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Old Jail Khana Secunderabad: सिकंदराबाद के मोंडा मार्केट में स्थित ‘ओल्ड जेल खाना’ कभी ब्रिटिश काल की एक जेल थी, जहाँ क्रांतिकारियों को कैद किया जाता था. 1826 में बनी यह इमारत 1860 के दशक से जेल के रूप में उपयोग हुई, जिसे आजादी के बाद नगर पालिका को सौंप दिया गया. आज यह एक हेरिटेज कमर्शियल कॉम्प्लेक्स है, जहाँ जेल की पुरानी कोठरियों में दुकानें संचालित हो रही हैं. यह स्थान इतिहास और आधुनिक व्यापार का एक अनोखा उदाहरण है.
सिकंदराबाद. तेलंगाना के सिकंदराबाद में स्थित मोंडा मार्केट अपनी व्यस्तता और व्यापारिक गहमागहमी के लिए पूरे राज्य में मशहूर है. लेकिन इसी बाज़ार के शोर-शराबे के बीच ग्रेनाइट की मोटी दीवारों वाली एक ऐसी ऐतिहासिक इमारत खड़ी है, जिसके अतीत के बारे में जानकर लोग अक्सर दंग रह जाते हैं. औपनिवेशिक वास्तुकला की छाप लिए यह इमारत आज एक बड़ा कमर्शियल कॉम्प्लेक्स है, जिसे स्थानीय लोग ‘ओल्ड जेल खाना’ के नाम से पुकारते हैं. यह वही स्थान है, जहाँ कभी ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ आवाज़ बुलंद करने वाले क्रांतिकारियों और स्वतंत्रता सेनानियों को कैद करके रखा जाता था. आज भले ही यहाँ कपड़ों और बर्तनों की दुकानें सजती हों, लेकिन इसकी मज़बूत दीवारें आज भी उस दौर के संघर्ष और बलिदान की गवाह बनी हुई हैं.
इतिहासकारों के अनुसार, इस भव्य इमारत का निर्माण वर्ष 1826 में किया गया था. शुरुआत में इसे जेल के उद्देश्य से नहीं, बल्कि ब्रिटिश अधिकारियों के ठहरने के लिए एक विश्राम गृह के रूप में बनाया गया था. लेकिन वर्ष 1857 की प्रथम स्वतंत्रता क्रांति के बाद स्थितियां पूरी तरह बदल गईं. जब हैदराबाद और सिकंदराबाद के क्षेत्रों में विद्रोह की आग भड़की, तो अंग्रेजों ने बागियों को नियंत्रित करने के लिए इस इमारत को जेल में तब्दील कर दिया. लगभग 1860 के दशक तक यह एक पूर्ण विकसित जेल के रूप में कार्य करने लगी थी, जहाँ निजाम की रियासत और ब्रिटिश राज के खिलाफ मोर्चा खोलने वाले सेनानियों को बंद किया जाता था. इस जेल के भीतर करीब 20 छोटी कोठरियाँ थीं, जहाँ कैदियों को कड़ी यातनाएं दी जाती थीं.
आजादी के बाद का व्यावसायिक बदलाव
वर्ष 1956 में जब राज्य का पुनर्गठन हुआ, तब इस जेल का उपयोग आधिकारिक तौर पर बंद कर दिया गया और इसे स्थानीय नगर पालिका को सौंप दिया गया. समय के साथ प्रशासन ने इसके ऐतिहासिक महत्व को सहेजने के बजाय इसके व्यापारिक इस्तेमाल की अनुमति दे दी. देखते ही देखते जेल की कालकोठरियाँ कपड़े, बर्तन और किराने की दुकानों में बदल गईं. क्रांतिकारियों के इंकलाबी नारों की गूँज बाज़ार के मोलभाव और भीड़ के पीछे कहीं खो गई. वर्ष 2006 में इस इमारत को ‘हेरिटेज स्ट्रक्चर’ का दर्जा मिलने से इसके ध्वस्तीकरण पर तो रोक लग गई, लेकिन इसका व्यापारिक स्वरूप आज भी बरकरार है, जो इतिहास प्रेमियों के लिए एक कौतूहल का विषय है.
इतिहास की खामोशी और बाज़ार की चमक
आज मोंडा मार्केट आने वाले हजारों ग्राहकों के लिए यह इमारत महज एक खरीदारी का केंद्र है. लोग यहाँ आते हैं और अपनी जरूरत का सामान खरीदकर चले जाते हैं, लेकिन बहुत कम लोग यह जानते हैं कि वे जिस फर्श पर खड़े हैं, वह कभी स्वतंत्रता संग्राम की वीरता का केंद्र था. यह इमारत आज भी अपनी पुरानी शान के साथ सीना ताने खड़ी है. एक तरफ जहाँ दुकानों पर व्यापार की रौनक है, वहीं दूसरी तरफ इतिहास की वह गहरी खामोशी है जो आने वाली पीढ़ियों को अपने गौरवशाली अतीत की याद दिलाती है. विरासत और बाज़ार का यह मेल सिकंदराबाद को एक अलग ऐतिहासिक पहचान देता है, जिसे सहेजने की ज़रूरत आज भी महसूस की जाती है.
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Vicky Rathore (born July 25, 1994) is a seasoned multimedia journalist and digital content specialist with 8 years of experience across digital media, social media management, video production, editing, content…और पढ़ें

