नहीं की, लेकिन जो झलक सामने आई है, उसमें राणा वही पुराना सिग्नेचर स्टाइल-ब्लैक फ्रेम का चश्मा लगाए हुए दिखा। ‘शायद ये वही चश्मा है, जिससे उसने 2008 में भारत की तबाही का खाका देखा था।’
दूसरी बात: सुरक्षा सेल में भी बेपरवाह
राणा को एनआईए हेडक्वार्टर के ग्राउंड फ्लोर पर 14×14 फीट की स्पेशल सेल में रखा गया है। 24×7 CCTV निगरानी है। सुरक्षाकर्मी हमेशा मौजूद और केवल सॉफ्ट-टिप पेन की इजाजत – ताकि खुद को नुकसान न पहुंचा सके। ‘सुसाइड वॉच’ पर रखा गया है। लेकिन इन तमाम सुरक्षा घेरे के बावजूद, राणा टस से मस नहीं हुआ।
तीसरी बात: NIA की धमक भी नहीं कर पाई असर
एनआईए वही एजेंसी है, जिसने अजमल कसाब, अब्दुल करीम टुंडा और जाकिर नाइक तक को बोलने पर मजबूर कर दिया। लेकिन राणा पर उसका भी असर नहीं हो रहा। पूछताछ में लगातार टालमटोल – ‘याद नहीं’, ‘नहीं पता’, ‘ना’।
चौथी बात: नमाज और रूटीन बरकरार
सूत्रों की मानें तो उसने अपनी ‘धार्मिक स्वतंत्रता’ का हवाला देकर नमाज की इजाजत भी ली है। बताया जा रहा है कि वह अपनी नमाज अदा कर रहा है। हालांकि, इसकी पुष्टि एजेंसी ने नहीं की। शायद यह उसकी मानसिक स्थिति को स्थिर रखने का तरीका हो, या फिर पूछताछ टालने का एक और शेड्यूल ब्रेकर।
पांचवीं बात: फिटनेस और होशियारी में कोई कमी नहीं
भारत आते ही मेडिकल टेस्ट हुआ। न कोई बीमारी, न कमजोरी, न कोई मानसिक परेशानी। अमेरिका में भी मेडिकल क्लियरेंस के बाद ही भेजा गया था। तस्वीरों में भी राणा बेहद स्वस्थ और आत्मविश्वासी दिखा। जैसे कोई गुनहगार नहीं, बल्कि गवाह हो!
अब कुछ राणा के मानवाधिकारों पर हो जाए बात…
1. क्या तहव्वुर राणा को एनआईए हेडक्वार्टर में नमाज पढ़ने की अनुमति कानून सही?
हां, उसे नमाज अदा करने का हक है। भारत का संविधान किसी भी कैदी को, चाहे वह आम हो या आतंकवादी, धार्मिक स्वतंत्रता देता है – जब तक वह सुरक्षा या जेल के नियमों के खिलाफ न हो।
तहव्वुर राणा को एनआईए मुख्यालय में एक हाई-सिक्योरिटी कस्टडी में रखा गया है। वहां उसकी हर गतिविधि पर निगरानी है, लेकिन अगर वह नमाज़ अदा करना चाहता है और वह जेल या जांच की प्रक्रिया में रुकावट नहीं बनती, तो उसे यह करने की इजाज़त दी जा सकती है।
2. क्या आतंकियों के साथ मानवाधिकार हनन होता है?
भारत में आतंकवादियों को भी मानवाधिकार मिलते हैं – लेकिन यह पूरी तरह से जेल मैनुअल, सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों और सुरक्षा नियमों के अनुसार होता है। कभी-कभी, अगर सुरक्षा कारणों से किसी सुविधा को रोका जाता है, तो उसे मानवाधिकार हनन नहीं माना जाता – जब तक वह यातना, बुनियादी सुविधाओं की कमी, या बुरा व्यवहार न हो।
3. मानवाधिकार के तहत क्या-क्या मिल सकता है किसी आतंकी को जेल में?
- भोजन और पानी: एक निश्चित डाइट जो हेल्दी हो, दी जाती है। धार्मिक भोजन की मांग हो (जैसे मुस्लिम कैदी के लिए हलाल खाना), तो यथासंभव उसे भी देखा जाता है।
- स्वास्थ्य सेवाएं: इलाज, दवाएं और ज़रूरी मेडिकल चेकअप मिलते हैं।
- धार्मिक प्रैक्टिस: अगर कोई कैदी प्रार्थना करना चाहता है या धार्मिक किताबें पढ़ना चाहता है, तो आमतौर पर अनुमति दी जाती है।
- कानूनी सहायता: हर कैदी को वकील की मदद लेने और ट्रायल की प्रक्रिया में भाग लेने का पूरा हक है।
- परिवार से मिलने का हक: जेल नियमों के मुताबिक समय-समय पर परिवार से मिलने की अनुमति भी होती है।
- मानवता के साथ व्यवहार: किसी भी सजा के बावजूद, यातना, अपमान या अमानवीय व्यवहार की इजाज़त नहीं होती।
कौन-कौन NIA मुख्यालय में पूछताछ के लिए रखे आतंकी?
- अजमल कसाब: 2008 के मुंबई हमलों के एकमात्र जीवित पकड़े गए आतंकवादी अजमल कसाब से भी एनआईए ने पूछताछ की थी। उन्हें मुंबई में गिरफ्तार किया गया था और बाद में उन्हें पुणे की यरवदा जेल में रखा गया, जहां उन्हें फांसी दी गई।
- यासीन भटकल: इंडियन मुजाहिदीन के सह-संस्थापक यासीन भटकल को 2013 में नेपाल सीमा से गिरफ्तार किया गया था। एनआईए ने उनसे कई बम धमाकों के मामलों में पूछताछ की थी।
- अब्दुल करीम टुंडा: लश्कर-ए-तैयबा के बम विशेषज्ञ अब्दुल करीम टुंडा को 2013 में नेपाल सीमा से गिरफ्तार किया गया था। एनआईए ने उनसे 1993 के मुंबई धमाकों सहित कई मामलों में पूछताछ की थी।
- जाकिर नाइक: इस्लामिक उपदेशक जाकिर नाइक के खिलाफ एनआईए ने मनी लॉन्ड्रिंग और आतंकवाद के प्रचार के आरोपों में जांच की थी। हालांकि, वह भारत से बाहर हैं और उनकी गिरफ्तारी नहीं हो पाई है।

