एक ग्लेशियर के अचानक टूटने से नेपाल के रसुवा और नेपाल-तिब्बत में अचानक भयानक बाढ़ (flash flood)आई. इसमें ज़्यादा ऊंचाई पर मौजूद ग्लेशियर का लगभग दो-तिहाई हिस्सा टूटकर करीब 1.2 किलोमीटर नीचे लेंधे खोला नदी के कैचमेंट एरिया में गिर गया. इससे काफी जानमाल का नुकसान हुआ है. इस फ्लैश फ्लड में 450 से ज्यादा लोगों की मौत हो गई और 1400 से ज्यादा लोग लापता हैं. आपदा के बाद तीसरे दिन भी खोज और बचाव अभियान जारी. इस दौरान और शव बरामद किए गए. नेपाल पुलिस ने एक बयान में कहा कि नेपाल के आठ ज़िलों से ये शव बरामद किए गए. पुलिस के अनुसार, चितवन से 178, नवलपरासी ईस्ट से 110, गोरखा से 44, नुवाकोट से 37 और धाडिंग ज़िले से 33 शव बरामद किए गए हैं. इसी तरह, तनहुं से 28, नवलपरासी वेस्ट से 27 और रसुवा से 12 शव बरामद किए गए हैं. इस हादसे की वजह को लेकर तरह-तरह के कयास लगाए जा रहे हैं. कई लोग तो इसके लिए चीन को जिम्मेदार बता रहे हैं, लेकिन क्या यह चीन की वजह से हुआ? या फिर भूकंप की वजह से हुआ? या प्राकृतिक रूप से ग्लेशियर पिघला? आइए जानते हैं.
सबसे पहले बता दे, कई रिपोर्ट्स में दावा किया गया है कि चीन ने नेपाल को ग्लेशियर टूटने और फ्लैश फ्लड की जानकारी 45 मिनट देरी से दी. इसकी वजह से नेपाल अलर्ट नहीं हो पाया. लेकिन ग्लेशियर टूटने के लिए चीन जिम्मेदार नहीं है. गाद से भरी इस भयानक बाढ़ ने भोटे कोशी-त्रिशूली कॉरिडोर को तबाह कर दिया. ISRO के नेशनल रिमोट सेंसिंग सेंटर द्वारा विश्लेषण की गई सैटेलाइट तस्वीरों से पता चला कि ग्लेशियर का लगभग दो-तिहाई हिस्सा अलग हो गया था. 24 अगस्त की सेंटिनल-2 तस्वीर में ग्लेशियर सही-सलामत दिख रहा था, जबकि आपदा के बाद 26 अगस्त को ली गई लैंडसैट-9 तस्वीर में उस जगह पर एक बड़ा निशान (scar) दिखाई दिया जहां से ग्लेशियर टूटा था.
यह घटनाक्रम लगभग 5200 मीटर की ऊंचाई पर शुरू हुआ, जहां ग्लेशियर का एक बड़ा हिस्सा टूटकर अलग हो गया. फ्लैश फ्लड की खास बातेंः
- नेपाल के रसुवा ज़िले में अचानक आई बाढ़ की वजह ग्लेशियर का टूटना था.
- ज़्यादा ऊंचाई वाले ग्लेशियर का लगभग दो-तिहाई हिस्सा टूटकर करीब 1.2 किलोमीटर नीचे गिर गया.
- 24 अगस्त की सेंटिनल-2 तस्वीर में ग्लेशियर सही-सलामत दिखा, जबकि 26 अगस्त की लैंडसैट-9 तस्वीर में एक बड़ा निशान दिखाई दिया.
- जियोमॉर्फोलॉजिस्ट डैनियल शुगर ने अनुमान लगाया कि लगभग 200 वर्ग मीटर बर्फ टूटकर अलग हुई थी.
- यह घटना नेपाल-तिब्बत बॉर्डर के नेपाली हिस्से में लगभग 5200 मीटर की ऊंचाई पर हुई.
टाइम्स ऑफ़ इंडिया की एक रिपोर्ट के अनुसार, कैलगरी यूनिवर्सिटी के जियोमॉर्फोलॉजिस्ट डैनियल शुगर ने प्लैनेट लैब्स की तस्वीरों का इस्तेमाल करके अनुमान लगाया कि लगभग 200 स्क्वेयर मीटर बर्फ़ टूटकर अलग हुई और फिर लगभग 1.2 किलोमीटर सीधे नीचे घाटी की सतह पर गिरी. इतनी ऊंचाई से सीधे नीचे गिरने के कारण गुरुत्वाकर्षण एनर्जी में बदल गई, जिससे गिरती हुई बर्फ़ एक ठोस ब्लॉक के रूप में रहने के बजाय टुकड़ों में बंट गई और अपने साथ ढीली मिट्टी-पत्थर (मलबे) को भी बहा ले गई. जैसे-जैसे यह लीक्वड फॉर्म में नीचे आया और इसका आकार और फैलाव तेजी से बढ़ता गया.
वैज्ञानिकों ने बताया कि टूटते हुए ग्लेशियर ने अपने साथ चट्टानें, बर्फ़, तलछट, पेड़ और अन्य मलबा इकट्ठा कर लिया, जिससे बर्फ़ के टूटने की घटना एक बहुत बड़े मलबे के बहाव (debris flow) में बदल गई. ‘अर्थ साइंसेज न्यूजीलैंड’ के मुख्य वैज्ञानिक साइमन कॉक्स ने इस प्रोसेस को ग्लेशियर के ढहने और उसके बहुत बड़े मलबे के बहाव में बदलने के तौर पर बताया.
गाद और चट्टानों की बाढ़
नीचे की ओर बहने वाली गाद, चट्टान के टुकड़े, मलबे और अन्य चीजों ने बाढ़ के स्वरूप को पूरी तरह बदल दिया और इसे विनाशकारी बना दिया. सैन एंटोनियो में टेक्सास विश्वविद्यालय के जल-वैज्ञानिक (हाइड्रोलॉजिस्ट) हातिम शरीफ ने कीचड़ और पानी के ऐसे तेज़ बहाव को लिक्विड कंक्रीट जैसा बताया, क्योंकि वे गाड़ियों, बिल्डिंग्स और यहां तक कि बड़े पत्थरों के चारों ओर से बहने के बजाय उन्हें अपने साथ बहा ले जा सकते हैं. यह ढहने की घटना इतनी भयानक थी कि इसे भूकंप मापने वाले यंत्रों (सिस्मिक इंस्ट्रूमेंट्स) पर भी दर्ज किया गया. यानी इसकी स्पीड और चट्टानों की टूट-फूट ऐसी थी, जिससे आस-पास के एरिया में भूकंप के झटके लगने जैसा फील हुआ.
सैटेलाइट तस्वीरों से क्या पता चला?
सैटेलाइट तस्वीरों ने ग्लेशियर की ‘पहले और बाद’ की स्थिति दिखाई. 24 अगस्त की सेंटिनल-2 तस्वीर में ढहने से पहले का ग्लेशियर दिखाई दिया. दो दिन बाद, लैंडसैट-9 की तस्वीर में एक बड़ा निशान दिखाई दिया जहां से ग्लेशियर टूटा था. तस्वीरों से बर्फ और चट्टानों के हिमस्खलन (एवलांच) का रास्ता भी पता चला जो नदी की ओर बढ़ा. यह घटना नेपाल-तिब्बत सीमा के नेपाली हिस्से में हुई, जिसके बाद मलबा और बाढ़ का पानी नीचे नदी प्रणाली में चला गया.
बाढ़ इतनी विनाशकारी क्यों थी?
इसकी मुख्य वजह ‘चेन रिएक्शन’ थी, जिसे एक के बाद एक होने वाली प्रतिक्रिया कहा जाता है. जैसे ही ग्लेशियर टूटा, बर्फ लगभग 1.2 किलोमीटर नीचे गिरी. फिर इसने चट्टानों और तलछट (सेडिमेंट) को अपने साथ ले लिया और मलबे ने कुछ समय के लिए नदी का रास्ता रोक दिया. आखिरकार, प्राकृतिक बांध (मौरेन) टूट गया और मलबे से भरा पानी तेजी से नीचे की ओर बहने लगी. पानी, बर्फ, चट्टान, कीचड़, हिमपात जैसी चीजों के मिक्सचर ने बाढ़ को भारी विनाशकारी शक्ति दी. इस आपदा ने बहुत कम समय में भोटे कोशी-त्रिशूली कॉरिडोर के किनारे बुनियादी ढांचे और रिहाइश को उखाड़ फेंका. इस घटना का दोबारा विश्लेषण जरूरी है क्योंकि शुरुआत में इस आपदा को भूकंपीय गतिविधि और भूकंप से जुड़ी घटना माना जा रहा था. लेटेस्ट सैटेलाइट और वैज्ञानिक आकलन से पता चलता है कि ग्लेशियर का ढहना ही मुख्य कारण था, जिसके परिणामस्वरूप हिमस्खलन और मलबे का बहाव हुआ और विनाशकारी बाढ़ आई.

