चीन बॉर्डर के पास भारत ने रच दिया इतिहास, बना दी सबसे लंबी जोजिला सुरंग
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Zojila tunnel kashmir to ladakh: भारत ने भारत-चीन सीमा के पास इतिहास रच दिया है. कश्मीर और लद्दाख को जोड़ने वाली जोजिला टनल का सफलतापूर्वक ब्रेकथ्रू आज 9 जून को कर लिया गया है. 13.15 किलोमीटर लंबी जोजिला टनल दुनिया की सबसे लंबी सिंगल-ट्यूब, हाई-एल्टीट्यूड, बाय-डायरेक्शनल रोड टनल है, जो कश्मीर और लद्दाख को जोड़ने जा रही है. आइए जानते हैं इसके बारे में…
श्रीनगर-कारगिल-लेह हाईवे पर स्थित जोजिला पास उस इलाके की ही नहीं बल्कि भारत की जीवनरेखा है लेकिन अक्सर सर्दी के मौसम में यह अभिशाप बन जाता था. जब यहां बर्फीले तूफान, हिमस्खलन और माइनस तापमान के कारण पूरा इलाका महीनों तक देश के बाकी हिस्से से कट जाता था. हालांकि 9 जून को यह दौर खत्म हो गया. मजदूरों ने जोजिला टनल का आखिरी ब्रेकथ्रू पूरा किया और इतिहास लिख दिया गया. अब यह दुनिया की सबसे लंबी सिंगल-ट्यूब, दो-तरफा रोड टनल बनने जा रही है, जो ऊंचाई पर बनी है.
इस प्रोजेक्ट में 1,200 से ज्यादा मजदूरों ने 9 साल तक दुनिया के सबसे दुर्गम इलाके में खुदाई की है. इस इलाके में तापमान माइनस 20 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच जाता है और कभी कभी माइनस 30 डिग्री तक भी पहुंच जाता है, जिससे मजदूर साल में करीब 100 दिन ही काम कर पाते थे. इसके बावजूद, अप्रैल 2026 तक इस प्रोजेक्ट में एक करोड़ से ज्यादा सुरक्षित मैन-आवर्स दर्ज किए गए जो अपने आप में एक रिकॉर्ड है, खासकर भारत के इतने कठिन इलाके में ऐसा पहली बार हुआ है.
13.153 किलोमीटर लंबी मुख्य टनल ऐसी चट्टानों से होकर गुजरती है, जिनका स्वरूप 67 बार बदला. चट्टान और बर्फ से बदलते भूगोल के कारण इंजीनियरों को लगातार अपनी रणनीति बदलनी पड़ी. इंजीनियरों ने न्यू ऑस्ट्रियन टनलिंग मेथड (NATM) का इस्तेमाल किया, जिसमें खुदाई और सपोर्ट की रणनीति को शॉटक्रीट और रॉक बोल्ट्स के जरिए मौके पर ही बदला गया. यह तरीका हिमालयी टनल प्रोजेक्ट्स में लोकप्रिय हो रहा है, लेकिन इतनी ऊंचाई और इतने बड़े पैमाने पर इसका इस्तेमाल पहली बार हुआ है.
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इसमें अलग से कोई एस्केप टनल नहीं है, इसलिए इंजीनियरों ने वेंटिलेशन और इमरजेंसी निकासी के लिए तीन बड़े वर्टिकल शाफ्ट बनाए हैं. सबसे बड़ा शाफ्ट पश्चिमी छोर पर है और पहाड़ के अंदर 474.3 मीटर गहरा है, जो भारत का सबसे गहरा वर्टिकल शाफ्ट है. दूसरा 367.38 मीटर और तीसरा 213.5 मीटर गहरा है. ये सभी मिलकर टनल को पूरी लंबाई में सुरक्षित और सांस लेने लायक बनाते हैं.
इस टनल को बनाने के दौरान प्रकृति ने कई बार चुनौती दी. पांच बड़े हिमस्खलन घटनाएं पिछले पांच साल में प्रोजेक्ट साइट पर हुईं. सबसे गंभीर घटना 12 जनवरी 2023 को सरबल के निलगर टनल के पास हुई, जिसके कुछ दिन बाद दूसरा हिमस्खलन हुआ और मजदूर टनल में फंस गए. भारतीय सेना ने 172 से ज्यादा लोगों को बचाया. फरवरी 2024 और मार्च 2025 में और भी हिमस्खलन हुए, जिससे उपकरणों को नुकसान पहुंचा और काम रुक गया लेकिन निर्माण ज्यादा देर तक नहीं रुका.
जब भारी बर्फबारी से पहुंच मार्ग बंद हो गए, तो विशेष स्नो ब्लोअर और भारी मशीनरी लगाई गई ताकि प्रोजेक्ट चलता रहे और हाईवे के कुछ हिस्से खुले रहें. 1,100 लोगों के लिए पूरी तरह सुसज्जित बेस कैंप 24 घंटे चालू रखा गया, जिसमें डॉक्टर, मौसम के अनुसार खाना, परिवहन और इमरजेंसी सपोर्ट था ताकि जोजिला की कड़ी सर्दी भी काम को पूरी तरह रोक न सके.
जोजिला टनल 30.894 किलोमीटर लंबे कॉरिडोर का मुख्य हिस्सा है, जिसमें मुख्य टनल के अलावा और भी बहुत कुछ है. निलगर ट्विन टनल 457.35 मीटर और 1,953.63 मीटर लंबी 2.35 किलोमीटर कट-एंड-कवर स्ट्रक्चर, 450 मीटर स्नो गैलरी और तीन बड़े पुल (कुल 460 मीटर) के साथ हैं. पहला बड़ा पैकेज, जिसमें पहुंच मार्ग, पुल और स्नो गैलरी शामिल है, मार्च 2025 में पूरा हुआ.
यह टनल जम्मू-कश्मीर के सोनमर्ग के पास बालटाल से लद्दाख के द्रास में मिनामर्ग तक जाती है. इसका निर्माण मेगा इंजीनियरिंग एंड इन्फ्रास्ट्रक्चर लिमिटेड (MEIL) द्वारा नेशनल हाईवे एंड इन्फ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट कॉरपोरेशन (NHIDCL) के लिए किया जा रहा है. जो कठिन इलाकों में कनेक्टिविटी के लिए केंद्र सरकार की विशेष एजेंसी है. जब यह टनल यातायात के लिए खुलेगी, तो कश्मीर घाटी और लद्दाख केंद्र शासित प्रदेश को हर मौसम और हर हाल में जोड़े रखेगी.
9 जून का ब्रेकथ्रू कई कठिन उपलब्धियों का नतीजा है: 14 अक्टूबर 2020 को निलगर टनल में पहली ब्लास्टिंग, नवंबर 2021 से अप्रैल 2022 के बीच दोनों ट्यूब का ब्रेकथ्रू, नवंबर 2023 में पूर्वी वेंटिलेशन शाफ्ट का पूरा होना और जुलाई 2025 में भारत का सबसे लंबा वर्टिकल शाफ्ट बनना. हर उपलब्धि ने देश के सबसे रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण पर्वतीय कॉरिडोर को बदलने के सपने को करीब लाया. अब इस टनल को खोलने का सपना जल्द पूरा होगा.
9 जून का ब्रेकथ्रू मंजिल नहीं है. अभी टनल लाइनिंग, वेंटिलेशन सिस्टम, बिजलीकरण, सुरक्षा इंतजाम और फिनिशिंग का काम बाकी है, उसके बाद ही पहली गाड़ी यहां से गुजरेगी. लेकिन कारगिल, द्रास और लेह वे समुदाय हैा जो पीढ़ियों से मौसमी अलगाव झेलते आए हैं और भारतीय सेना, जिसकी उत्तरी सीमा की लॉजिस्टिक्स इसी कॉरिडोर पर निर्भर है, उनके लिए सबसे मुश्किल हिस्सा अब खत्म हो गया है. जोजिला टनल ने रास्ता बना लिया है. अब सैनिकों से लेकर स्थानीय निवासियों को बेहतरीन सुविधा मिलेगी.

