आज का दिन संसद के इतिहास में एक और अहम अध्याय जोड़ने जा रहा है. लोकसभा में राष्ट्रगीत ‘वंदे मातरम’ के 150 साल पूरे होने पर एक विशेष चर्चा आयोजित की गई है. लेकिन, जो चर्चा केवल ऐतिहासिक और सांस्कृतिक होनी चाहिए थी, उसके अब एक बड़े राजनीतिक संग्राम में तब्दील होने के पूरे आसार हैं. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी संसद में ‘वंदे मातरम’ से जुड़े कुछ ऐसे अनसुने तथ्य और नए राज उजागर करने वाले हैं, जो सीधे तौर पर कांग्रेस के ऐतिहासिक फैसलों को कटघरे में खड़ा करेंगे.
बंकिम चंद्र चटर्जी (चट्टोपाध्याय) द्वारा 1870 के दशक में रचित और बाद में उनके उपन्यास ‘आनंदमठ’ का हिस्सा बने इस गीत ने भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में संजीवनी का काम किया था. अब 150 साल बाद, केंद्र की मोदी सरकार इसे केवल एक गीत नहीं, बल्कि ‘सांस्कृतिक राष्ट्रवाद’ के एक बड़े प्रतीक के रूप में पेश करने की तैयारी में है.
संसद में 10 घंटे का मैराथन मंथन
- लोकसभा की कार्यसूची में इस चर्चा के लिए करीब 10 घंटे का समय निर्धारित किया गया है. चर्चा की शुरुआत और समापन के दौरान केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह और रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह जैसे दिग्गज नेताओं के बोलने की उम्मीद है. हालांकि, सबकी निगाहें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संबोधन पर टिकी हैं.
- सूत्रों के मुताबिक, पीएम मोदी अपने भाषण में न केवल बंकिम चंद्र चटर्जी की विरासत को नमन करेंगे, बल्कि उस ऐतिहासिक भूल या साजिश (जैसा कि भाजपा मानती है) पर भी प्रहार करेंगे, जिसके तहत आजादी से पहले इस गीत को ‘खंडित’ किया गया था.
1937 का वो विवाद, जिसे पीएम मोदी करेंगे जिंदा
- इस चर्चा का सबसे विस्फोटक पहलू 1937 की घटनाओं का जिक्र होगा. पीएम मोदी पहले भी कई मंचों से यह आरोप लगा चुके हैं कि कांग्रेस ने तुष्टिकरण की राजनीति के चलते ‘वंदे मातरम’ के साथ न्याय नहीं किया.
- असल में, मूल ‘वंदे मातरम’ में कुल छह छंद (Stanzas) हैं. लेकिन 1937 में कांग्रेस ने इसे राष्ट्रगीत के रूप में अपनाते समय केवल शुरुआती दो छंदों को ही स्वीकार किया था. इसके पीछे तर्क यह था कि शुरुआती दो छंद मातृभूमि की प्राकृतिक सुंदरता (सुजलां, सुफलां…) का वर्णन करते हैं और पूरी तरह धर्मनिरपेक्ष हैं. जबकि बाद के छंदों में देश को ‘मां दुर्गा’ और ‘देवी’ के रूप में चित्रित किया गया है, जिससे मुस्लिम समुदाय की एकेश्वरवादी मान्यताओं (तौहीद) का टकराव हो सकता था.
- बीजेपी का मानना है कि 1937 में इस गीत को टुकड़ों में बांट दिया गया और इसके एक हिस्से को तोड़ दिया गया. सोमवार को पीएम मोदी संसद के पटल पर उन छिपे हुए तथ्यों को रख सकते हैं कि कैसे और किन परिस्थितियों में यह फैसला लिया गया और इसने देश की सांस्कृतिक एकता को कैसे प्रभावित किया. उम्मीद है कि पीएम मोदी सदन में सभी छह छंदों का जिक्र कर सकते हैं, जिसे लेकर विपक्ष असहज हो सकता है.
कांग्रेस का पलटवार: टैगोर का कवच और ‘माफी’ की मांग
उधर, कांग्रेस ने भी इस हमले का सामना करने के लिए अपनी रणनीति तैयार कर ली है. कांग्रेस का तर्क है कि गीत के केवल दो छंदों को अपनाने का फैसला सिर्फ राजनेताओं का नहीं, बल्कि गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर की सलाह पर लिया गया था.
कांग्रेस नेताओं ने टैगोर द्वारा पूर्व प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू को लिखे गए उस पत्र का हवाला दिया है, जिसमें टैगोर ने खुद सुझाव दिया था कि राष्ट्रीय एकता बनाए रखने के लिए केवल पहले दो छंदों को ही अपनाया जाना चाहिए. कांग्रेस का कहना है कि पीएम मोदी को इतिहास को तोड़-मरोड़कर पेश करने के लिए माफी मांगनी चाहिए. पार्टी का आरोप है कि सरकार चुनावी सुधारों और एसआईआर (SIR) जैसे गंभीर मुद्दों से ध्यान भटकाने के लिए इस भावनात्मक मुद्दे को हवा दे रही है.
विपक्ष में फूट: ममता का समर्थन, कांग्रेस का विरोध
इस मुद्दे ने विपक्षी गठबंधन ‘इंडिया’ (INDIA) के भीतर भी दरारें उजागर कर दी हैं. जहां कांग्रेस इसे ‘ध्यान भटकाने वाला मुद्दा’ बता रही है, वहीं तृणमूल कांग्रेस ने इस चर्चा का समर्थन किया है. पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और उनकी पार्टी के लिए ‘वंदे मातरम’ बंगाली अस्मिता और गर्व का विषय है, क्योंकि इसके रचयिता बंकिम चंद्र चटर्जी बंगाल की मिट्टी के ही लाल थे. ऐसे में टीएमसी, बीजेपी के ‘राष्ट्रवाद’ के पिच पर कांग्रेस के साथ खड़ी होने के बजाय अपनी अलग राह चुनती नजर आ रही है.
हालांकि, टीएमसी ने सरकार की मंशा पर सवाल भी उठाए हैं. ममता बनर्जी ने हाल ही में संसद के उस बुलेटिन पर तीखी प्रतिक्रिया दी थी, जिसमें कहा गया था कि सदन की कार्यवाही के दौरान “जय हिंद” और “वंदे मातरम” जैसे नारे नहीं लगाए जाने चाहिए. विपक्ष का कहना है कि यह सरकार का दोहरा रवैया है. एक तरफ वे नारों पर पाबंदी की बात करते हैं और दूसरी तरफ उसी गीत पर 10 घंटे की चर्चा करा रहे हैं.
सरकार का ‘युवा कनेक्ट’ प्लान
केंद्रीय मंत्रिमंडल ने 1 अक्टूबर को ही इस गीत की 150वीं वर्षगांठ को देशभर में धूमधाम से मनाने का फैसला किया था. प्रधानमंत्री मोदी ने 7 नवंबर को साल भर चलने वाले समारोहों की शुरुआत की थी. सरकार का उद्देश्य स्पष्ट है, वह ‘वंदे मातरम’ के जरिए देश के युवाओं में देशभक्ति की भावना को और गहरा करना चाहती है और साथ ही विपक्ष को ‘सांस्कृतिक जड़ों से कटे हुए’ दल के रूप में प्रोजेक्ट करना चाहती है.
कल जब संसद की कार्यवाही शुरू होगी, तो यह केवल एक गीत के 150 साल का जश्न नहीं होगा, बल्कि यह दो विचारधाराओं ‘सांस्कृतिक राष्ट्रवाद’ बनाम ‘धर्मनिरपेक्ष नेहरूवादी सोच’ के बीच एक जोरदार टक्कर होगी. देश की नजरें इस बात पर होंगी कि क्या वाकई पीएम मोदी कुछ ऐसे “नए तथ्य” सामने लाते हैं जो इतिहास की किताबों में अब तक दबे हुए थे.

