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Jantar Mantar Violence: जंतर मंतर में 20 मई को हुई हिंसा को लेकर सुरक्षा एजेंसियों ने अपनी जांच शुरू कर दी है. जांच एजेंसियां यह पता लगाने में जुटी है कि कैसे शांतिपूर्वक चल रहा प्रदर्शन अचानक हिंसक हो गया. इसमें किन-किन ग्रुप्स का हाथ है. साथ ही, जांच इस बात की भी की जा रही है कि क्या इस प्रदर्शन को पाकिस्तान या दूसरे किसी देश से तो लीड नहीं किया जा रहा है.
जंतर मंतर हिंसा की प्रारंभिक जांच में कई चौंकाने वाली बाते सामने आई हैं.
Jantar Mantar Violence: दिल्ली के जंतर-मंतर पर नीट-यूजी उम्मीदवारों और सोशल एक्टिविस्ट सोनम वांगचुक के समर्थन में शुरू हुआ शांतिपूर्ण धरना आखिर हिंसा तक कैसे पहुंच गया? क्या यह सिर्फ भीड़ के बेकाबू होने का मामला था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश थी? अब इसी एंगल से सुरक्षा एजेंसियों ने अपनी जांच शुरू कर दी है. जांच इस बात की भी की जा रही है कि इस हिंसा को संभालने में सुरक्षा एजेंसियों क्यों नाकाम हो गईं. अबतक की जांच में जो बातें सामने आई हैं, उनमें इंटेलिजेंस की नाकामी, मोबाइल नेटकर्व बंद होने के बावजूद डिजिटल कम्युनिकेशन और हिंसा में पाकिस्तानी कनेक्शन ने नए सवाल खड़े कर दिए हैं.
रिपोर्ट के मुताबिक, जंतर-मंतर पर बीते करीब 20 दिनों से प्रदर्शन शांतिपूर्ण तरीके से चलता रहा. लेकिन 20 जुलाई से पहले के आखिरी 72 घंटों में हालात तेजी से बदलने लगे. इसी समयावधि में कई बाहरी ग्रुप्स घुसपैठ कर इस आंदोलन में शामिल हो गए. जिसके बाद, आंदोलन का स्वरूप भी बदलना शुरू हो गया. जांच एजेंसियां अब यह पता लगाने की कोशिश में जुटी हुई हैं कि यह सब अचानक कैसे हो गया. यह सब अनयास ही हो गया, या फिर पहले से बनाई गई किसी साजिश का हिस्सा था.
इंटेलिजेंस एजेंसियों की बड़ी चूक थी यह हिंसा
रिपोर्ट के अनुसार, कॉकरोच जनता पार्टी ने 20 जून को ‘संसद चलो’ मार्च का आह्वाहन किया था. इंटेलिजेंस एजेंसीज का अनुमान था कि इस मार्च में करीब सात से आठ हजार लोग शामिल हो सकते हैं. लेकिन, 20 को इस मार्च के लिए 50 हजार से भी ज्यादा लोगों की भीड़ जुट गई. इसका नतीजा यह हुआ कि लॉ एण्ड ऑर्डर मेंटेन करने के लिए तैनात किए गए जवानों की संख्या कम पड़ गई. हालात तेजी से बिगड़ते चले गए. इतनी बड़ी भीड़ को रोकने के लिए सिक्योरिटी फोर्सेस को कड़ी मशक्कत करनी पड़ी. वहीं, पड़ोसी राज्यों की इंटेलिजेंस यूनिट्स भी हजारों लोगों की दिल्ली की तरफ हो रही मूवमेंट का सही आकलन नहीं कर सके. इसे भी जांच में इंटेलिजेंस का बड़ा फेल्योर माना जा रहा है.
‘संसद चलो’ मार्च से पहले क्या हुई थी तैयारी?
- जांच रिपोर्ट में यह बात भी सामने आई है कि 20 जुलाई के ‘संसद चलो’ मार्च से पहले कुछ उपद्रवी तत्वों ने जंतर-मंतर के आसपास पत्थर, लाठियां और दूसरी चीजें पहले से जमा कर ली थीं. रिपोर्ट के मुताबिक, यह सब उस समय हुआ जब इलाके में निषेधाज्ञा लागू थी. एजेंसियां यह पता लगाने में जुटी हैं कि ये सामान वहां कैसे पहुंचा और इसके पीछे कौन लोग थे.
- अब तक की जांच में यह बात भी सामने आई है कि जैसे-जैसे नए समूह प्रदर्शन में सक्रिय होते गए, वैसे-वैसे आंदोलन के मूल नेतृत्व का भीड़ पर नियंत्रण कमजोर पड़ने लगा. दावा यह भी किया गया है कि बार-बार रोकने के बावजूद प्रदर्शनकारियों के कुछ समूहों ने हाई-सिक्योरिटी जोन की तरफ बढ़ने की कोशिश की. इसी दौरान तनाव इस कदर बढ़ा कि हालात हिंसा तक पहुंच गए.
- जांच में सामने आया है कि प्रदर्शन के दौरान कई तरह की अपुष्ट अफवाहें तेजी से फैलने लगी थीं. भीड़ के बीच यह अफवाह भी फैलाई गई कि आंदोलन के कई बड़े नेताओं को हिरासत में लिए जाने के दौरान गंभीर चोटें आईं हैं या उनकी मौत हो गई है. माना जा रहा है ऐसी अफवाहों ने भीड़ के बड़े हिस्से को भड़काने का काम किया.
- जांच में यह बात भी सामने आई है कि इंटरनेट बंद होने से ठीक पहले कई बड़े सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर्स एक्टिव हो गए, जिनका इस प्रदर्शन से कोई सीधा संबंध नहीं था. इन इन्फ्लुएंसर्स ने लोगों को न केवल उकसाया, बल्कि प्रदर्शन में शामिल होने की अपील वाले वीडियो पोस्ट किए थे.
मोबाइल इंटरनेट बंद था, फिर भी कैसे चलता रहा कम्युनिकेशन?
इंटरनल रिपोर्ट का सबसे चौंकाने वाली बात मोबाइल टेक्नोलॉजी को लेकर सामने आई है. सूत्रों के मुताबिक, मोबाइल इंटरनेट और कम्युनिकेशन सर्विस पर पाबंदी लगाने के बावजूद कुछ लोगों ने कथित तौर पर ऑफलाइन पीयर-टू-पीयर ब्लूटूथ मेश नेटवर्किंग ऐप्स का इस्तेमाल कर लगातार मैसेज फ्लैश कर रहे थे. ऐसे ऐप्स बिना मोबाइल नेटवर्क या इंटरनेट के भी एक डिवाइस से दूसरी डिवाइस तक मैसेज पहुंचाने में सक्षम होते हैं. अगर कई डिवाइस आपस में जुड़े हों, तो मैसेज को आगे बढ़ते हुए बड़े इलाके तक पहुंच सकता है. फिलहाल एजेंसियां जांच कर रही हैं कि क्या वास्तव में ऐसे ऐप्स का इस्तेमाल प्रदर्शन के दौरान तालमेल बनाने के लिए किया गया था.
क्या हिंसा का था पाकिस्तान से कोई कनेक्शन?
20 जून को हुई हिंसा में पाकिस्तानी कनेक्शन को लेकर भी सवाल खड़े हुए हैं. इसके अलावा, एजेंसियां डिजिटल ‘टूलकिट’ को लेकर भी अपनी जांच आगे बढ़ा रही हैं. सूत्रों के मुताबिक, सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि क्या सरकार-विरोधी नेटवर्क ने इस पूरे आंदोलन को डिजिटल तरीके से बढ़ावा दिया गया. जांच में पाकिस्तान या अन्य विदेशी जगहों से ऑपरेट होने वाले कुछ ग्रुप्स की भूमिका की भी जांच की जा रही है. साथ ही यह भी जांच हो रही है कि क्या लोगों को उकसाने और विरोध प्रदर्शन को लेकर किसी ऑर्गनाइज्ड ‘टूलकिट’ का इस्तेमाल किया गया था. फिलहाल इन सभी पहलुओं की जांच जारी है.
जांच में घेरे में आए वायरल वीडियो
सूत्रों के अनुसार भारतीय सेना के जवानों को प्रदर्शन का समर्थन करते हुए दिखाने वाले कई वायरल वीडियो फर्जी पाए गए हैं. एक-दो वीडियो की जांच अभी भी जारी है. जांच एजेंसियों का मानना है कि फेक वीडियोज को सर्कुलेट करना और 20 जुलाई की हिंसा आपस में जुड़े हो सकते हैं. फिलहाल, पूरा मामला जांच के दायरे में है. सुरक्षा एजेंसियां इंटेलिजेंस फेल्योर, भीड़ जुटाने के तरीके, डिजिटल कम्युनिकेशन, सोशल मीडिया कैंपेन, टूलकिट और पाकिस्तानी कनेक्शन समेत सभी पहलुओं की जांच कर रही हैं.
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Anoop Kumar Mishra is currently serving as Assistant Editor at News18 Hindi Digital, where he leads coverage of strategic domains including aviation, defence, paramilitary forces, international…
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