नई दिल्ली: तुर्किये, सऊदी अरब और पाकिस्तान के बीच हुए मक्का डिफेंस पैक्ट का मसौदा सामने आया है. पाकिस्तान के रणनीतिकार इसे भारत के खिलाफ एक बड़ी सुरक्षा ढाल बताकर पेश कर रहे हैं. पैक्ट के आर्टिकल-2 में कहा गया है कि किसी एक पर बाहरी हमला तीनों पर हमला माना जाएगा. इसके बावजूद समझौते को बारीकी से देखने पर मालूम पड़ता कि यह सिर्फ एक कूटनीतिक छलावा है. इसमें किसी भी देश के लिए युद्ध में सेना उतारना अनिवार्य नहीं किया गया है. हर देश अपनी क्षमता और संसाधनों के हिसाब से ही मदद तय करेगा. भारत जैसे परमाणु शक्ति संपन्न देश के सामने यह समझौता पूरी तरह बेअसर साबित होगा. सऊदी अरब के भारत के साथ गहरे व्यापारिक संबंध हैं और तुर्किये नाटो की पाबंदियों से बंधा हुआ है. पाकिस्तान इस पैक्ट की आड़ में चाहे जितने सपने देख ले, लेकिन जमीनी हकीकत में उसकी सुरक्षा को कोई नया कवच नहीं मिला है.
क्या मक्का पैक्ट का आर्टिकल-2 वाकई भारत के खिलाफ कोई नया खतरा है?
तुर्किये की संसद में पेश मक्का डिफेंस पैक्ट के दस्तावेज ने कई भ्रम पैदा किए हैं. सबसे ज्यादा चर्चा इसके आर्टिकल-2 को लेकर हो रही है. इस अनुच्छेद को नाटो के आर्टिकल 5 की तर्ज पर तैयार बताया जा रहा है. दस्तावेज में साफ लिखा है कि किसी एक देश पर हमला सभी पर हमला माना जाएगा. पहली नजर में यह भारत के लिए एक बड़ा सैन्य दबाव लग सकता है. लेकिन असलियत इसके ठीक उलट है.
आर्टिकल-2 की दूसरी ही लाइन में बचने का कानूनी रास्ता साफ छोड़ दिया गया है. समझौते के अनुसार मदद का स्वरूप जरूरत के वस्तुनिष्ठ मूल्यांकन पर तय होगा. इसका सीधा मतलब यह है कि संकट के समय सेना भेजने का कोई कानूनी दबाव नहीं है.
कोई भी देश युद्ध के समय यह तय कर सकता है कि वह केवल रसद या दवाइयां ही भेजेगा. इसमें संयुक्त सैन्य कमान का भी कोई प्रावधान नहीं किया गया है. ऐसे में इसे सामूहिक सुरक्षा संधि कहना केवल एक मजाक नजर आता है.
क्या सऊदी अरब और तुर्किये भारत से जंग में पाकिस्तान के लिए सेना भेजेंगे?
रावलपिंडी का फौजी हेडक्वार्टर इस पैक्ट को लेकर चाहे जितना जश्न मना ले. सच यह है कि कोई भी देश किसी दूसरे के युद्ध में अपनी सेना नहीं झोंकता है. तुर्किये हजारों किलोमीटर दूर आकर भारत जैसी ताकत के साथ कभी नहीं उलझना चाहेगा. उसकी अपनी सीमाएं सीरिया और कुर्द संकट को लेकर हमेशा संवेदनशील रहती हैं. तुर्किये की सेनाएं पहले से ही कई मोर्चों पर उलझी हुई हैं.
दूसरी तरफ सऊदी अरब की अपनी थलसेना का रिकॉर्ड बेहद कमजोर रहा है. यमन के हूती विद्रोहियों से निपटने में सऊदी सेना के पसीने छूट गए हैं. ऐसे में सऊदी अरब भारत की विशाल सेना के सामने खड़े होने की हिम्मत कभी नहीं जुटा सकता है.
यह पैक्ट केवल आपात स्थिति में औपचारिक बातचीत का एक माध्यम भर है. भारत के खिलाफ किसी भी कार्रवाई में सऊदी और तुर्किये की सेना का मैदान में उतरना लगभग नामुमकिन है. पाकिस्तान का यह भरोसा बहुत जल्द टूटने वाला है.
तुर्की के विदेश मंत्री हाकान फ़िदान, पाकिस्तान के विदेश मंत्री मोहम्मद इशाक डार और सऊदी अरब के विदेश मंत्री प्रिंस फ़ैसल बिन फरहान अल सऊद, 5 अक्टूबर 2026 को सऊदी अरब के रियाद में मक्का रक्षा समझौते की एक समिति बैठक के बाद बाहर निकलते हुए. (तुर्की विदेश मंत्रालय/रॉयटर्स)
कश्मीर और पीओके को लेकर पाकिस्तान के मंसूबे कैसे ध्वस्त हो गए?
- मक्का पैक्ट के आर्टिकल 1 में सीमाओं की सुरक्षा को लेकर एक अहम बात दर्ज है. इसमें कहा गया है कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त सीमाओं की रक्षा की जाएगी. यह प्रावधान पाकिस्तान के कश्मीर एजेंडे पर सबसे बड़ा कानूनी तमाचा है. जम्मू-कश्मीर में भारत और पाकिस्तान के बीच की सीमा अंतरराष्ट्रीय सीमा नहीं बल्कि नियंत्रण रेखा यानी एलओसी है.
- यदि भारत सीमा पार आतंकवाद के खिलाफ पीओके में कोई बड़ी सैन्य कार्रवाई करता है, तो यह अंतरराष्ट्रीय सीमा का उल्लंघन नहीं माना जाएगा. भारत अपनी संप्रभु सीमा के भीतर ही कार्रवाई करने का दावा करेगा.
- ऐसे हालात में मक्का पैक्ट का आर्टिकल-2 पाकिस्तान के बचाव में लागू ही नहीं हो सकता है. सऊदी अरब और तुर्किये बहुत आसानी से इसे द्विपक्षीय क्षेत्रीय विवाद बताकर किनारा कर लेंगे. पाकिस्तान का इस्लामिक सुरक्षा छतरी वाला सपना यहां पूरी तरह बिखर जाता है.
सऊदी अरब की क्या मजबूरियां हैं और वह भारत से दुश्मनी क्यों नहीं ले सकता?
सऊदी अरब और भारत के संबंध आज जिस मुकाम पर हैं, वहां कोई भी समझौता दरार नहीं डाल सकता है. भारत सऊदी अरब का दूसरा सबसे बड़ा व्यापारिक साझीदार बनकर उभरा है. दोनों देशों के बीच सालाना व्यापार 40 अरब डॉलर से अधिक का बना हुआ है. सऊदी की सरकारी कंपनी अरामको के लिए भारत दुनिया का सबसे बड़ा और स्थिर ऊर्जा बाजार है.
सऊदी क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान अपने देश को तेल निर्भरता से बाहर निकालना चाहते हैं. उनके महत्वाकांक्षी विजन 2030 के लिए भारत की तकनीक और कार्यबल की सख्त जरूरत है. इसके अलावा भारत-मध्य पूर्व-यूरोप आर्थिक गलियारा भी भारत के सहयोग पर टिका है. क्या सऊदी अरब कंगाली की कगार पर खड़े पाकिस्तान के लिए भारत से 100 अरब डॉलर के कारोबारी रिश्ते तोड़ेगा. यह सोचना भी कूटनीति के बुनियादी नियमों के खिलाफ है.
सऊदी अरब केवल अपनी अंदरूनी सुरक्षा के लिए पाकिस्तानी सैनिकों को गार्ड की तरह इस्तेमाल करता आया है. वह कभी भी पाकिस्तान के लिए भारत से सीधी दुश्मनी मोल नहीं ले सकता है.
तुर्किये के ‘सुल्तान’ एर्दोगन का नाटो कार्ड क्या है?
तुर्किये के राष्ट्रपति एर्दोगन खुद को मुस्लिम दुनिया का नया खलीफा साबित करने की होड़ में लगे रहते हैं. वे अक्सर पाकिस्तान के मंचों से कश्मीर को लेकर अनाप-शनाप बयानबाजी करते हैं. लेकिन मक्का पैक्ट का आर्टिकल 12 एर्दोगन की मंशा की पोल खोल देता है. इस अनुच्छेद में कहा गया है कि पुराने अंतरराष्ट्रीय समझौते इस पैक्ट पर भारी पड़ेंगे.
तुर्किये 1952 से नाटो का एक सक्रिय और प्रमुख सदस्य है. नाटो के नियमों के अनुसार तुर्किये बिना पश्चिमी देशों की सहमति के किसी तीसरे देश में सेना नहीं झोंक सकता है. अमेरिका और यूरोपीय यूनियन कभी भी तुर्किये को भारत के खिलाफ सैन्य गठबंधन बनाने की छूट नहीं देंगे. एर्दोगन की असली दिलचस्पी केवल अपने हथियारों का बाजार तलाशने तक सीमित है.
तुर्किये के बायरकतार ड्रोन और युद्धपोत आर्थिक संकट के चलते नए खरीदारों की तलाश में हैं. पाकिस्तान के पास पैसे नहीं हैं, इसलिए सऊदी अरब के फंड से तुर्किये अपने हथियार पाकिस्तान को बेचना चाहता है. यह पूरी तरह से एक कारोबारी सौदा है, जिसे मजहबी रंग दिया जा रहा है.
आर्टिकल 7, 9 और 10 में छिपा असली जहर क्या भारत के लिए सिरदर्द बनेगा?
भले ही आर्टिकल-2 एक कागजी शेर साबित हो, लेकिन इस पैक्ट के तीन अनुच्छेद भारत के लिए चिंता का सबब बन सकते हैं. भारत की सुरक्षा एजेंसियों को इन पर पैनी नजर रखनी होगी.
- पहला खतरा आर्टिकल 7 से जुड़ा है, जो रक्षा तकनीक और साझा उत्पादन की बात करता है. तुर्किये की ड्रोन तकनीक अगर पाकिस्तान को मिलती है, तो पश्चिमी सीमा पर सुरक्षा चुनौतियां बढ़ेंगी.
- दूसरा खतरा आर्टिकल 9 है, जो खुफिया जानकारी के आदान-प्रदान का रास्ता खोलता है. तुर्किये और सऊदी अरब के पास मौजूद समुद्री या सैटेलाइट डेटा का इस्तेमाल पाकिस्तान भारत के खिलाफ कर सकता है.
सबसे गंभीर खतरा आर्टिकल 10 में नजर आता है. इसमें युद्धकाल में एक-दूसरे को हथियार, गोला-बारूद और ईंधन मुहैया कराने का वादा किया गया है.
पाकिस्तान की सबसे बड़ी कमजोरी यह रही है कि वह लंबे समय तक युद्ध नहीं लड़ सकता है. 1965 और 1971 के युद्धों में उसका तेल और गोला-बारूद कुछ ही हफ्तों में खत्म हो गया था. यदि सऊदी अरब संकट के समय पाकिस्तान को निरंतर कच्चा तेल और एविएशन फ्यूल देता है, तो उसकी जंग लड़ने की क्षमता कृत्रिम रूप से बढ़ जाएगी. भारत को इस रसद आपूर्ति लाइन को काटने की रणनीति पहले से तैयार रखनी होगी.
आतंकवाद के मुद्दे पर दुनिया के सबसे बड़े एक्सपोर्टर का यह कैसा पाखंड है?
मक्का पैक्ट का आर्टिकल 5 आतंकवाद के खिलाफ मिलकर लड़ने की वकालत करता है. यह इस पूरे समझौते का सबसे हास्यास्पद और पाखंडी पहलू है.
- पाकिस्तान वह देश है जिसने ओसामा बिन लादेन को अपनी सैन्य छावनी के पास सालों तक छुपा कर रखा था. हाफिज सईद और मसूद अजहर जैसे खूंखार आतंकी आज भी पाकिस्तानी सेना की देखरेख में पल रहे हैं. जो देश खुद वैश्विक आतंकवाद की नर्सरी है, वह आतंकवाद विरोधी समझौते पर दस्तखत कर रहा है. पाकिस्तान का असली मकसद बलूचिस्तान और खैबर पख्तूनख्वा में अपने दमन को जायज ठहराना है.
- जब बलूच नागरिक अपने अधिकारों के लिए आवाज उठाते हैं, तो पाकिस्तान उसे बाहरी हमला बताकर मदद मांगेगा. वहीं दूसरी तरफ भारत के खिलाफ सीमा पार आतंकियों की घुसपैठ जारी रखेगा. भारत को अंतरराष्ट्रीय मंचों पर इस पाखंड का पर्दाफाश करना चाहिए. एफएटीएफ और संयुक्त राष्ट्र में सऊदी अरब और तुर्किये से सवाल पूछा जाना चाहिए कि वे एक आतंकी देश के साथ मिलकर कैसा आतंकवाद खत्म कर रहे हैं.
भारत का कूटनीतिक त्रिशूल कैसे करेगा अंकारा और इस्लामाबाद की हेकड़ी बंद?
भारत आज किसी भी गठबंधन के दबाव में आने वाला कमजोर देश नहीं है. नई दिल्ली ने पहले ही ऐसे गठबंधनों का मुकाबला करने के लिए कूटनीतिक बिसात बिछा रखी है.
- तुर्किये को काबू में रखने के लिए भारत ने ग्रीस, साइप्रस और आर्मेनिया के साथ एक मजबूत त्रिकोण बनाया है. आर्मेनिया को भारत पहले ही पिनाका रॉकेट सिस्टम और आकाश मिसाइलें सप्लाई कर रहा है.
- भूमध्य सागर में भारत की नौसेना और वायुसेना ग्रीस के साथ लगातार साझा अभ्यास कर रही है. यदि एर्दोगन ने पाकिस्तान के समर्थन में सीमा लांघी, तो भारत साइप्रस के मुद्दे पर तुर्किये को घेरने में देर नहीं लगाएगा.
- सऊदी अरब के मोर्चे पर भारत ने संयुक्त अरब अमीरात यानी यूएई के साथ रणनीतिक रिश्ते मजबूत किए हैं. खाड़ी देशों के भीतर का आपसी तनाव किसी से छिपा नहीं है.
भारत अपने बड़े तेल बाजार का इस्तेमाल करके रियाद को साफ संदेश दे सकता है. नई दिल्ली यह स्पष्ट कर चुकी है कि भारत के राष्ट्रीय हितों को चोट पहुंचाकर कोई देश यहां कारोबार नहीं कर सकता है.
अरब सागर में भारतीय नौसेना की बादशाहत के आगे कैसे टिकेगा यह पैक्ट?
कागजों पर दस्तखत करना आसान होता है, लेकिन भूगोल को बदलना नामुमकिन है. अरब सागर और हिंद महासागर में भारतीय नौसेना का एकछत्र दबदबा कायम है. भारतीय नौसेना का पश्चिमी कमान कराची और ग्वादर बंदरगाहों की चौबीस घंटे निगरानी करता है. युद्ध की स्थिति में इन बंदरगाहों की पूर्ण नाकाबंदी करना भारत के लिए कुछ ही घंटों का काम है.
यदि तुर्किये या सऊदी अरब से कोई तेल का जहाज पाकिस्तान की मदद के लिए आता है, तो उसे भारतीय नौसेना के कड़े पहरे से गुजरना होगा. भारत के एयरक्राफ्ट कैरियर और परमाणु पनडुब्बियां पूरे समुद्री रास्ते पर हावी हैं. होर्मुज जलडमरूमध्य और ओमान की खाड़ी तक भारत की पहुंच बेहद मजबूत है. कोई भी बाहरी देश भारत की नौसैनिक ताकत को दरकिनार करके पाकिस्तान तक रसद नहीं पहुंचा सकता है.
मक्का पैक्ट के अंदरूनी अंतर्विरोध इसे कैसे बना देते हैं कमजोर?
यह गठबंधन तीन ऐसे देशों का जमावड़ा है जिनके अपने हित एक-दूसरे से पूरी तरह टकराते हैं. इनमें से किसी भी देश की शासन प्रणाली या सोच आपस में मेल नहीं खाती है. सऊदी अरब मुस्लिम ब्रदरहुड को अपने अस्तित्व के लिए सबसे बड़ा खतरा मानता है. इसके विपरीत तुर्किये के राष्ट्रपति एर्दोगन उसी मुस्लिम ब्रदरहुड के सबसे बड़े समर्थक रहे हैं. सऊदी अरब और तुर्किये के बीच सदियों पुरानी ऐतिहासिक और वैचारिक प्रतिद्वंद्विता रही है. जमाल खशोगी के कत्ल के बाद दोनों देशों के रिश्ते रसातल में चले गए थे.
दूसरी तरफ पाकिस्तान पूरी तरह से चीन का कर्जदार और गुलाम बन चुका है. तुर्किये नाटो का सदस्य है और सऊदी अरब सुरक्षा के लिए अमेरिकी हथियारों पर निर्भर है. जब तीन देशों के हित तीन अलग-अलग दिशाओं में भाग रहे हों, तो ऐसा गठबंधन ज्यादा दिन नहीं टिकता है. मक्का पैक्ट सिर्फ एक दिखावा है जो पहले ही बड़े संकट में अपनी मौत मर जाएगा.
भारत के लिए इस रक्षा समझौते से क्या सामरिक सबक निकलते हैं?
मक्का डिफेंस पैक्ट भारत के लिए किसी डर का कारण नहीं बल्कि सतर्क रहने का एक बड़ा अवसर है. इससे भारत की दीर्घकालिक सुरक्षा नीतियों को और ज्यादा धार मिलेगी.
- पहला सबक यह है कि भारत को रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता की रफ्तार को दोगुना करना होगा. अपने लड़ाकू विमान, ड्रोन और पनडुब्बियों के निर्माण में किसी भी विदेशी निर्भरता को खत्म करना जरूरी है.
- दूसरा कदम अपनी पश्चिमी सीमा पर एंटी-ड्रोन ग्रिड को और मजबूत बनाना होगा. तुर्की ड्रोन्स के खतरे से निपटने के लिए लेजर हथियारों और एयर डिफेंस सिस्टम्स की तैनाती बढ़ानी चाहिए.
- तीसरा सबसे अहम कदम भारत के स्ट्रैटेजिक पेट्रोलियम रिजर्व को बढ़ाना है. अगर भारत के पास तीन से चार महीने का तेल भंडार मौजूद रहेगा, तो खाड़ी देशों की कोई भी संभावित ब्लैकमेलिंग बेअसर हो जाएगी.
भारत को अपनी आक्रामक कूटनीति जारी रखनी होगी.

