Last Updated:
Khairatabad Tomb: हैदराबाद के खैरताबाद में करीब 400 साल पुराना एक अनोखा मकबरा आज भी लोगों के लिए रहस्य बना हुआ है. कुतुब शाही दौर में उस्ताद अखुंद मुल्ला अब्दुल मलिक के लिए बनवाए गए इस मकबरे में आज तक कोई कब्र नहीं बनी. बताया जाता है कि हज के सफर के दौरान मक्का में ही उनका इंतकाल हो गया, जिसके बाद उनका शव हैदराबाद नहीं लाया जा सका.
निज़ामों और कुतुब शाही दौर की ऐतिहासिक इमारतों से सजे हैदराबाद शहर में कई ऐसे राज़ दफ़न हैं, जो आज भी लोगों को हैरान कर देते हैं. ऐसा ही एक अनोखा और अनसुना इतिहास शहर के व्यस्त इलाके ख़ैरताबाद में छुपा हुआ है. यहां क़रीब 400 साल पुराना एक ऐसा मक़बरा मौजूद है जिसके अंदर आज तक कोई क़ब्र नहीं बनी, यह पूरी तरह ख़ाली है.
कुतुब शाही वास्तुकला की मिसाल पेश करने वाला यह मक़बरा 17वीं सदी का है, इसका निर्माण गोलकुंडा के छठे सुल्तान मुहम्मद कुतुब शाह के दौर में कराया गया था. एतिहासिक दस्तावेज के मुताबिक, सुल्तान की बेटी राजकुमारी ख़ैरुन्निसा बेगम जिन्हें प्यार से मां साहेबा भी कहा जाता था उनके धार्मिक शिक्षक और उस्ताद अखुंद मुल्ला अब्दुल मलिक थे.
राजकुमारी अपने उस्ताद का बेहद सम्मान करती थी, उन्हीं के सम्मान में ख़ैरताबाद की मशहूर मस्जिद बनवाई गई थी और उसी परिसर में यह मक़बरा तैयार किया गया था, ताकि वफ़ात के बाद शिक्षक को यहां सुपुर्द-ए-ख़ाक किया जा सके.
Add News18 as
Preferred Source on Google
मगर क़ुदरत को कुछ और ही मंज़ूर था, मक़बरा बनकर तैयार हुआ, लेकिन इसके मुकद्दर में अपने हक़दार का इंतज़ार ही लिखा था. स्थानीय लोगों द्वारा बताया जाता है कि अखुंद मुल्ला अब्दुल मलिक जब मुक़द्दस हज के सफ़र पर मक्का रवाना हुए, तो रास्ते में ही उनका इंतकाल हो गया.
इस्लामी रिवायतों के मुताबिक उनका अंतिम संस्कार उसी पवित्र सरज़मीं पर कर दिया गया. इस वजह से उनका शव कभी हैदराबाद नहीं लौट सका और यह मक़बरा हमेशा के लिए ख़ाली रह गया.
चार सदियों का इतिहास समेटे इस मक़बरे की बनावट आज भी कुतुब शाही हुनर की गवाही देती है. इसका विशाल गुंबद, मेहराबदार दर-ओ-दीवार और प्लास्टर पर की गई बारीक नक्काशी देखने लायक है. हालांकि, आज यह ऐतिहासिक धरोहर कंक्रीट के जंगलों और रिहायशी इमारतों के बीच अपनी पहचान खोती नज़र आ रही है, गुंबद पर दरारें और उगी झाड़ियां इसकी बदहाली बयां करती हैं.

