1965 की जंग… पश्चिम बंगाल का कालाइकुंडा एयरबेस… आसमान में पाकिस्तान के सेबर फाइटर जेट और उन्हें रोकने के लिए भारतीय वायुसेना के हॉकर हंटर. संख्या में भारी अंतर था, लेकिन भारतीय पायलटों के हौसले में कोई कमी नहीं थी. इसी ऐतिहासिक हवाई भिड़ंत ने फ्लाइट लेफ्टिनेंट अल्फ्रेड टाइरन कुक का नाम भारतीय सैन्य इतिहास में दर्ज कर दिया.
आज वह जांबाज योद्धा नहीं रहे. 1965 के भारत-पाकिस्तान युद्ध के वीर चक्र विजेता फ्लाइट लेफ्टिनेंट अल्फ्रेड टाइरन कुक का 18 सितंबर को नई दिल्ली में 87 वर्ष की उम्र में निधन हो गया. वह ऑस्ट्रेलिया से अपने पुराने स्क्वाड्रन नंबर 14 बुल्स की प्लेटिनम जुबली में शामिल होने भारत आए थे. भारतीय वायुसेना ने उनके निधन पर श्रद्धांजलि देते हुए कालाइकुंडा के उनके ‘लेजेंडरी डॉगफाइट’ को असाधारण साहस और दृढ़ संकल्प का उदाहरण बताया.
कालाइकुंडा के आसमान में अचानक हमला
7 सितंबर 1965 की सुबह पाकिस्तान एयरफोर्स ने पश्चिम बंगाल के खड़गपुर के पास स्थित कालाइकुंडा एयरफील्ड पर अचानक हमला किया. शुरुआती हमले में एयरबेस पर मौजूद कई भारतीय विमान क्षतिग्रस्त हुए.
इसके बाद पाकिस्तानी वायुसेना ने दोबारा हमला किया. F-86 Sabre विमानों का एक दल कालाइकुंडा की ओर बढ़ रहा था. उस वक्त भारतीय वायुसेना की नंबर 14 स्क्वाड्रन, जिसे बुल्स के नाम से जाना जाता था, के पायलट कॉम्बैट एयर पेट्रोल पर थे.
इनमें फ्लाइट लेफ्टिनेंट अल्फ्रेड कुक और उनके विंगमैन फ्लाइंग ऑफिसर सुबोध चंद्र मामगेन शामिल थे. दोनों हॉकर हंटर में थे और उन्हें पाकिस्तानी विमानों को रोकने के लिए भेजा गया. आधिकारिक वीर चक्र प्रशस्ति के मुताबिक, उस समय कालाइकुंडा पर छह पाकिस्तानी सेबर फाइटर जेट्स का हमला हुआ था.
जब दो हंटर के सामने था बड़ा दुश्मन दल
भारतीय वायुसेना के इतिहास पर लगातार लिखने वाले अंचित गुप्ता एक एक्स पोस्ट में लिखते हैं, ‘आसमान में शुरू हुई भिड़ंत बेहद कम ऊंचाई पर पहुंच गई. कुक और मामगेन ने हमलावर विमानों का पीछा किया और दुश्मन के विमानों से भिड़ गए. लड़ाई इतनी नीचे हो रही थी कि यह सिर्फ दो देशों की वायुसेनाओं के बीच मुकाबला नहीं रह गया था, बल्कि पायलटों के कौशल, साहस और सेकेंड के फैसलों की परीक्षा बन चुका था.’
इसी दौरान दोनों भारतीय विमानों की फॉर्मेशन अलग हो गई और कुक को दुश्मन के कई सेबर विमानों का सामना करना पड़ा. बाद के डिटेल और गन-कैमरा रिकॉर्ड से इस डॉगफाइट की तस्वीर और भी दिलचस्प सामने आई. भारतीय वायुसेना से जुड़े ऐतिहासिक रिकॉर्ड में इसे कुक के करियर की सबसे असाधारण हवाई लड़ाइयों में गिना गया है.
एक सेबर आसमान में टूटकर बिखर गया
कुक की वीरता का आधिकारिक रिकॉर्ड उनकी वीर चक्र प्रशस्ति में दर्ज है. इसके मुताबिक, उन्होंने दुश्मन के विमानों को बेहद खतरनाक परिस्थितियों में चुनौती दी और एक पाकिस्तानी सेबर फाइटर जेट को निशाना बनाकर मार गिराया. वह विमान हवा में ही टूटकर बिखर गया. इसके बाद कुक ने दूसरे दुश्मन विमान के पीछे अपनी स्थिति बनाई. लेकिन तभी उनके विमान का पूरा गोला-बारूद खत्म हो चुका था.
यहां कहानी खत्म हो सकती थी, लेकिन कुक ने पीछा करना नहीं छोड़ा. बिना गोलियों के भी वह दुश्मन विमान को लगातार दबाव में रखते रहे. आधिकारिक प्रशस्ति के मुताबिक, आखिरकार बाकी दुश्मन विमान पीछे हट गए और भ्रम की स्थिति में वहां से निकल गए. इसी साहस, नेतृत्व और कर्तव्य के प्रति समर्पण के लिए कुक को वीर चक्र से सम्मानित किया गया.
‘गोली खत्म हो गई, फिर भी पीछा नहीं छोड़ा’
कालाइकुंडा की इस लड़ाई की सबसे चर्चित बात यही है कि कुक ने अपना गोला-बारूद खत्म होने के बाद भी दुश्मन का पीछा जारी रखा. बाद में इस घटना से जुड़े विवरणों में उनके बेहद कम ऊंचाई पर उड़ान भरने का भी जिक्र मिलता है. उनके हंटर में लड़ाई के दौरान जमीन की वनस्पति तक फंस गई थी. 2015 में युद्ध की 50वीं वर्षगांठ के मौके पर जब कुक ने अपने पुराने स्क्वाड्रन का दौरा किया, तब उन्होंने अपने अनुभवों को साझा किया था.
वीर चक्र मिला, लेकिन पदक अपने पास नहीं रखा
कुक के लिए वीर चक्र सिर्फ एक व्यक्तिगत सम्मान नहीं था. 2015 में युद्ध की 50वीं वर्षगांठ के दौरान भारत लौटने पर उन्होंने अपना वीर चक्र नंबर 14 स्क्वाड्रन को सौंप दिया था. बाद में यह पदक स्क्वाड्रन के पास ही रखा गया. यानी जिस स्क्वाड्रन के साथ उन्होंने 1965 में इतिहास रचा था, उसी को उन्होंने अपने सबसे बड़े सैन्य सम्मान की विरासत सौंप दी.
फ्लाइंग ऑफिसर सुबोध चंद्र मामगेन को भी कालाइकुंडा की उसी कार्रवाई के लिए वीर चक्र मिला था.
भारत छोड़ा, लेकिन बुल्स से रिश्ता नहीं टूटा
कुक ने 1960 के दशक के अंत में भारतीय वायुसेना छोड़ दी और बाद में ऑस्ट्रेलिया में बस गए. लेकिन नंबर 14 स्क्वाड्रन से उनका रिश्ता कभी पूरी तरह खत्म नहीं हुआ. यही वजह है कि जीवन के आखिरी वर्षों में भी वह अपने पुराने साथियों और स्क्वाड्रन से जुड़े रहे. सितंबर 2026 में वह एक बार फिर ऑस्ट्रेलिया से भारत आए थे, इस बार अपने पुराने यूनिट के प्लेटिनम जुबली समारोह में शामिल होने के लिए. लेकिन समारोह से ठीक पहले उनके निधन की खबर आ गई.
एक ऐसा योद्धा, जिसकी कहानी आसमान में लिखी गई
फ्लाइट लेफ्टिनेंट अल्फ्रेड टाइरन कुक का सैन्य करियर बहुत लंबा नहीं था, लेकिन 7 सितंबर 1965 की वह लड़ाई उनकी पहचान बन गई. एक तरफ दुश्मन के कई सेबर, दूसरी तरफ भारतीय हंटर और उसके कॉकपिट में बैठा वह पायलट, जिसने गोला-बारूद खत्म होने के बाद भी पीछा करना नहीं छोड़ा.
भारतीय वायुसेना ने उनके निधन पर कहा कि कालाइकुंडा के ऊपर उनका ऐतिहासिक डॉगफाइट आक्रामक हवाई युद्ध और अडिग संकल्प का उदाहरण बना रहेगा. 87 साल की उम्र में कुक दुनिया से विदा हो गए, लेकिन 1965 के उस आसमान में उनकी कहानी आज भी भारतीय सैन्य इतिहास का हिस्सा है.

