बिहार में ‘भूराबाल’ यानी सवर्ण जातियों का हिस्सा लगभग 14 से 16 प्रतिशत है, जिसमें भूमिहार 2.87 प्रतिशत, ब्राह्मण 3.65 प्रतिशत, राजपूत 3.45 प्रतिशत और कायस्थ लगभग 1 प्रतिशत शामिल हैं. ये जातियां भले ही संख्यात्मक रूप से कम हों, लेकिन इनका प्रभाव कई विधानसभा सीटों पर निर्णायक है. मुजफ्फरपुर, बेगूसराय, मधुबनी, पटना, नवादा, मोतिहारी, लखीसराय, आरा, औरंगाबाद जैसे जिलों में ये जातियां हार-जीत तय करते हैं. लालू यादव के ‘MY’ समीकरण ने 1990 के दशक में सवर्णों को हाशिए पर धकेल दिया था, लेकिन प्रशांत किशोर अब इन्हीं सवर्ण जातियों को एकजुट कर नई सियासी जमीन तलाश रहे हैं.
प्रशांत किशोर की क्या होगी रणनीति
मनीष कश्यप का भूमिहार कार्ड
विवादास्पद यूट्यूबर मनीष कश्यप भूमिहार जाति से आते हैं. जेल जाने से लेकर बीजेपी में शामिल होने तक उनका राजनीतिक उतार-चढ़ाव रहा है. लेकिन बिहार में जाति पॉलिटिक्स उन्हेंं बिहार चुनाव में जन सुराज के खांचे में फिट बैठा रहा है. वो जल्द ही जन सुराज में शामिल होने वाले हैं. मनीष कश्यप पार्टी को उत्तर बिहार में मजबूती दे सकते हैं. कश्यप के जरिए प्रशांत किशोर एक बड़ा भूमिहार कार्ड खेल सकते हैं. मुजफ्फरपुर और बेगूसराय जैसे क्षेत्रों में भूमिहार वोटरों का दबदबा है और कश्यप की लोकप्रियता युवाओं को आकर्षित कर सकती है.
उदय सिंह का राजपूत दांव
कायस्थ जाति के बड़े चेहरे की दरकार
कायस्थ समुदाय, हालांकि संख्या में बहुच कम है. लेकिन पटना जैसे शहरी क्षेत्रों में प्रभावशाली है. प्रशांत किशोर ने कायस्थ नेताओं को पार्टी में शामिल कर इस समुदाय को भी जोड़ा है. उनकी रणनीति में कायस्थों की शिक्षित और शहरी छवि को भुनाने की कोशिश साफ दिखती है. इसलिए पहले से मौजूद किसी बड़े कायस्थ चेहरे की तलाश है.
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि प्रशांत किशोर की जातिगत रणनीति उन्हें अन्य दलों से अलग नहीं दिखाती. वह जिस जातिवाद को तोड़ने की बात करते थे, उसी में उलझते दिख रहे हैं. बीजेपी और राजद के मजबूत वोट बैंक को तोड़ना आसान नहीं होगा. साथ ही, नीतीश कुमार के कुर्मी वोट और चिराग पासवान के दलित वोट को साधने में भी उन्हें चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है. ऐसे में प्रशांत किशोर लालू यादव के दौर वाले ‘भूराबाल’, जो आरजेडी के लिए अभिशाप बना उसे जन सुराज के वरदान बनाने का काम कर रहे हैं.

