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High Court News: तेलंगाना हाईकोर्ट का अहम फैसला आया है. मृतक के कर्ज की वसूली उसकी विरासत में मिली संपत्ति तक ही सीमित रहेगी. उसकी वसूली कर्जदार की मौत के बाद उसकी पत्नी, बच्चों की निजी संपत्ति को जब्त नहीं कि…और पढ़ें

कर्जदार की मृत्यु होने पर लोन का भुगतान कौन करेगा, हाईकोर्ट ने दिया बड़ा फैसला
नई दिल्ली. अगर किसी व्यक्ति की मौत हो जाए और उसके नाम पर बैंक लोन या सरकारी बकाया बाकी हो तो क्या उसकी पत्नी और बच्चों को अपनी जेब से पूरा कर्ज चुकाना पड़ेगा? इस सवाल पर तेलंगाना हाईकोर्ट ने अहम फैसला सुनाया है. कोर्ट ने साफ कर दिया कि मृतक के कानूनी कर्ज की वसूली उसकी विरासत में मिली संपत्ति तक ही सीमित रहेगी. पत्नी, बच्चों या अन्य वारिसों की अपनी कमाई और निजी संपत्ति को जब्त नहीं किया जा सकता.
क्या था पूरा मामला?
यह मामला तेलंगाना के कामारेड्डी जिले से जुड़ा है. यहां पोस्टमास्टर श्रीनिवास रेड्डी पर महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना (मनरेगा) के तहत करीब 14.89 लाख रुपये के गबन का आरोप था. मामले की जांच चल रही थी लेकिन इसी दौरान उनकी मौत हो गई. मौत के बाद जिला प्रशासन ने बकाया राशि की वसूली के लिए परिवार की पैतृक कृषि भूमि को जब्त कर नीलाम करने की प्रक्रिया शुरू कर दी. इसके खिलाफ श्रीनिवास रेड्डी की पत्नी वी. यशोदा ने तेलंगाना हाईकोर्ट में याचिका दाखिल की.
हाईकोर्ट ने क्या कहा?
मामले की सुनवाई करते हुए न्यायमूर्ति अलिसेट्टी लक्ष्मीनारायण ने कहा कि किसी मृतक व्यक्ति के कानूनी कर्ज की वसूली उसके उत्तराधिकारियों से की जा सकती है लेकिन केवल उस संपत्ति की सीमा तक जो उन्हें विरासत में मिली हो. कोर्ट ने स्पष्ट किया कि पत्नी, बच्चों या अन्य वारिसों की अपनी मेहनत से अर्जित संपत्ति, वेतन, बैंक बैलेंस, निजी जमीन या मकान को जब्त करने का कोई कानूनी अधिकार सरकार या लेनदारों के पास नहीं है.
परिवार को कब देना होगा कर्ज?
हाईकोर्ट के फैसले के अनुसार यदि वारिसों को मृतक की संपत्ति विरासत में मिली है तो उसी संपत्ति के मूल्य तक कर्ज की वसूली की जा सकती है लेकिन यदि किसी वारिस की अपनी अलग कमाई या निजी संपत्ति है, तो उसे कर्ज चुकाने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता.
आम लोगों के लिए क्या मायने रखता है फैसला?
यह फैसला उन लाखों परिवारों के लिए राहत देने वाला माना जा रहा है, जिनके घर के कमाने वाले सदस्य की मौत के बाद बैंक या सरकारी विभाग वसूली की कार्रवाई शुरू कर देते हैं. कोर्ट ने साफ संदेश दिया है कि कानूनी उत्तराधिकारियों पर असीमित आर्थिक बोझ नहीं डाला जा सकता.

