17 नवंबर को उत्तर प्रदेश में एमपी एमएलए कोर्ट ने समाजवादी पार्टी के नेता आजम खान और उनके बेटे अब्दुल्ला आजम को 2019 के दोहरे पैन कार्ड मामले में दोषी ठहराकर 7-7 साल की जेल की सजा सुनाई है. साथ ही दोनों पर 50-50 हजार रुपये का जुर्माना भी लगाया है. जानते हैं कि ये एमपी – एमएलए विशेष कोर्ट क्या होती हैं, जो केवल सांसदों और विधायकों के मामलों को डील करती हैं लेकिन आमतौर पर इनके फैसले हाईकोर्ट में जाने के बाद पलट दिए जाते हैं.
आरोप था कि अब्दुल्ला आजम ने अपनी उम्र छुपाने के लिए दो अलग-अलग जन्म प्रमाणपत्रों के आधार पर दो पैन कार्ड बनवाए. इन फर्जी पैन कार्डों का इस्तेमाल बैंक पासबुक और चुनाव नामांकन पत्रों में धोखाधड़ी करने के लिए किया गया था.
एमपी एमएलए कोर्ट एक विशेष न्यायालय है, ये हर राज्य में है, जो उस राज्य के विधायकों (एमएलए) और सांसदों (एमपी) से जुड़े मामलों की सुनवाई करता है. यह एक राज्य स्तरीय विशेष न्यायालय है जिसे भारत के सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर राज्यों में लोकप्रतिनिधियों के प्रकरणों की तेज सुनवाई और निष्पक्ष न्याय के लिए स्थापित किया गया है.
सवाल – एमपी-एमएलए विशेष कोर्ट हर राज्य में क्यों बनाई गई हैं. ये क्या करती हैं?
– एमपी-एमएलए कोर्ट भारत में कुछ विशेष राज्यों में बनाई गई विशेष अदालतें हैं, जो विशेष रूप से वर्तमान और पूर्व सांसदों तथा विधायकों के खिलाफ दर्ज आपराधिक मुकदमों की त्वरित सुनवाई करने के लिए बनाई गई हैं.
सवाल – इन विशेष अदालतों को क्यों बनाया गया, क्यों इनकी शुरुआत हुई?
– सुप्रीम कोर्ट का मानना था कि सांसदों – विधायकों के खिलाफ हजारों आपराधिक मामले बरसों से लंबित हैं, इनका त्वरित फैसला होना चाहिए. सुप्रीम कोर्ट ने नवंबर 2017 में और फिर 10 मार्च 2020 को एक ऐतिहासिक फैसले में इसे लेकर बहुत सख्ती दिखाई थी. जिसके बाद ही सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया कि हर राज्य में विशेष MP-MLA कोर्ट बनाई जाएं जो केवल इन्हीं मामलों की सुनवाई करेंगी. हर मामले को एक साल के भीतर निपटाना होगा.
सवाल – देशभर में सांसदों और विधायकों के खिलाफ कितने मामले चल रहे हैं?
– एमिकस क्यूरी की रिपोर्ट के अनुसार दिसंबर 2023 तक देश भर में करीब 5,000 से ज्यादा सांसद-विधायक आपराधिक मामलों में चल रहे हैं, जिसमें ये जनप्रतिनिधि आरोपी हैं, इसमें हत्या, बलात्कार और भ्रष्टाचार से संबंधित गंभीर मामले हैं.
सवाल – इन कोर्ट की संरचना कैसे होती है और नियुक्ति कौन करता है?
– ये सामान्य मजिस्ट्रेट या सेशन कोर्ट नहीं होतीं, बल्कि स्पेशल जज-मजिस्ट्रेट की कोर्ट होती हैं जिन्हें हाईकोर्ट की मंजूरी से नियुक्त किया जाता है. इनमें ज्यादातर मामले मजिस्ट्रेट लेवल के होते हैं. इन कोर्ट्स को बहुत तेजी से फैसला देना होता है, इसलिए कई बार गवाहों की पूरी जांच-पड़ताल नहीं हो पाती, सबूत कमजोर रह जाते हैं या कानूनी प्रक्रिया में जल्दबाजी होती है.
सवाल – हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट अक्सर इनके फैसले क्यों पलट देते हैं?
– जल्दबाजी में जब ये विशेष कोर्ट्स फैसला देती हैं तो उसमें कई तरह के अभाव रह जाते हैं, इसी वजह से अब इनके ज्यादातर मामले हाईकोर्ट या सुप्रीमकोर्ट में जाने पर पलट जा रहे हैं. कई मामलों में सबूतों का अभाव होता है तो कई पुराने मामले होते हैं, जिसमें गवाह मर चुके होते हैं या बयान बदल देते हैं. कई बार शिकायतें राजनीतिक बदले की भावना से दर्ज होती हैं, जिनमें बाद में सबूत नहीं टिकते. जब ये मामला हाईकोर्ट में पहुंचता है तो सांसद-विधायक महंगे वकील करते हैं जो हाईकोर्ट में पूरी कानूनी खामियां निकाल लेते हैं. उत्तर प्रदेश, बिहार, महाराष्ट्र, मध्यप्रदेश आदि में कई बड़े नेताओं की सजा हाईकोर्ट ने 2-3 महीने में ही रद्द कर दी.
सवाल – क्या ये सही है कि सुप्रीम कोर्ट अब इस पूरे सिस्टम की समीक्षा कर रहा है?
– दरअसल MP-MLA कोर्ट एक बहुत अच्छा कदम था राजनीति को अपराधमुक्त करने के लिए, लेकिन जल्दबाजी और दबाव के कारण इनकी दोषसिद्धि की दर बहुत कम और अपील में उलटने की दर बहुत ज्यादा हो गई. अब सुप्रीम कोर्ट फिर से इस पूरे सिस्टम की समीक्षा कर रहा है कि कैसे इन कोर्ट्स को और प्रभावी बनाया जाए.
सवाल – एमपी – एमएलए कोर्ट के पास क्या पॉवर्स होती हैं?
– एमपी एमएलए कोर्ट्स को सांसदों और विधायकों के मामलों में विशेष कानूनी ताकत और क्षेत्राधिकार मिला होता है ताकि इनके मामलों को पूरे न्यायिक ढांचे में तेजी से और प्रभावी ढंग से सुलझाया जा सके। ये कोर्ट लोकप्रतिनिधियों के आपराधिक मामलों के निपटान के लिए अनुशासित व्यवस्था के रूप में काम करती हैं.
सवाल – इन विशेष अदालतों के फैसलों को कहां चुनौती दी जा सकती है?
– एमपी एमएलए कोर्ट के फैसलों के खिलाफ अपील का अधिकार उच्च न्यायालय के पास होता है, यानि ये कोर्ट अंतिम अधिकार नहीं देतीं पर मुकदमों की प्राथमिक जांच और फैसले सुनाने में सक्षम हैं.

