TVK JCD Prabhakar elected Tamil Nadu Speaker: तमिलनाडु को नया स्पीकर मिल गया. टीवीके नेता जेसीडी प्रभाकर को तमिलनाडु विधानसभा का स्पीकर चुना गया है. थलापति विजय ने अनुभवी नेता जेसीडी प्रभाकर पर ही अपना भरोसा जताया है. इसके साथ ही जेसीडी प्रभाकर मुख्यमंत्री थलापति विजय की पहली सरकार के सबसे अहम चेहरों में से एक हो गए हैं. जहां एक ओर टीवीके का उदय काफी हद तक विजय के स्टार पावर और राजनीतिक लहर से जोड़ा जाता है, वहीं प्रभाकर का चयन कुछ अलग संकेत देता है. वह है अनुभव, प्रक्रियागत ज्ञान और पहली बार बनी टीवीके सरकार के केंद्र में पुरानी शैली की विधायी राजनीति.
दरअसल, जेसीडी प्रभाकर दशकों से तमिलनाडु की राजनीति का जाना-पहचाना चेहरा रहे हैं. वे ऐसे नेता हैं, जिन्होंने सरकारों का बनना-बिगड़ना, सत्ता केंद्रों का बदलना और पार्टियों का खुद को नए सिरे से गढ़ना देखा है. कई युवा वोटरों के लिए प्रभाकर शायद टीवीके के स्टार पावर के मुकाबले कम चर्चित चेहरा लग सकते हैं. लेकिन तमिलनाडु की राजनीतिक गलियारों में उनके चयन को एक सोच-समझकर लिया गया फैसला माना जा रहा है. विजय ने यूं ही जेसीडी प्रभाकर को नहीं चुना है. जेसीडी प्रभाकर विधानसभा की बारीकियों को अच्छी तरह समझता हैं. वह पहली बार सत्ता में आई टीवीके को सरकार और शासन की बारीकियां सीखा सकते हैं.
कौन हैं जेसीडी प्रभाकर?
अब सवाल है कि जेसीडी प्रभाकर कौन हैं? जेसीडी प्रभाकर की राजनीतिक यात्रा एमजीआर के दौर से शुरू होती है. वे पहली बार 1980 में विल्लिवक्कम से एआईएडीएमके विधायक बने और बाद में जयललिता के समय तक पार्टी के संगठन में सक्रिय रहे. कई सुर्खियों में रहने वाले नेताओं के उलट जेसीडी प्रभाकर ने अपनी पहचान चुपचाप, क्षेत्रीय काम, पार्टी संगठन और विधायी अनुभव के जरिए बनाई. समय के साथ वे पुराने चेन्नई के राजनेता के रूप में पहचाने जाने लगे, जिनके सभी राजनीतिक खेमों में अच्छे संबंध हैं.
जेसीडी प्रभाकर चुनौतियों और सुर्खियों से दूर रहने के बावजूद वे तमिलनाडु की राजनीति में प्रासंगिक बने रहे. अब उनका लंबा अनुभव उस विधानसभा में काम आएगा, जहां सत्तारूढ़ टीवीके और विपक्ष के बीच तीखी टक्कर की उम्मीद है.
थलापति विजय ने उन्हें क्यों चुना
थलापति विजय जानते हैं कि उनकी पार्टी नई है. डीएमके और एआईडीएमके के सामने सरकार चलाना आसान नहीं. सियासत के दांव-पेच समझने के लिए उन्हें ऐसे ही अनुभवी व्यक्ति की तलाश थी, जो विपक्ष के हर दांव-पेच को काट सके. ऐसे में जेसीडी प्रभाकर टीवीके के लिए बेहतर पसंद हैं. इस साल की शुरुआत में जेसीडी प्रभाकर का तमिलगा वेत्त्री कझगम (टीवीके) में आना चर्चा का विषय बना, क्योंकि इससे टीवीके की मंशा साफ हुई कि वह अनुभवी नेताओं को भी अपनी पार्टी में शामिल करना चाहती है, जो अब तक विजय की लोकप्रियता के इर्द-गिर्द केंद्रित थी.
- उनकी उम्मीदवारी खुद थाउजेंड लाइट्स सीट से आई, जो चेन्नई की राजनीति में हमेशा अहम रही है. वहां से किसी अनुभवी को उतारना यह दिखाता है कि टीवीके सिर्फ चुनावी ताकत ही नहीं, बल्कि विश्वसनीयता भी चाहती है.
- अब उन्हें स्पीकर बनाकर विजय ने एक और संदेश दिया है – भले ही टीवीके नई राजनीतिक ताकत हो, लेकिन सरकार विधानसभा की जिम्मेदारी अनुभवी हाथों को सौंपना चाहती है.
- तमिलनाडु में स्पीकर की भूमिका कभी भी सिर्फ औपचारिक नहीं रही. इस पद पर बैठा व्यक्ति राजनीतिक संकटों के समय केंद्र में आ जाता है- चाहे विपक्ष के विरोध-प्रदर्शन हों, वॉकआउट हों या प्रक्रियागत और पार्टी ताकत को लेकर विवाद.
दो राजनीतिक युगों के बीच सेतु
कई मायनों में जेसीडी प्रभाकर तमिलनाडु की पुरानी द्रविड़ राजनीति और उभरते पोस्ट-डीएमके बनाम एआईएडीएमके दौर के बीच सेतु हैं. वे एमजीआर और जयललिता के दौर की राजनीति से आए हैं, लेकिन अब एक अभिनेता से मुख्यमंत्री बने विजय के नेतृत्व में विधानसभा चलाने में मदद कर रहे हैं, जो राज्य की राजनीति को नए सिरे से परिभाषित करना चाहते हैं.
टीवीके के लिए उनका संस्थागत अनुभव बेहद अहम हो सकता है.
क्योंकि जहां विजय की लोकप्रियता ने मतदाताओं को जोश से भर दिया है, वहीं विधानसभा चलाने के लिए अलग तरह की योग्यता चाहिए- धैर्य, प्रक्रियागत समझ, बातचीत की कला और राजनीतिक संतुलन. माना जाता है कि प्रभाकर ये सभी खूबियां लेकर आए हैं.
आगे की चुनौती
उनका स्पीकर कार्यकाल आसान नहीं रहने वाला है. तमिलनाडु की राजनीति अभी भी गहराई से बंटी हुई है और विधानसभा में विपक्ष के तीखे हमले देखने को मिल सकते हैं, क्योंकि 2026 के चुनावी नतीजों के बाद पार्टियां खुद को नए सिरे से स्थापित कर रही हैं. ऐसे में व्यवधानों को संभालना और निष्पक्षता बनाए रखना अनुभवी विधायकों के लिए भी चुनौतीपूर्ण होगा.
जेसीडी प्रभाकर की नियुक्ति सिर्फ एक व्यक्ति का चयन नहीं, बल्कि इससे कहीं बड़ी बात सामने आती है. यह दिखाता है कि तमिलनाडु में राजनीतिक बदलाव किस तरह हो रहा है- नई सत्तारूढ़ ताकत पुराने सिस्टम के अनुभवी नेताओं पर भरोसा कर रही है ताकि सरकार को स्थिरता मिल सके.

