नई दिल्ली. भारत और यूरोप के बीच कल यानी 27 जनवरी को
फ्री ट्रेड एग्रीमेंट (FTA) पर सिग्नेचर होने जा रहा है. यह एक ऐतिहासिक पल होगा, जब भारत के व्यापारियों और कंपनियों के लिए यूरोप के बाजार पूरी तरह खुलने जा रहे हैं. यह डील भारत की इकोनॉमी के लिए ‘गेम चेंजर’ मानी जा रही है. लेकिन, आज जब हम इस सफलता का जश्न मनाने की तैयारी कर रहे हैं, तो हमें 25 साल पीछे मुड़कर देखना होगा. इस मजबूत रिश्ते की पहली ईंट पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने ही रखी थी. आज जो इमारत खड़ी हो रही है, उसका नक्शा वाजपेयी जी ने बहुत पहले ही खींच दिया था.
अक्सर माना जाता था कि भारत और
यूरोप के रिश्ते सिर्फ लेन-देन तक सीमित हैं. लेकिन अटल बिहारी वाजपेयी ने इस सोच को बदला. जून 2000 में, वह पुर्तगाल की राजधानी लिस्बन गए थे. यही वह जगह थी जहां पहला भारत-यूरोप शिखर सम्मेलन (First India-EU Summit) हुआ था. वाजपेयी ने ही यह तय किया कि भारत और यूरोप के नेता अब कभी-कभार नहीं, बल्कि हर साल मिलेंगे और बड़े मुद्दों पर बात करेंगे.
2002 का वह वाजपेयी का वो भाषण
आज जिस ‘फ्री ट्रेड’ और साझेदारी की बात हो रही है, उसका विजन वाजपेयी ने 2002 में ही दुनिया को बता दिया था. भारत-यूरोपीय संघ के बिजनेस समिट में बोलते हुए उन्होंने एक बहुत गहरी बात कही थी. उन्होंने कहा था, हमारे हालात और हमारे संस्कार यानी कोर वैल्यू काफी मिलते-जुलते हैं. हम दोनों ही इस दुनिया के बड़े खिलाड़ी हैं. हम दोनों जगह अलग-अलग भाषाएं हैं, अलग-अलग कल्चर हैं, लेकिन फिर भी हम लोकतंत्र को सबसे ऊपर रखते हैं. वाजपेयी का कहना था कि भारत और यूरोप ‘नेचुरल पार्टनर’ हैं. उस समय उन्होंने एक टीस भी जाहिर की थी. उन्होंने कहा था- भारत और यूरोप के सबसे समझदार लोगों ने इस सपने को देखा तो है, लेकिन यह सपना अब तक हकीकत नहीं बन पाया है.
कल सच होने जा रहा है वाजपेयी का सपना
वाजपेयी ने 25 साल पहले जिस ‘हकीकत’ के दूर रहने की बात कही थी, कल 27 जनवरी को वह पूरी होने जा रही है. 25 साल पहले वाजपेयी ने जिस ‘शिखर सम्मेलन’ की शुरुआत की थी, कल उसका 16वां दौर है. यूरोपियन काउंसिल के प्रेसिडेंट एंटोनियो लुइस सांतोस दा कोस्टा और यूरोपियन कमीशन की प्रेसिडेंट उर्सुला वॉन डेर लेयेन खुद भारत में मौजूद हैं. वे गणतंत्र दिवस के मेहमान बने और अब 27 जनवरी को इस ऐतिहासिक
ट्रेड डील पर मुहर लगाएंगे.
क्यों यह बुनियाद इतनी जरूरी थी?
अगर वाजपेयी ने साल 2000 में यूरोप के साथ नियमित बातचीत का सिलसिला शुरू न किया होता, तो आज इतना बड़ा भरोसा पैदा नहीं हो पाता. किसी भी ट्रेड डील के लिए दो देशों के बीच विश्वास होना सबसे जरूरी है. वाजपेयी ने दुनिया को समझाया कि भारत सिर्फ एक बाजार नहीं है, बल्कि एक जिम्मेदार लोकतांत्रिक ताकत है. कल जब इस एग्रीमेंट पर साइन होंगे, तो यह सिर्फ एक कागजी समझौता नहीं होगा. यह उस विजन की जीत होगी जो अटल बिहारी वाजपेयी ने ढाई दशक पहले देखा था कि भारत और यूरोप मिलकर दुनिया की दिशा बदल सकते हैं.