International
oi-Siddharth Purohit
DefSAT 2026 का दूसरे दिन भारत की स्थायी और फ्लैक्सिबल Defence Space Capability को मजबूत बनाने पर जोर दिया गया। पूरे दिन एक्सपर्ट्स, सैन्य अधिकारियों और उद्योग जगत के प्रतिनिधियों के बीच गहन रणनीतिक चर्चा हुई। मतलब साफ है कि अब अंतरिक्ष सिर्फ वैज्ञानिक खोज या कम्युनिकेशन का जरिया नहीं है, बल्कि यह राष्ट्रीय सुरक्षा की अहम कड़ी बन चुका है।
2025-2030 के बीच 1,602 सैटेलाइट का अनुमान
इस समिट में साझा किए गए डेटा के मुताबिक, 2025 से 2030 के बीच वैश्विक स्तर पर 1,602 ISR (Intelligence, Surveillance and Reconnaissance) सैटेलाइट लॉन्च होने की उम्मीद है। इसका मतलब है कि दुनिया अब स्पेस-आधारित निगरानी और खुफिया क्षमता के एक नए दौर में प्रवेश कर रही है। ISR सैटेलाइट्स का उपयोग दुश्मन की गतिविधियों पर नजर रखने, सीमाओं की निगरानी, समुद्री गतिविधियों को ट्रैक करने और रियल-टाइम डेटा इकट्ठा करने के लिए किया जाता है।

लगातार कवरेज और रियल-टाइम एनालिसिस पर फोकस
पहले एक या दो बड़े सैटेलाइट्स पर निर्भरता होती थी, लेकिन अब रणनीति बदल चुकी है। अब देशों का फोकस Satellite Constellations (मानव निर्मित सैटेलाइट्स का ऐसा ग्रुप जो पृथ्वी की कक्षा में रहकर काम करे) पर है। इसका फायदा यह है कि लगातार कवरेज मिलती है, Rapid Revisit संभव होता है और रियल-टाइम एनालिसिस किया जा सकता है। यानी अगर जमीन पर कोई गतिविधि होती है, तो उसका डेटा तुरंत उपलब्ध हो सकता है।
जिम्मेदार स्पेस पावर- मेजर जनरल नीरज शुक्ला
उद्घाटन सत्र में भारतीय सेना के कार्यवाहक महानिदेशक (Strategic Planning) मेजर जनरल नीरज शुक्ला, एवीएसएम, एसएम ने भारत के जिम्मेदार नजरिए पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि भारत स्पेस को केवल शक्ति प्रदर्शन के लिए नहीं, बल्कि सिविलाइजेशन वेल्यूज के साथ देखता है।
उन्होंने इस दौरान संस्कृत का एक श्लोक भी कहा- “दोहम कर्म संसाधनं न कदापि शोषणम्, लोक हिते भूतानां सरक्षणं प्रथम।”
संस्कृत श्लोक का मतलब-
मेजर जनरल शुक्ला ने इसका अर्थ समझाते हुए कहा कि संसाधनों का उपयोग जिम्मेदारी से होना चाहिए, शोषण के लिए नहीं। अंतरिक्ष का उद्देश्य सभी प्राणियों के कल्याण और संरक्षण के लिए होना चाहिए। मेजर जनरल के मुताबिक, “अंतरिक्ष केवल रक्षा प्रभुत्व के लिए नहीं, बल्कि उस सभ्यता को बनाए रखने के लिए है जिसकी रक्षा की शपथ हमने ली है।”
राष्ट्रीय सुरक्षा: सिर्फ सेना नहीं, पूरा सिस्टम
उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि राष्ट्रीय सुरक्षा को केवल सैन्य ताकत के नजरिए से नहीं देखा जा सकता। इसमें कूटनीति, सूचना तंत्र, आर्थिक मजबूती, राजनीतिक नेतृत्व और स्वदेशी तकनीक सब शामिल हैं। आज AI, क्वांटम टेक्नोलॉजी, साइबर और स्पेस सिस्टम आपस में जुड़ रहे हैं। ऐसे में रणनीतिक स्वायत्तता बनाए रखने के लिए हर क्षेत्र को मजबूत करना जरूरी है।
‘तालमेल के बिना विस्तार सिर्फ कल्पना’
SIA-India के अध्यक्ष डॉ. सुब्बा राव पावलुरी ने कहा कि भारत इस समय एक निर्णायक मोड़ पर खड़ा है। उन्होंने कहा, “समन्वय के बिना विस्तार सिर्फ कल्पना है, तालमेल के साथ विस्तार ही वास्तविक क्षमता बनता है।”
आत्मनिर्भरता और विश्वगुरु
डॉ. पावलुरी ने जोर देकर कहा कि अगर भारत अंतरिक्ष क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनना चाहता है और ‘विश्वगुरु’ बनने की दिशा में आगे बढ़ना चाहता है, तो सरकार, उद्योग और सशस्त्र बलों के बीच एकता जरूरी है। उनके मुताबिक, डेफसैट सिर्फ एक औपचारिक कार्यक्रम नहीं है, बल्कि एक ‘कन्वर्जेंस पॉइंट’ है-जहां विश्वास बनता है, तालमेल होता है और असली काम शुरू होता है।
दूसरे दिन 6 बड़े MoU साइन
दूसरे दिन का एक बड़ा मौका तब आया जब 6 MoU साइन हुए। इनमें Safran और Geminis Space, TakeMe2Space और Little Place Labs, RedBalloon Aerospace सहित अन्य संगठन जैसे EON Space, Sanyark, Raudren और Andrax शामिल रहे।
निजी अंतरिक्ष पारिस्थितिकी तंत्र की बढ़ती ताकत
इन साझेदारियों से साफ है कि भारत का निजी अंतरिक्ष पारिस्थितिकी तंत्र तेजी से परिपक्व हो रहा है। अब सिर्फ सरकारी एजेंसियां ही नहीं, बल्कि स्टार्टअप्स और निजी कंपनियां भी बड़ी भूमिका निभा रही हैं। ये कंपनियां दोहरे उपयोग (Dual-Use) वाली तकनीक, उन्नत डेटा विश्लेषण और लचीले उपग्रह ढांचे पर काम कर रही हैं।
आधुनिक युद्ध में सैटेलाइट्स की भूमिका
दूरसंचार विभाग (DoT) के हरियाणा LSA के अतिरिक्त महानिदेशक श्री आर. शाक्य ने आधुनिक युद्ध में सैटेलाइट्स की अनिवार्यता पर विस्तार से बात की। उन्होंने कहा कि आज की लड़ाई सिर्फ जमीन, हवा या समुद्र तक सीमित नहीं है। अब स्पेस एक नया ‘डोमेन’ बन चुका है। संचार, निगरानी, नेविगेशन और डेटा विश्लेषण-सब कुछ सैटेलाइट्स पर निर्भर हो चुका है।
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