TN Governor vs TVK Vijay: थलापति विजय की पार्टी ‘तमिलगा वेत्री कड़गम’ (TVK) ने भले ही तमिलनाडु की राजनीति को सिर के बल पलट दिया हो, मगर खुद भी उलझ गई है. विजय ने तीन दशकों से चला आ रहा द्रविड़ मुन्नेत्र कड़गम (DMK) और ऑल इंडिया अन्ना द्रविड़ मुन्नेत्र कड़गम (AIADMK) का दबदबा खत्म किया. राज्य की जनता ने एक नया विकल्प तो चुना, लेकिन विधानसभा चुनाव के नतीजों ने ऐसी तस्वीर पेश की है, जिसने सरकार बनाने की चाबी राजभवन की मेज पर रख दी है. आज तमिलनाडु की राजनीति उस मोड़ पर है, जहां राज्यपाल राजेंद्र अर्लेकर के फैसले पर पूरे देश की नजरें टिकी हैं. राज्यपाल ने गुरुवार को टीवीके (TVK) चीफ विजय के सरकार बनाने के दावे को खारिज कर दिया. राजभवन की ओर से जारी प्रेस रिलीज में कहा गया कि विजय विधानसभा में आवश्यक बहुमत साबित करने में सफल नहीं रहे हैं.
कर्नाटक 2018: क्या तब नियमों की परिभाषा अलग थी?
जब हम तमिलनाडु के मौजूदा संकट को देखते हैं, तो मई 2018 का कर्नाटक चुनाव बरबस याद आता है. उस समय 224 सदस्यों वाली कर्नाटक विधानसभा में बीजेपी 104 सीटें जीतकर सबसे बड़ी पार्टी बनी थी. वह भी बहुमत के आंकड़े से दूर थी. दूसरी तरफ कांग्रेस और जेडीएस ने चुनाव के तुरंत बाद गठबंधन किया, जिसके पास बहुमत का स्पष्ट आंकड़ा था.
इसके बावजूद तत्कालीन राज्यपाल वजुभाई वाला ने कांग्रेस-जेडीएस गठबंधन को बुलाने के बजाय सबसे बड़ी पार्टी के नेता बी.एस. येदियुरप्पा को सरकार बनाने का न्यौता दिया.
येदियुरप्पा को शपथ दिलाते समय उनसे विधायकों की लिस्ट नहीं मांगी गई, बल्कि उन्हें सदन में बहुमत साबित करने के लिए पर्याप्त समय दिया गया. हालांकि सुप्रीम कोर्ट के दखल के बाद फ्लोर टेस्ट हुआ और येदियुरप्पा को इस्तीफा देना पड़ा.
सवाल यह है कि जो ‘VIP छूट’ कर्नाटक में बीजेपी को मिली, वही संवैधानिक परंपरा तमिलनाडु में विजय के लिए क्यों नहीं अपनाई जा रही है?
गवर्नर से मिलकर तमिलनाडु में सरकार बनाने का दावा पेश करते विजय (PTI Photo)
‘राजभवन टेस्ट’ बनाम ‘फ्लोर टेस्ट’ का संवैधानिक विवाद
संविधान विशेषज्ञों और सुप्रीम कोर्ट के कई ऐतिहासिक फैसलों ने यह स्पष्ट किया है कि बहुमत का फैसला राजभवन के बंद कमरों में नहीं, बल्कि विधानसभा के पटल पर होना चाहिए.
1994 का ‘एस.आर. बोम्मई बनाम भारत संघ’ मामला इसी बात की तस्दीक करता है. 9 जजों की बेंच ने साफ कहा था कि किसी सरकार के पास बहुमत है या नहीं, इसे परखने की एकमात्र जगह विधानसभा है.
तमिलनाडु के मामले में ऐसा लग रहा है मानो राज्यपाल फ्लोर टेस्ट से पहले ही ‘राजभवन टेस्ट’ लेना चाह रहे हैं. वे विजय से यह पूछ रहे हैं कि वे बाकी पार्टियों का समर्थन कैसे जुटाएंगे. क्या यह राज्यपाल के अधिकार क्षेत्र में आता है कि वह पहले से ही सरकार की स्थिरता पर सवाल उठाएं, जबकि सबसे बड़े दल ने दावा पेश कर दिया हो?
क्या राज्यपाल केवल केंद्र के प्रतिनिधि के रूप में काम कर रहे हैं?
राज्यसभा सांसद कपिल सिब्बल ने इस मामले में राज्यपाल की भूमिका पर गंभीर सवाल उठाए हैं. उन्होंने आरोप लगाया कि राज्यपाल अक्सर केंद्र के एजेंट के रूप में काम करते हैं और अपने राजनीतिक हितों को साधने के लिए संविधान को नुकसान पहुंचाते हैं.
अभिनेता और राजनेता कमल हासन ने इसे जनमत का अपमान बताया है. उनका कहना है कि तमिलनाडु की जनता ने विजय को सबसे ज्यादा सीटें दी हैं, ऐसे में उन्हें मौका न देना जनादेश का गला घोंटने जैसा है. कांग्रेस ने भी कड़ी चेतावनी दी है कि अगर बीजेपी ने एक विधायक के दम पर पिछले दरवाजे से शासन करने की कोशिश की, तो राज्य में बड़ा विद्रोह हो सकता है.
தமிழ்நாடு சட்டமன்றத் தேர்தலில் தனித்து ஆட்சியமைக்கும் அதிகாரத்தை மக்கள் எந்தக் கட்சிக்கும் வழங்கவில்லை. இந்த முடிவு தமிழ்நாட்டு வரலாற்றில் முன்னெப்போதும் நிகழாதது.
என் சகோதரர் திரு. @mkstalin அவர்கள் ‘மக்கள் தீர்ப்பை மதிக்கிறோம்; பொறுப்பான எதிர்க்கட்சியாகச் செயல்படுவோம்’ என்று…

