दिल्ली की राजनीति में आंदोलन हमेशा से सबसे बड़ा राजनीतिक हथियार रहा है. चाहे भ्रष्टाचार विरोधी अन्ना आंदोलन हो, किसानों का आंदोलन हो, या फिर नीट सहित विभिन्न परिक्षाओं के पेपर लीक को लेकर हुआ कॉकरोच जनता पार्टी का हालिया आंदोलन… अरविंद केजरीवाल की आम आदमी पार्टी (AAP) ने इन जन आंदोलनों के जरिए अपनी राजनीतिक जमीन मजबूत की है. अब ऐसा लगता है कि केजरीवाल एक नए मुद्दे की तलाश में हैं और ई-20 ईंधन का विरोध उसी रणनीति का हिस्सा बनता दिखाई दे रहा है.
दिपके गए घर, तो सड़क पर उतरेंगे केजरीवाल
केजरीवाल का यह ऐलान ऐसे समय सामने आया है, जब नीट पेपर लीक को लेकर जंतर-मंतर पर हुए आंदोलन ने देशभर का ध्यान अपनी ओर खींचा है. इस आंदोलन का नेतृत्व कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के प्रमुख अभिजीत दिपके ने किया. लगातार प्रदर्शन, छात्रों की भागीदारी और सोशल मीडिया पर बने माहौल के बाद केंद्र सरकार ने परीक्षा व्यवस्था से जुड़े कई अहम फैसले किए और सीजेपी की सभी प्रमुख मांगों को स्वीकार कर लिया. इसके बाद सीजेपी ने जंतर मंतर पर चल रहा अपना आंदोलन वापस लेने का ऐलान कर दिया. और अब अभिजीत दिपके सहित सीजेपी के सारे बड़े चेहरे अब साइड हो चुके हैं. ऐसे में अब अरविंद केजरीवाल सरकार विरोधी आंदोलन के खासी स्पेस को भुनाने की कोशिश में दिख रहे हैं.
केजरीवाल की क्या-क्या मांग?
दिलचस्प बात यह है कि केजरीवाल ने अपने अभियान को केवल ई-20 तक सीमित नहीं रखा. उन्होंने इसे आम लोगों की जेब, ईंधन की कीमत और उपभोक्ताओं की पसंद के अधिकार से जोड़ने की कोशिश की. उनकी मांग है कि पेट्रोल पंपों पर लोगों को शुद्ध पेट्रोल और ई-20 में से चुनने का विकल्प मिले, ई-20 सस्ता हो और पेट्रोल की कीमत अंतरराष्ट्रीय कच्चे तेल की कीमतों के अनुरूप घटाई जाए. यह ऐसी मांगें हैं, जो सीधे आम उपभोक्ताओं को प्रभावित करती हैं और राजनीतिक रूप से भारी समर्थन जुटाने की क्षमता रखती हैं.
राजनीतिक नजरिये से देखें तो यह AAP के लिए एक अवसर भी है. दिल्ली विधानसभा चुनाव के बाद पार्टी लगातार किसी बड़े मुद्दे की तलाश में रही है. नीट पेपर लीक आंदोलन के दौरान जिस तरह छात्रों और युवाओं का बड़ा वर्ग सक्रिय हुआ, उसने यह संकेत दिया कि जन आंदोलनों की राजनीति आज भी प्रभावी बनी हुई है. अब जब वह आंदोलन शांत हो चुका है, तो AAP ई-20 के मुद्दे पर वैसी ही जनभावना तैयार करने की कोशिश करती दिख रही है.
जेन-जी और मिलियनल्स का फर्क
हालांकि, यह भी उतना ही महत्वपूर्ण है कि दोनों मुद्दों की प्रकृति अलग है. नीट पेपर लीक सीधे लाखों छात्रों के भविष्य से जुड़ा सवाल था, जबकि ई-20 ईंधन नीति तकनीकी और आर्थिक पहलुओं से जुड़ा विषय है. पहला मुद्दा जहां जेन-जी को सीधे तौर पर प्रभावित कर रहा था. वहीं ई-20 पेट्रोल का मुद्दा उससे पहले की पीढ़ी यानी मिलियनल्स को प्रभावित कर रहा. यह ऐसे वर्ग है, जो अपनी नौकरियों और रोजगार में वयस्त रहता है. ऐसे में यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या ई-20 का मुद्दा भी सड़क पर उतना ही व्यापक जन समर्थन हासिल कर पाएगा जितना छात्र आंदोलन को मिला था.
4 अगस्त का प्रस्तावित मार्च केवल एक याचिका सौंपने का कार्यक्रम नहीं, बल्कि AAP की राजनीतिक रणनीति की अगली परीक्षा भी माना जा सकता है. अगर इस अभियान को भारी जनसमर्थन मिलता है, तो पार्टी इसे केंद्र सरकार के खिलाफ एक बड़े जन आंदोलन में बदलने की कोशिश कर सकती है. वहीं अगर लोगों की भागीदारी सीमित रहती है, तो यह अभियान केवल एक प्रतीकात्मक विरोध बनकर रह सकता है.
कुल मिलाकर अभिजीत दिपके के नेतृत्व वाले सीजेपी का आंदोलन शांत पड़ने के बाद विपक्षी राजनीति में जो जगह बनी है, उसे भरने की कोशिश अरविंद केजरीवाल करते दिखाई दे रहे हैं. अब यह जनता तय करेगी कि ई-20 का मुद्दा केवल सोशल मीडिया तक सीमित रहेगा या फिर यह भी देश में एक नए जन आंदोलन का रूप ले पाएगा.

