हिंडोल सेनगुप्ता
जब दुनिया का कोई दिग्गज विदेश मंत्री ग्लोबल फूड संकट को लेकर चेतावनी दे, तो इसे हल्के में नहीं लिया जा सकता है. न्यूयॉर्क की प्रतिष्ठित एशिया सोसाइटी में बोलते हुए एस जयशंकर ने कहा, ‘आने वाले कुछ महीनों में दुनिया संभवतः एक बड़े फूड क्राइसिस का सामना कर सकती है’. उनकी इस चेतावनी के पीछे एक गहरा एनालिसिस छिपा है. उनके मुताबिक वर्तमान में दुनिया तीन बड़े झटकों का एक साथ सामना कर रही है.
- पहला झटका यूक्रेन का लंबा खिंचता संघर्ष है.
- दूसरा झटका वेस्ट एशिया का लगातार बढ़ता तनाव है.
- तीसरा झटका मौसम से जुड़ा मजबूत अल नीनो का प्रभाव है.
इन तीनों संकटों ने मिलकर पूरी दुनिया में अनाज की सप्लाई चेन को तोड़ दिया है. फर्टिलाइजर की सप्लाई भी बुरी तरह बाधित हो चुकी है. इसका सबसे भयंकर असर ग्लोबल साउथ के विकासशील देशों पर पड़ रहा है. इसके अलावा एक चौथा और खामोश संकट भी काम कर रहा है. जब भी दुनिया में कोई युद्ध या संघर्ष होता है, तो निवेशक अपना पैसा निकाल लेते हैं. यह पैसा ग्लोबल साउथ से निकलकर सुरक्षित ठिकानों की तरफ चला जाता है. इसका सीधा मतलब यह है कि दुनिया एक साथ एनर्जी, फूड, फर्टिलाइजर और फाइनेंस के मोर्चे पर घिर चुकी है.
अल नीनो का खतरनाक रूप: करोड़ों लोगों के लिए मुसीबत बनने वाला है
मौसम के आंकड़े इस समय सबसे ज्यादा डराने वाले संकेत दे रहे हैं. अमेरिका के क्लाइमेट प्रेडिक्शन सेंटर ने अपनी नई रिपोर्ट में चौंकाने वाले फैक्ट्स सामने रखे हैं. इस रिपोर्ट के मुताबिक अल नीनो का प्रभाव अब लगातार मजबूत हो रहा है. उत्तरी गोलार्ध में साल 2026-27 की सर्दियों के दौरान इसके भयंकर रूप लेने की 90 प्रतिशत से अधिक संभावना बन गई है.
पूर्वी प्रशांत महासागर में समुद्र की सतह का तापमान सामान्य से 3.0 डिग्री सेल्सियस ऊपर जा सकता है. इसका असर ग्लोबल वेदर सिस्टम पर पड़ना तय है. अक्टूबर से दिसंबर के बीच एक ऐतिहासिक वेदर इवेंट होने के 75 प्रतिशत चांस नजर आ रहे हैं. यह साल 1950 के बाद के सभी पिछले अल नीनो रिकॉर्ड्स को तोड़ सकता है.
मौसम वैज्ञानिकों का मानना है कि यह खतरनाक स्थिति मार्च-मई 2027 तक बनी रह सकती है. मौसम का यह बिगड़ा हुआ चक्र खेती के कैलेंडर के लिए एक बड़ी आपदा साबित होने वाला है. यह अल नीनो ठीक उसी समय अपने चरम पर होगा जब एशिया में ड्राई-सीजन की फसलें तैयार होती हैं. इसके अलावा ऑस्ट्रेलिया की पैदावार और दक्षिणी अफ्रीका में मक्के की बुवाई का समय भी यही होता है. इन सभी क्षेत्रों को मौसम की इस मार का सीधा नुकसान झेलना पड़ेगा.
दुनिया के लिए खतरे की घंटी: एस जयशंकर ने बताया कैसे कुछ महीनों में शुरू होगा ग्लोबल फूड क्राइसिस. (File Photo : PTI)
भारत का कमजोर मानसून और कम बारिश देश के लिए अलार्म बेल
- भारत मौसम के इस खतरनाक बदलाव का पहला झटका पहले ही झेल चुका है. देश में इस बार मानसून के दौरान केवल 759.4 मिलीमीटर बारिश दर्ज की गई है. यह देश के लॉन्ग पीरियड एवरेज का सिर्फ 87 प्रतिशत है. बारिश का यह आंकड़ा साल 1901 के बाद से 13वां सबसे कम मानसून रहा है. वहीं अगर हम साल 2001 के बाद से देखें, तो यह चौथा सबसे कमजोर मानसून साबित हुआ है.
- केवल जून के महीने में पूरे भारत में महज 99.5 मिमी बारिश दर्ज की गई. यह आंकड़ा सामान्य बारिश के मुकाबले लगभग 40 प्रतिशत कम है. बारिश की यह भारी कमी पूरे देश में एक समान नहीं रही है. पूर्वी और पूर्वोत्तर भारत के राज्यों में सामान्य से 26 प्रतिशत कम बारिश हुई है. इसके बाद दक्षिण प्रायद्वीपीय भारत में 24 प्रतिशत बारिश की कमी दर्ज की गई है. भारत के मौसम विभाग के 36 में से 17 सब-डिवीजन में बारिश का भारी अभाव देखा गया है.
- मौसम की इस मार को देखते हुए सरकार ने भी बड़े कदम उठाए हैं. सरकार ने 2026-27 के लिए अपने फूडग्रेन प्रोडक्शन का टारगेट कम कर दिया है. अब देश की सारी उम्मीदें सर्दियों में होने वाली रबी की फसल पर टिकी हैं. रबी की फसल की सिंचाई काफी हद तक बड़े जलाशयों के जल स्तर पर निर्भर करती है. जलाशयों में कम पानी भारत की फूड सिक्योरिटी के लिए अगला बड़ा टेस्ट साबित होगा.
भारी बफर स्टॉक होने के बावजूद भारत में प्रीमियम चावल की बढ़ती कीमतें क्या संकेत दे रही हैं?
राहत की बात यह है कि भारत के पास फिलहाल अनाज का एक बहुत मजबूत बफर स्टॉक मौजूद है. आंकड़ों के मुताबिक 1 जुलाई तक फूड कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया के पास 40.31 मिलियन टन चावल का भारी स्टॉक था. इसके अलावा धान का इतना बड़ा रिजर्व भी मौजूद है जिससे अतिरिक्त 38.74 मिलियन टन चावल तैयार किया जा सकता है. लेकिन बाजार का नियम कहता है कि सिर्फ स्टॉक होने से कीमतों का तनाव कम नहीं होता है.
सरकार के पास भारी रिजर्व होने के बावजूद बाजार में प्रीमियम चावल की कीमतें लगातार ऊपर चढ़ रही हैं. इसका मुख्य कारण यह है कि एफसीआई के स्टॉक में ज्यादातर सामान्य किस्म के चावल मौजूद हैं. ये चावल मुख्य रूप से देश की कल्याणकारी योजनाओं और राशन के लिए रखे गए हैं.
दूसरी ओर साउथईस्ट एशिया के देश इस ग्लोबल संकट से सबसे ज्यादा प्रभावित होने वाले हैं. मार्केट एनालिस्ट्स का अनुमान है कि इस क्षेत्र में चावल का कुल उत्पादन 2 से 8 प्रतिशत तक नीचे गिर सकता है.
अगर औसत 5 प्रतिशत की गिरावट भी दर्ज की जाती है, तो यह एक बहुत बड़ा झटका होगा. चावल की यह मात्रा थाईलैंड के पूरे सालाना एक्सपोर्ट के बराबर है. थाईलैंड में इस साल जनवरी से अप्रैल के बीच सामान्य से 60 प्रतिशत कम बारिश हुई है. वहीं पड़ोसी देश कंबोडिया में एक लाख हेक्टेयर से अधिक धान के खेत सूखे की भयंकर चपेट में आ चुके हैं.
साउथईस्ट एशिया और अफ्रीकी देशों में भयंकर सूखे के कारण भुखमरी का खतरा क्यों मंडरा रहा है?
- फिलीपींस इस वर्तमान फूड क्राइसिस में सबसे कमजोर इंपोर्टर देश बनकर उभरा है. अमेरिकी कृषि विभाग ने फिलीपींस का चावल उत्पादन गिरकर 12.25 मिलियन मीट्रिक टन रहने का अनुमान लगाया है. यह आंकड़ा पिछले साल के 12.36 मिलियन से कम है. उत्पादन घटने के कारण उनका इंपोर्ट बढ़कर 5.20 मिलियन मीट्रिक टन तक पहुंचने की उम्मीद है. इंडोनेशिया भी चावल का एक बड़ा इंपोर्टर देश है. वहां इंपोर्ट में अचानक होने वाली बढ़ोतरी एशियाई मार्केट के बैलेंस को पूरी तरह बिगाड़ सकती है.
- अफ्रीका में मक्के की खेती का एकमात्र सीजन दिसंबर से मार्च के बीच होता है. हैरानी की बात यह है कि यही वह समय है जब अल नीनो के अपने चरम पर होने की भविष्यवाणी की गई है. इस मामले में पिछला रिकॉर्ड काफी डराने वाला रहा है. साल 2015-16 में अल नीनो का प्रभाव आज के मुकाबले कमजोर था. फिर भी उस समय 4 करोड़ से ज्यादा लोगों को फूड इनसिक्योरिटी का सामना करना पड़ा था. उस भयंकर सूखे में जिम्बाब्वे और मलावी जैसे देशों में मक्के की पैदावार लगभग आधी रह गई थी.
- वर्ल्ड बैंक ने ईस्ट और सदर्न अफ्रीका में 6.7 करोड़ लोगों को फूड असिस्टेंस की भारी जरूरत बताई है. सूडान के 14 बड़े इलाकों में पहले से ही अकाल का खतरा मंडरा रहा है. साउथ अफ्रीका का 2026 का मक्का उत्पादन 17.4 मिलियन टन अनुमानित है. यह कुछ हद तक क्षेत्रीय बफर दे सकता है, लेकिन एक बफर कभी पूरी फसल की जगह नहीं ले सकता है. संयुक्त राष्ट्र ने स्पष्ट चेतावनी दी है कि अल नीनो लगभग 5 करोड़ कमजोर लोगों को गंभीर भुखमरी की ओर धकेल सकता है.
मिडिल ईस्ट के लगातार बढ़ते तनाव ने ग्लोबल फर्टिलाइजर की कीमतों में कैसे आग लगा दी है?
दुनिया भर में मौसम का यह भारी झटका ऐसी मिट्टी पर पड़ रहा है जिसमें पहले से पोषक तत्वों की कमी है. होर्मुज जलडमरूमध्य दुनिया के व्यापार के लिए एक बहुत अहम रास्ता है. यहां से दुनिया का लगभग एक तिहाई यूरिया एक्सपोर्ट होकर गुजरता है. इसके साथ ही 20 प्रतिशत अमोनिया और 20 प्रतिशत फॉस्फेट का एक्सपोर्ट भी इसी रास्ते से होता है. ईरान पर अमेरिकी और इजरायली हमलों को शुरू हुए छह महीने से अधिक समय बीत चुका है. होर्मुज का रास्ता बाधित होने के बाद अप्रैल में यूरिया की कीमतें 850 डॉलर प्रति मीट्रिक टन को पार कर गईं. यह फरवरी के बाद से 80 प्रतिशत की भारी बढ़ोतरी है और अप्रैल 2022 के बाद का उच्चतम स्तर भी है. हालांकि अब नाइट्रोजन की कीमतों में थोड़ी नरमी जरूर आई है. लेकिन फारस की खाड़ी से फर्टिलाइजर का ग्लोबल शिपमेंट काफी हद तक रुका हुआ है.
दूसरी ओर फॉस्फेट की कीमतों में 25-30 प्रतिशत की भारी वृद्धि हुई है और वे उसी स्तर पर बनी हुई हैं. अफ्रीका में फर्टिलाइजर की ग्लोबल और फार्म-गेट कीमतों के बीच का अंतर बहुत ज्यादा बढ़ गया है. जुलाई महीने में मलावी में यूरिया की कीमत करीब 975 डॉलर प्रति टन पहुंच गई थी. तंजानिया में यह 933 डॉलर और साउथ अफ्रीका में 1059 डॉलर थी. जबकि इसका ग्लोबल प्राइस आज भी करीब 400 डॉलर के आसपास है. ग्लोबल फर्टिलाइजर मार्केट में रूस की हिस्सेदारी भी लगभग 18-20 प्रतिशत है. इन हालात में गरीब किसानों के कम फर्टिलाइजर इस्तेमाल करने का खतरा लगातार बढ़ रहा है. इससे उन इलाकों में भी फसल की पैदावार गिर सकती है जहां बारिश अच्छी हुई है.
एक्सपोर्ट बैन और फूड डिप्लोमेसी दुनिया में एक नए और खतरनाक कोल्ड वॉर को जन्म दे रहे
ग्लोबल मार्केट पहले से ही इन तमाम खतरों पर बहुत तेजी से रिएक्ट कर रहे हैं. अगस्त महीने में एफएओ फूड प्राइस इंडेक्स औसतन 133.3 अंक के उच्च स्तर पर रहा. वहीं सीरियल प्राइस इंडेक्स मई 2024 के बाद अपने सबसे उच्चतम स्तर पर पहुंच गया है. यह साफ तौर पर मौसम की चिंताओं और ब्लैक सी एक्सपोर्ट फ्लो की अनिश्चितता को दर्शाता है.
हालांकि दुनिया के हर क्षेत्र को सिर्फ नुकसान नहीं हो रहा है. ऑस्ट्रेलिया को इस बार अच्छी सर्दियों की बारिश का पूरा फायदा मिला है. उनका गेहूं उत्पादन 10 साल के औसत से 3 प्रतिशत ऊपर जाकर 29.9 मिलियन टन रहने का अनुमान है. यह ग्लोबल सप्लाई में मदद करेगा, लेकिन यह एशियाई चावल और अफ्रीकी मक्के के नुकसान की भरपाई नहीं कर पाएगा.
इतिहास गवाह है कि खाने की कमी सिर्फ महंगाई नहीं बढ़ाती है. यह देशों के कूटनीतिक व्यवहार को भी पूरी तरह बदल देती है. इसका सबसे पहला बदलाव एक्सपोर्ट नेशनलिज्म के रूप में सामने आता है.
साल 2023 में भारत के चावल एक्सपोर्ट बैन ने ग्लोबल कीमतों को 15-20 प्रतिशत तक बढ़ा दिया था. इसके बाद कई देशों ने भी ऐसा ही किया. म्यांमार ने 45 दिन का एक्सपोर्ट बैन लगाया और फिलीपींस ने रिटेल प्राइस की लिमिट तय कर दी.
आज दुनिया भर की नजरें भारत, वियतनाम और थाईलैंड पर टिकी हैं. एक्सपोर्ट बैन की एक नई चेन इस फूड क्राइसिस को और ज्यादा गहरा कर सकती है. दूसरा बड़ा बदलाव भोजन का एक कूटनीतिक हथियार के रूप में इस्तेमाल होना है. ब्लैक सी और खाड़ी क्षेत्र दोनों अब खतरनाक वॉर जोन बन चुके हैं. जो देश अनाज, फर्टिलाइजर या शिपिंग लेन को कंट्रोल करते हैं, वे अपनी ताकत का फायदा उठाते हैं.
ग्लोबल साउथ के लीडर के तौर पर भारत इस फूड क्राइसिस में क्या रोल निभाएगा?
कर्ज में पूरी तरह डूबे हुए इंपोर्टर देश इस संकट का सबसे ज्यादा नुकसान उठाते हैं. एफएओ के चीफ इकोनॉमिस्ट ने साफ कहा है कि अफ्रीका और साउथ एशिया के कई देश अनाज की ज्यादा कीमतें नहीं चुका पाएंगे. ऐसे में भयंकर भुखमरी देशों के अंदर अस्थिरता का एक बड़ा कारण बन जाती है. साल 1997 की एक अमेरिकी इंटेलिजेंस रिपोर्ट के मुताबिक सिर्फ अल नीनो से किसी देश में अस्थिरता नहीं आती है. लेकिन यह उन सरकारों की मुश्किलें कई गुना बढ़ा देता है जो पहले से आर्थिक संकट में हैं. साहेल, साउथ एशिया और साउथईस्ट एशिया की कई सरकारें आज ठीक इसी स्थिति में खड़ी हैं. तीसरा और सबसे अहम मुद्दा फूड सिक्योरिटी में भारत की चॉइस का है.
भारत आज खुद को मजबूती से ग्लोबल साउथ की आवाज कहता है और उसके पास भारी मात्रा में अनाज का भंडार है. अगर भारत सीधा एक्सपोर्ट बैन लगाता है, तो इससे घरेलू कीमतें तो बच जाएंगी. लेकिन इससे अफ्रीका और भारत के पड़ोसी देशों को भारी नुकसान उठाना पड़ेगा. इससे विकासशील देशों की मजबूत आवाज के रूप में भारत की क्रेडिबिलिटी पर भी बहुत बुरा असर पड़ेगा. इसके बजाय सरकार को एक कस्टमाइज्ड अप्रोच अपनानी होगी.

