नई दिल्ली (Gen Z Work Culture). सुबह 9 बजे ऑफिस पहुंचना, दिन भर बॉस की किचकिच सहना और शाम 5 बजे तक एक ही डेस्क पर बंधे रहना- आज की युवा पीढ़ी यानी ‘जेन जी’ (Gen Z) को यह ढर्रा बिल्कुल पसंद नहीं आ रहा है. एक ही कंपनी के भरोसे पूरी जिंदगी काट देने का विचार अब पुराना पड़ चुका है. आज के युवा किसी एक एंप्लॉयर के मोहताज रहने के बजाय अपनी स्किल्स के दम पर और अपनी शर्तों पर काम करना पसंद कर रहे हैं.
पॉली-वर्किंग क्या है और यह मूनलाइटिंग से अलग कैसे है?
अक्सर लोग पॉली-वर्किंग को ‘मूनलाइटिंग’ यानी चोरी-छिपे दूसरी नौकरी करने से जोड़कर देखते हैं, लेकिन ये दोनों अलग हैं. मूनलाइटिंग में व्यक्ति एक फुलटाइम जॉब के साथ छिपकर दूसरा काम करता है, जबकि पॉली-वर्किंग में सब कुछ एकदम ट्रांसपेरेंट और ओपन होता है. यहां युवा किसी एक कंपनी के फुलटाइम एंप्लॉई होते ही नहीं हैं. वे इंडिपेंडेंट प्रोफेशनल (Portfolio Worker) की तरह अलग-अलग प्रोजेक्ट्स और क्लाइंट्स के साथ काम करते हैं.
एक नौकरी का रिस्क खत्म, कमाई के रास्ते अनेक
जेन जी युवाओं का मानना है कि आज के दौर में सिर्फ एक नौकरी के भरोसे रहना सबसे बड़ा रिस्क है. लेऑफ (छंटनी) के मौजूदा दौर में अगर एक कंपनी से काम चला भी जाए तो पॉली-वर्किंग करने वालों के पास बाकी 2-3 क्लाइंट्स से कमाई जारी रहती है. इससे उन्हें फाइनेंशियल सिक्योरिटी मिलती है और एकदम से इनकम का सोर्स खत्म नहीं होता. इसमें कोई एक फिक्स सैलरी नहीं होती, बल्कि हर क्लाइंट से आने वाला पैसा मिलकर मोटी मंथली इनकम बना देता है.
लोकेशन की आजादी और फ्लेक्सिबल वर्किंग आवर्स
पॉली-वर्किंग का सबसे बड़ा फायदा है अपने समय का खुद मालिक होना. इस सिस्टम में काम करने वाले युवाओं को किसी फिक्स शिफ्ट में बंधना नहीं पड़ता. वे चाहें तो हिमाचल के पहाड़ों में बैठकर काम करें या अपने घर के किसी कोने में. उनका काम पूरा होना चाहिए, समय सीमा (Deadlines) पूरी होनी चाहिए, क्लाइंट्स की बस इतनी सी शर्त होती है. इससे उन्हें अपनी पसंद की हॉबीज और पर्सनल लाइफ के लिए भी पूरा समय मिल जाता है.
अलग-अलग स्किल्स और बर्नआउट से बचाव
पॉली-वर्किंग सिस्टम रोजाना एक ही तरह का काम करके होने वाली बोरियत से बचाता है. सुबह एक क्लाइंट के लिए सोशल मीडिया स्ट्रेटेजी बनाई तो दोपहर में दूसरे के लिए कोडिंग कर ली. काम में वैरायटी होने से दिमाग एक्टिव रहता है और बोरियत भी नहीं होती है. हालांकि, इसमें टाइम मैनेजमेंट का ध्यान रखना बहुत जरूरी होता है, वरना एक साथ कई प्रोजेक्ट्स की डेडलाइन्स से स्ट्रेस बढ़ सकता है और काम छूटने का रिस्क भी रहता है. विदेशी क्लाइंट मिलने पर डॉलर में कमाई का मौका रहता है.
इस सिस्टम में हैं कई तरह के चैलेंज
इस वर्किंग मॉडल में आजादी और पैसा तो खूब है, लेकिन कुछ चुनौतियां भी हैं. इसमें कोई पेड लीव (Paid Leave), हेल्थ इंश्योरेंस या प्रोविडेंट फंड (PF) जैसी सरकारी सुविधाएं नहीं मिलतीं. क्लाइंट्स ढूंढना और लगातार नया काम पाना भी बहुत बड़ा टास्क होता है. फिर भी अपनी आजादी और करियर के कंट्रोल को अपने हाथ में रखने के लिए जेन जी इस मॉडल को तेजी से अपना रही है.

