भारत अब अपनी हवाई सुरक्षा को सिर्फ विदेशी हथियारों के भरोसे नहीं छोड़ना चाहता. रूस से खरीदे गए S-400 ने भले ही भारतीय वायु रक्षा को जबरदस्त ताकत दी हो, लेकिन अब DRDO उससे भी आगे की तैयारी में जुटा है. प्रोजेक्ट कुशा के तहत भारत ऐसा स्वदेशी एयर डिफेंस सिस्टम विकसित कर रहा है, जिसमें एक नहीं बल्कि तीन अलग-अलग रेंज की इंटरसेप्टर मिसाइलें होंगी. इसका मतलब साफ है… चाहे दुश्मन का कोई फाइटर जेट हो, मिसाइल हो, ड्रोन हो या कोई हाई-वैल्यू हवाई टारगेट, उसे आसमान में ही रोकने के लिए अलग-अलग दूरी पर सुरक्षा की परत मौजूद होगी.
प्रोजेक्ट कुशा को रूस के एस-400 के स्वदेशी विकल्प के तौर पर देखा जा रहा है. सबसे दिलचस्प बात यह है कि शुरुआती अनुमानों के मुताबिक, पांच स्क्वाड्रन के लिए कुशा की लागत रूस के S-400 सौदे के मुकाबले आधे से भी कम हो सकती है. हालांकि, इस लागत अनुमान की अभी आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है.
एक सिस्टम नहीं, तीन मिसाइलों का सुरक्षा कवच
प्रोजेक्ट कुशा को आधिकारिक तौर पर एक्सटेंडेड रेंज एयर डिफेंस सिस्टम कहा जा रहा है. इसकी सबसे बड़ी खासियत इसका तीन स्तरों वाला इंटरसेप्टर नेटवर्क है. पहला इंटरसेप्टर M1 करीब 150 किलोमीटर तक के हवाई लक्ष्यों को निशाना बनाने के लिए तैयार किया जा रहा है. इसी मिसाइल का पहला सफल विकास परीक्षण कुछ ही दिनों पहले 23 जुलाई को ओडिशा के डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम द्वीप से किया गया.
इसके बाद M2 की बारी है, जिसकी मारक क्षमता करीब 250 किलोमीटर तक पहुंचाने की योजना है. सबसे लंबी दूरी वाला M3 करीब 350 से 400 किलोमीटर तक के लक्ष्य भेदने में सक्षम बनाने की तैयारी है. इसे खास तौर पर रणनीतिक और बेहद महत्वपूर्ण हवाई लक्ष्यों से निपटने के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है.
तीनों मिसाइलों की बुनियादी तकनीक को काफी हद तक साझा रखने की योजना है. यानी हर मिसाइल के लिए पूरी तरह अलग तकनीक और उत्पादन व्यवस्था खड़ी करने के बजाय एक साझा प्लेटफॉर्म और कई समान प्रणालियों का इस्तेमाल किया जाएगा. इससे विकास और उत्पादन दोनों की लागत कम रखने में मदद मिल सकती है.
S-400 से कम खर्च में बड़ा कवच?
यही वह हिस्सा है, जो प्रोजेक्ट कुशा को सबसे ज्यादा चर्चा में ला रहा है. रूस से भारत ने 2018 में पांच S-400 स्क्वाड्रन के लिए करीब 5.43 अरब डॉलर का समझौता किया था. इसके मुकाबले प्रोजेक्ट कुशा के पहले चरण में भारतीय वायुसेना के लिए पांच स्क्वाड्रन की स्वीकृति करीब 21,700 करोड़ रुपये की लागत पर दी गई थी. कुछ रक्षा सूत्रों के हवाले से अब दावा किया जा रहा है कि कुशा की कुल लागत S-400 की तुलना में 50 फीसदी से भी कम हो सकती है.
हालांकि इस तुलना को फिलहाल अंतिम आंकड़ा नहीं माना जा सकता. कुशा की वास्तविक उत्पादन लागत, रखरखाव, मिसाइलों की संख्या, रडार और अन्य सहायक प्रणालियों समेत पूरा पैकेज सामने आने के बाद ही सही तस्वीर स्पष्ट होगी. फिर भी अगर यह लागत अंतर बरकरार रहता है, तो भारत के लिए इसका रणनीतिक महत्व बहुत बड़ा होगा. एक तरफ विदेशी मुद्रा की बचत होगी, दूसरी तरफ बड़ी संख्या में एयर डिफेंस यूनिट तैनात करने की क्षमता बढ़ेगी.
S-400 जैसा काम, लेकिन भारतीय जरूरत के हिसाब से
प्रोजेक्ट कुशा की तुलना लगातार रूसी S-400 से की जा रही है. वजह भी साफ है. S-400 लंबी दूरी से आने वाले हवाई खतरों को पहचानकर उन्हें इंटरसेप्ट करने में सक्षम है और भारत ने इसे अपनी एयर डिफेंस क्षमता का महत्वपूर्ण हिस्सा बनाया है. लेकिन कुशा की सोच सिर्फ S-400 की नकल करने की नहीं है. भारत इसे अपनी जरूरतों के हिसाब से एक बड़े और बहुस्तरीय राष्ट्रीय एयर डिफेंस नेटवर्क का हिस्सा बनाना चाहता है.
इस नेटवर्क में लंबी दूरी की मिसाइलों के अलावा रडार, सेंसर, कमांड सेंटर, कम दूरी के एयर डिफेंस सिस्टम, ड्रोन रोधी हथियार और भविष्य में लेजर आधारित हथियार भी शामिल किए जा सकते हैं. यानी लक्ष्य सिर्फ ‘एक मिसाइल’ बनाना नहीं, बल्कि दुश्मन के हमले को पहचानने से लेकर उसे आसमान में खत्म करने तक पूरा स्वदेशी नेटवर्क खड़ा करना है.
ड्रोन से बैलिस्टिक मिसाइल तक, खतरे का दायरा बड़ा
आज का युद्ध सिर्फ लड़ाकू विमानों और मिसाइलों तक सीमित नहीं रह गया है. यूक्रेन युद्ध और पश्चिम एशिया के संघर्षों ने दिखाया है कि छोटे और सस्ते ड्रोन भी किसी देश की महंगी सैन्य और नागरिक संपत्तियों को निशाना बना सकते हैं. दूसरी तरफ बैलिस्टिक मिसाइलें सबसे गंभीर चुनौतियों में शामिल हैं. इसलिए भारत को ऐसा एयर डिफेंस नेटवर्क चाहिए जो एक साथ अलग-अलग ऊंचाई, गति और प्रकृति वाले लक्ष्यों से निपट सके.
यहीं से प्रोजेक्ट कुशा और बैलिस्टिक मिसाइल डिफेंस यानी BMD कार्यक्रम की भूमिका जुड़ती है. कुशा लंबी दूरी के हवाई खतरों के खिलाफ सुरक्षा की अहम परत बन सकता है, जबकि बैलिस्टिक मिसाइलों के लिए अलग BMD इंटरसेप्टर काम करेंगे. डीआरडीओ पहले ही स्वदेशी BMD सिस्टम की पहली चरण की क्षमता को साबित कर चुका है. इसके बाद 5,000 किलोमीटर वर्ग की क्षमता वाले खतरों से निपटने के लिए दूसरे चरण के इंटरसेप्टर का भी परीक्षण किया गया है.
असली लक्ष्य ‘सुदर्शन चक्र’ जैसा राष्ट्रीय कवच
भारत की दीर्घकालिक सोच केवल कुछ एयरबेस या संवेदनशील ठिकानों की सुरक्षा तक सीमित नहीं है. लक्ष्य एक ऐसा एकीकृत एयर और मिसाइल डिफेंस नेटवर्क तैयार करना है, जो देश के महत्वपूर्ण सैन्य ठिकानों के साथ-साथ रणनीतिक और नागरिक क्षेत्रों को भी हवाई हमलों से बचा सके.
इसी व्यापक सोच को ‘सुदर्शन चक्र’ जैसी राष्ट्रीय सुरक्षा ढाल के विचार से जोड़ा जा रहा है. इसमें लंबी दूरी की मिसाइलों के साथ-साथ कम दूरी के एयर डिफेंस सिस्टम, ड्रोन रोधी हथियार, रडार, सेंसर और भविष्य में लेजर जैसे डायरेक्टेड एनर्जी हथियार भी शामिल हो सकते हैं.
भारत पहले ही क्विक रिएक्शन SAM, VSHORADS और लेजर आधारित डायरेक्टेड एनर्जी हथियार जैसी तकनीकों पर काम कर रहा है. यानी भविष्य का सुरक्षा कवच किसी एक मिसाइल का नाम नहीं होगा, बल्कि कई अलग-अलग प्रणालियों को जोड़कर तैयार किया गया पूरा नेटवर्क होगा.
भारत के लिए चुनौती सिर्फ मिसाइल बनाना नहीं
प्रोजेक्ट कुशा का पहला सफल परीक्षण निश्चित रूप से बड़ी उपलब्धि है, लेकिन असली परीक्षा इसके बाद शुरू होगी. युद्ध के समय दुश्मन एक साथ बड़ी संख्या में ड्रोन, मिसाइल और दूसरे हवाई लक्ष्य भेज सकता है. ऐसे ‘सैचुरेशन अटैक’ में किसी एक सिस्टम के फेल होने पर पूरी सुरक्षा व्यवस्था प्रभावित हो सकती है.
इसलिए भारत को सिर्फ इंटरसेप्टर की संख्या बढ़ाने के बजाय अलग-अलग सिस्टम के बीच ऐसा तालमेल बनाना होगा, जिसमें एक रडार की जानकारी दूसरे सिस्टम तक तुरंत पहुंचे और एक इंटरसेप्टर के असफल होने पर दूसरी परत लक्ष्य को रोक सके.
यही वजह है कि भविष्य का एयर डिफेंस सिर्फ मिसाइलों की रेंज का खेल नहीं होगा. यह सेंसर, रडार, AI, कमांड नेटवर्क, इलेक्ट्रॉनिक युद्ध, साइबर सुरक्षा और इंटरसेप्टर मिसाइलों के एक साथ काम करने की क्षमता पर निर्भर करेगा.
S-400 से आगे निकलने की तैयारी?
भारत के पास फिलहाल रूसी S-400 जैसा अत्याधुनिक एयर डिफेंस सिस्टम मौजूद है, जिसने ऑपरेशन सिंदूर में अपना लोहा साबित किया है. लेकिन लंबे समय के लिए किसी विदेशी सिस्टम पर पूरी तरह निर्भर रहना भारत की आत्मनिर्भर रक्षा नीति के अनुरूप नहीं है.
प्रोजेक्ट कुशा इसी दिशा में बड़ा बदलाव ला सकता है. अगर डीआरडीओ तीनों रेंज के इंटरसेप्टर, स्वदेशी AESA रडार और एकीकृत कमांड नेटवर्क को सफलतापूर्वक जोड़ने में कामयाब होता है, तो भारत के पास सिर्फ S-400 का विकल्प नहीं, बल्कि अपनी जरूरत के मुताबिक विकसित किया गया एक ज्यादा व्यापक एयर डिफेंस नेटवर्क होगा.

