अमेरिका का डबल स्टैंडर्ड देखिए कि भारत पर 100 परसेंट टैरिफ लगाने का बिल पास किया, जिससे भारत रूस का तेल ना खरीदे. लेकिन खुद अमेरिका रूस से खरीददारी करेगा. अमेरिका ने खुद अपनी जरूरतों के लिए रूस से यूरेनियम खरीदने का रास्ता खुला रखा है. यह बिल पास हो चुका है. ट्रंप ने दस्तखत भी कर दिए हैं. अमेरिका के हाथ में अब वो अधिकार है, जिसके बारे में विपक्ष ने संसद से सड़क तक शोर मचाया. भारत पर 100 फीसदी तक टैरिफ लेकिन अधिकार मिलना और टैरिफ चढ़ जाना एक बात नहीं है. सवाल ये है कि पिछले झटके के बाद प्रधानमंत्री मोदी ने ऐसा क्या जोड़ दिया कि आज की सरकार कह रही है हम तो तैयार हैं.
तो क्या 100 फीसदी टैरिफ की धमकी अब सिर्फ कागज पर है या अगला झटका भारत को लगने वाला है? और अगर अमेरिका ने दबाव बढ़ाया तो भारत के पास जवाब क्या है? क्योंकि कहानी सिर्फ अमेरिका के टैरिफ की नहीं है… कहानी ये है कि इस दबाव के बीच भारत ने अपने लिए कितने विकल्प तैयार कर लिए हैं.
भारत और चीन को डराने वाली ट्रंप की चाल
ट्रंप ने भारत और चीन को डारने के लिए चाल चली है. नाम है Lindsay O. Graham Sanctioning Russia and Iran Act, 2026. रूस पर शिकंजा कसने के लिए बना ये कानून अब भारत के लिए भी बड़ा सवाल बन गया है. अमेरिकी सीनेट के बाद हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स ने इसे 262 के मुकाबले 159 वोटों से पास किया और 18 सितंबर को राष्ट्रपति ट्रंप ने इस पर दस्तखत कर दिए. अब इस कानून की सबसे अहम लाइन समझिए. रूस से तेल या गैस खरीदने वाले बड़े खरीदार देशों पर अमेरिका 100 फीसदी तक टैरिफ लगा सकता है.
और टारगेट सिर्फ रूस नहीं है, निशाने पर वे देश भी आ सकते हैं जो रूसी ऊर्जा खरीदकर मॉस्को की कमाई को बनाए रखते हैं. लेकिन यहां एक अहम बात है 100 फीसदी टैरिफ अभी लगा नहीं है. अमेरिका के कानून ने ट्रंप को इसे लगाने का अधिकार दिया है और अमेरिका के राष्ट्रपति के पास कुछ परिस्थितियों में छूट देने का अधिकार भी है. अब सवाल उठता है ट्रंप ने जब भारत पर पहले भी रूस से तेल खरीदने को लेकर दबाव बनाया गया था, तो तब क्या हुआ था?
फरवरी 2026 में अमेरिका ने भारत पर लगाया गया अतिरिक्त 25 फीसदी रूस-लिंक्ड टैरिफ हटा दिया था. इसके साथ भारत-अमेरिका के बीच ट्रेड फ्रेमवर्क भी सामने आया था. अमेरिका ने भारतीय सामान पर अपना रेसिप्रोकल टैरिफ 25 से घटाकर 18 फीसदी करने की बात कही थी. यानी कुछ महीने पहले 25 फीसदी का दबाव हटाया गया था और अब नया कानून अमेरिका को जरूरत पड़ने पर 100 फीसदी तक टैरिफ लगाने का विकल्प दे रहा है.
भारत के पास क्या है विकल्प?
यहीं से कहानी बदलती है, क्योंकि सवाल अब सिर्फ ये नहीं है कि अमेरिका भारत पर टैरिफ लगाएगा या नहीं सवाल ये है अगर दबाव बढ़ा, तो भारत के पास अमेरिका के सामने खड़े रहने के लिए कितने विकल्प हैं? और यहीं से आते हैं तेल, यूरेनियम और भारत की नई सप्लाई चेन की कहानी.
अमेरिका भारत से कहता है कि रूस से तेल मत खरीदिए. लेकिन जब बात अपनी परमाणु ऊर्जा की आती है तो तस्वीर कुछ अलग नजर आती है. नए कानून में ही अमेरिका-रूस के बीच कुछ सिविलियन न्यूक्लियर सहयोग को छूट दी गई है. कुछ रूसी लो-एनरिच्ड यूरेनियम यानी LEU के आयात के लिए भी अपवाद रखा गया है.
और आंकड़ा देखिए अमेरिकी Energy Information Administration के मुताबिक, 2025 में अमेरिकी रिएक्टर ऑपरेटरों ने जितनी विदेशी मूल की यूरेनियम संवर्धन सेवाएं खरीदीं, उसमें करीब 26 फीसदी हिस्सा रूस का था.
यानी मामला सिर्फ ये नहीं कि कौन किससे ऊर्जा खरीद रहा है. मामला ये भी है कि जिस देश से दूरी बनाने की बात हो रही है उस पर अपनी निर्भरता कितनी जल्दी खत्म की जा सकती है. अमेरिका खुद अब अपने न्यूक्लियर फ्यूल सप्लाई चेन को मजबूत करने की कोशिश कर रहा है. यानी ऊर्जा सुरक्षा का सवाल वॉशिंगटन के लिए भी उतना ही बड़ा है, लेकिन भारत की कहानी यहां से और दिलचस्प होती है. क्योंकि दिल्ली की तैयारी सिर्फ ये नहीं है कि रूस का तेल खरीदना है या नहीं. तैयारी ये है कि तेल के लिए एक देश पर निर्भर न रहना पड़े.
पीएम मोदी का प्लान रेडी
अगस्त 2025 के बाद प्रधानमंत्री मोदी ने लगातार कई देशों का दौरा किया. हर दौरे का एजेंडा अलग था कहीं व्यापार…कहीं निवेश…कहीं ऊर्जा…कहीं डिफेंस और टेक्नोलॉजी. लेकिन इसी दौर में अमेरिका का टैरिफ दबाव भी बढ़ रहा था ऐसे में भारत के सामने एक बड़ी जरूरत थी अपने आर्थिक और रणनीतिक विकल्प बढ़ाना.
ईयू के साथ फ्री ट्रेड एग्रीमेंट की बातचीत पूरी हुई. ब्रिटेन के साथ CEPA आगे बढ़ा. EFTA देशों के साथ व्यापार के साथ निवेश की बड़ी प्रतिबद्धता जुड़ी. फ्रांस के साथ ट्रेड बढ़ाने और टेक्नोलॉजी सहयोग पर जोर. UAE के साथ ऊर्जा, LPG, डिफेंस और निवेश के मोर्चे पर साझेदारी. इटली के साथ 2029 तक द्विपक्षीय व्यापार को 20 अरब यूरो तक ले जाने का लक्ष्य और फिर IMEC भारत से यूरोप तक एक वैकल्पिक आर्थिक और कनेक्टिविटी कॉरिडोर.
लाल सागर में तनाव के बीच वैकल्पिक रूट की अहमियत और बढ़ जाती है. फिर आया मई का पांच देशों का दौरा. विदेश मंत्रालय के मुताबिक इस दौरान करीब 40 अरब डॉलर की नई निवेश प्रतिबद्धताएं सामने आईं. यानी दौरे सिर्फ फोटो-ऑप नहीं थे उनके साथ निवेश और कारोबार की बातचीत भी चल रही थी. न्यूजीलैंड में करीब चार दशक बाद किसी भारतीय प्रधानमंत्री की यात्रा हुई. इंडो-पैसिफिक में पीएम मोदी इंडोनेशिया और ऑस्ट्रेलिया तक गए. मध्य एशिया में उज्बेकिस्तान और किर्गिस्तान पहुंचे. और इसके अलावा G7 के दौरान फ्रांस में ट्रंप से मुलाकात की.
यानी एक तरफ अमेरिका के साथ बातचीत जारी रखी तो दूसरी तरफ भारत ने अपने बाकी आर्थिक रिश्तों को भी फैलाया लिया और ये किसी बंद कमरे की कहानी नहीं है. ना ही दिखावे वाली चीज कि दौरे हो रहे हैं. दूसरे देशों के राष्ट्राध्यक्ष के साथ बैठकें हो रही हैं, बल्कि समझौते और निवेश और व्यापार के नए रास्ते भी खुल रहे हैं.
पीएम मोदी का क्या संदेश?
पीएम मोदी और भारत का संदेश साफ है. अमेरिका अब भी भारत के लिए एक बड़ा बाजार है, लेकिन भारत की कोशिश यही है कि अमेरिका बड़ा बाजार रहे लेकिन ट्रंप ये ना समझे कि भारत के लिए अमेरिकी ही एक एकमात्र बाजार है.
पीएम मोदी ने कहा, ‘दुनिया का भारत पर भरोसा भी बढ़ता जा रहा है, साथियों इसी भरोसे की और एक बड़ी तस्वीर खत्म हुई BRICS समिट में दिखाई दी. भारत ने इस समिट की सफलतापूर्वक मेजबानी की. सबकी सहमति से न्यू दिल्ली डिक्लेरेशन का अडॉप्ट होना भारत पर विश्व के भरोसे का एक और बड़ा प्रमाण है.
प्रधानमंत्री ने सरकार में आने के बाद जो विजन दिया था, उसमें कोई बदलाव नहीं है. पीएम मोदी का मैसेज एकदम क्लीयर है कि विकसित भारत के लक्ष्य के लिए ऊर्जा सुरक्षा सबसे पहले हैं. भारत को जहां से सस्ता और भरोसेमंद कच्चा तेल मिलेगा वहां से इसे खरीदने का विकल्प खुला रखेगा. यानी भारत ने रूसी तेल खरीदना पूरी तरह ना बंद किया है ना इसे लेकर कोई ऐलान किया है.
अब सितंबर के आंकड़ों पर आइए… कुछ व्यापार आंकड़ों और रिपोर्टों में सितंबर में भारत पहुंचने वाली रूसी तेल की खेप अगस्त के मुकाबले कम बताई गई है लेकिन इसे सरकार की कटौती मत मानिए. क्योंकि एक महीने के इमपोर्ट आंकड़े पूरी पूरी रणनीति की तस्वीर नहीं बताते.
तेल की कीमत… शिपमेंट की टाइमिंग… रिफाइनरी की जरूरत और बाजार की स्थिति इन सबका असर इमपोर्ट पर पड़ता है और इसी मुद्दे पर भारत की राजनीति में भी दो अलग-अलग नैरेटिव हैं. विपक्ष इस कानून और अमेरिकी दबाव को सरकार की विदेश नीति और व्यापार रणनीति पर सवाल के तौर पर पेश कर रहा है, लेकिन सरकार कह रही है कि भारत जल्दबाजी में कोई फैसला लेने के बजाय अपने रणनीतिक विकल्प खुले रख रहा है.
ट्रंप टैरिफ और भारत की रणनीति की तीन तस्वीरें हैं. पहली वॉशिंगटन में साइन हुआ नया कानून. भारत की ताबड़तोड़ डील और तीसरी ट्रंप के रूस तेल खरीदारों पर दबाव. अब देखना ये है कि अगले 30 दिन में क्या होने वाला है… क्या ट्रंप का नया हथियार अमेरिका में फट जाएगा? और मोदी का संदेश कि तैयार रहिए लेकिन घबराइये मत, क्योंकि तैयारी का मतलब हर दबाव का जवाब गुस्से से देना नहीं है. तैयारी का मतलब है अगर एक दरवाजा बंद हो तो दूसरा दरवाजा पहले से खुला हो. अमेरिका बड़ा बाजार है लेकिन रूस बड़ा ऊर्जा साझेदार है और भारत की कोशिश यही है कि किसी एक रिश्ते की कीमत पूरी अर्थव्यवस्था को ना चुकानी पड़े.

