असम में पेश किया गया यूनिफॉर्म सिविल कोड (UCC) बिल अब देशभर में नई बहस का केंद्र बन गया है. उत्तराखंड और गुजरात के बाद असम ऐसा तीसरा राज्य बनने की तैयारी में है, जिसने समान नागरिक संहिता लागू करने की दिशा में बड़ा कदम बढ़ाया है. हालांकि, असम का प्रस्तावित यूसीसी बिल कई मामलों में उत्तराखंड और गुजरात के कानूनों से अलग नजर आता है. खास तौर पर लिव-इन रिलेशनशिप, बहुविवाह, शादी-पंजीकरण और सामाजिक संतुलन को लेकर असम सरकार ने अपना अलग मॉडल तैयार किया है.
क्या है असम UCC बिल का मकसद?
असम सरकार के मुताबिक यह कानून शादी, तलाक, विरासत, संपत्ति और लिव-इन रिलेशनशिप से जुड़े नियमों को एक समान बनाने के लिए लाया जा रहा है. सरकार का कहना है कि अलग-अलग धर्मों के लिए अलग व्यक्तिगत कानून होने से कई बार कानूनी जटिलताएं और असमानता पैदा होती है. इसी वजह से एक कॉमन सिविल फ्रेमवर्क तैयार किया जा रहा है.
मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने कहा कि यह कानून किसी धर्म के खिलाफ नहीं बल्कि ‘समान अधिकार’ सुनिश्चित करने के लिए लाया जा रहा है. सरकार का दावा है कि इससे महिलाओं को ज्यादा अधिकार मिलेंगे, बहुविवाह जैसी प्रथाओं पर रोक लगेगी और सभी नागरिकों के लिए एक समान व्यवस्था लागू होगी.
असम UCC की सबसे बड़ी खासियत क्या है?
असम सरकार की तरफ से पेश किए गए ‘द यूनिफॉर्म सिविल कोड, असम 2026 बिल’ में सबसे ज्यादा चर्चा बहुविवाह पर रोक और लिव-इन रिलेशनशिप के अनिवार्य पंजीकरण को लेकर हो रही है. प्रस्तावित कानून के मुताबिक राज्य में अब एक से ज्यादा शादी की अनुमति नहीं होगी. साथ ही शादी और तलाक का रजिस्ट्रेशन भी जरूरी बनाया जाएगा. सरकार का तर्क है कि इससे महिलाओं के अधिकारों की रक्षा होगी और संपत्ति, गुजारा भत्ता तथा उत्तराधिकार जैसे मामलों में कानूनी विवाद कम होंगे.
असम UCC की चार सबसे खास बातें…
- बहुविवाह पर रोक
- शादी और तलाक का अनिवार्य रजिस्ट्रेशन
- लिव-इन रिलेशनशिप का रजिस्ट्रेशन
- विरासत और संपत्ति के समान नियम
असम UCC की सबसे बड़ी विशेषता यह मानी जा रही है कि इसमें लिव-इन रिलेशनशिप को भी कानूनी ढांचे में लाने की कोशिश की गई है. बिल के मुताबिक साथ रहने वाले जोड़ों को अपने रिश्ते का पंजीकरण कराना होगा ताकि भविष्य में महिला या बच्चों के अधिकारों को लेकर कोई विवाद न हो. उत्तराखंड के UCC में भी ऐसा प्रावधान था, लेकिन असम सरकार इसे और अधिक सख्ती से लागू करने की तैयारी में दिखाई दे रही है.
उत्तराखंड-गुजरात से कैसे अलग असम का यूसीसी?
असम मॉडल को उत्तराखंड और गुजरात से अलग बनाने वाली एक और बड़ी बात राज्य की सामाजिक और जनसांख्यिकीय स्थिति है. असम में मुस्लिम आबादी करीब 34 प्रतिशत है और बड़ी संख्या में आदिवासी समुदाय भी रहते हैं. इसी वजह से सरकार ने पहले ही स्पष्ट कर दिया है कि अनुसूचित जनजातियों को UCC के दायरे से बाहर रखा जाएगा. पारंपरिक जनजातीय रीति-रिवाज और धार्मिक प्रथाएं भी प्रभावित नहीं होंगी. यह प्रावधान इसलिए अहम माना जा रहा है क्योंकि असम में आदिवासी पहचान और सांस्कृतिक अधिकार बेहद संवेदनशील मुद्दा हैं.
उत्तराखंड में जब UCC लागू किया गया था, तब उसे मुख्य रूप से ‘समान कानून’ और ‘महिला अधिकार’ के तौर पर पेश किया गया था. वहां की सरकार ने इसे सामाजिक सुधार बताया था. लेकिन असम में मामला कहीं ज्यादा राजनीतिक और सामाजिक रूप ले चुका है. यहां UCC को लंबे समय से चल रही जनसंख्या और पहचान की राजनीति से जोड़कर देखा जा रहा है. मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा पहले भी बहुविवाह, मदरसा और मुस्लिम पर्सनल लॉ जैसे मुद्दों पर खुलकर बयान देते रहे हैं. ऐसे में असम का UCC सिर्फ कानूनी सुधार नहीं बल्कि एक बड़े राजनीतिक संदेश के तौर पर भी देखा जा रहा है.
उत्तराखंड और गुजरात का UCC मॉडल क्या?
गुजरात के UCC मॉडल से तुलना करें तो वहां भी बहुविवाह पर रोक और लिव-इन रिलेशनशिप के रजिस्ट्रेशन का प्रावधान रखा गया था. लेकिन असम में इसे कहीं ज्यादा आक्रामक तरीके से पेश किया जा रहा है. गुजरात में UCC को प्रशासनिक और कानूनी सुधार की दिशा में कदम बताया गया था, जबकि असम में यह राजनीतिक विमर्श का केंद्र बन गया है. खासकर मुस्लिम संगठनों और विपक्षी दलों का आरोप है कि सरकार इस कानून के जरिए धार्मिक व्यक्तिगत कानूनों में दखल दे रही है.
असम सरकार का कहना है कि यह कानून संविधान के अनुच्छेद 44 की भावना के अनुरूप है. अनुच्छेद 44 में राज्य को समान नागरिक संहिता लागू करने की दिशा में प्रयास करने की बात कही गई है. बीजेपी लंबे समय से इसे अपने वैचारिक एजेंडे का हिस्सा बताती रही है. अब उत्तराखंड, गुजरात और असम के बाद माना जा रहा है कि अन्य बीजेपी शासित राज्य भी इसी दिशा में आगे बढ़ सकते हैं.
उत्तराखंड UCC में विवाह के लिए पुरुष की न्यूनतम आयु 21 वर्ष और महिला की 18 वर्ष तय की गई थी. वहां बहुविवाह और बिगैमी पर रोक लगाई गई. साथ ही बेटियों और बेटों को संपत्ति में समान अधिकार देने का प्रावधान किया गया. अवैध संतान, गोद लिए गए बच्चे और सरोगेसी से जन्मे बच्चों को भी समान कानूनी अधिकार दिए गए. असम के बिल में भी इसी तरह समान उत्तराधिकार व्यवस्था की बात कही जा रही है, हालांकि अंतिम स्वरूप विधानसभा में पेश होने के बाद ही पूरी तरह स्पष्ट होगा.
गुजरात UCC में भी शादी और लिव-इन रिलेशनशिप के रजिस्ट्रेशन को जरूरी बनाया गया था. वहां भी बच्चों को बराबरी के अधिकार देने और धार्मिक आधार पर अलग-अलग नागरिक कानून खत्म करने की दिशा में कदम उठाया गया. लेकिन असम सरकार जिस तरह से बहुविवाह और सामाजिक सुधार के मुद्दे को प्रमुखता दे रही है, उससे यह मॉडल अधिक राजनीतिक रूप लेता दिखाई दे रहा है.
विपक्ष का कहना है कि सरकार सामाजिक सुधार के नाम पर धार्मिक ध्रुवीकरण की राजनीति कर रही है. कांग्रेस और एआईयूडीएफ जैसे दलों का आरोप है कि UCC को खास समुदायों के खिलाफ इस्तेमाल किया जा सकता है. हालांकि बीजेपी इसे महिलाओं और बच्चों के अधिकारों की रक्षा के लिए जरूरी बता रही है.
फिलहाल असम UCC का पूरा ड्राफ्ट सार्वजनिक नहीं हुआ है. विधानसभा में बिल पेश होने के बाद ही इसके सभी प्रावधान साफ हो पाएंगे. लेकिन इतना तय है कि असम का यह कानून देश में समान नागरिक संहिता पर चल रही बहस को और तेज करने वाला है. यह सिर्फ एक राज्य का कानून नहीं बल्कि आने वाले समय में राष्ट्रीय राजनीति और सामाजिक विमर्श का बड़ा मुद्दा बन सकता है.

