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खरीफ सीजन में अरहर और मक्के की फसल में बारिश के बाद खरपतवार तेजी से बढ़ते हैं. वहीं मक्का में फॉल आर्मीवर्म और अरहर में फली छेदक का प्रकोप फसल को नुकसान पहुंचा सकता है. कृषि विशेषज्ञ के अनुसार शुरुआती अवस्था में खरपतवार नियंत्रण और नियमित निगरानी बेहद जरूरी है. समय रहते कीटों की पहचान और उचित नियंत्रण उपाय अपनाकर किसान फसल का नुकसान और अनावश्यक दवा का खर्च कम कर सकते हैं.
गोरखपुर: धान की खेती के साथ खरीफ सीजन में अरहर और मक्के की खेती भी किसानों के लिए अच्छी आमदनी का विकल्प बन सकती है. हालांकि बरसात के मौसम में इन दोनों फसलों में खरपतवार तेजी से बढ़ते हैं. इसके अलावा अरहर में फली छेदक जैसे कीट और मक्के में फॉल आर्मीवर्म का प्रकोप फसल को नुकसान पहुंचा सकता है. समय रहते इनकी निगरानी और नियंत्रण किया जाए तो किसान लागत कम करके उत्पादन बढ़ा सकते हैं.
अरहर में खरपतवार पर रखें नजर
गोरखपुर यूनिवर्सिटी के कृषि विभाग के प्रोफेसर आर.आर. सिंह के मुताबिक, अरहर की शुरुआती अवस्था में खेत को खरपतवार से मुक्त रखना बेहद जरूरी है. बारिश के बाद खेत में उगने वाली घास और चौड़ी पत्ती वाले खरपतवार पौधों से पोषक तत्व और नमी छीन लेते हैं. इसलिए शुरुआती 20-40 दिनों में निराई-गुड़ाई पर विशेष ध्यान देना चाहिए.
खरपतवारनाशी का इस्तेमाल फसल की अवस्था, मिट्टी और खरपतवार के प्रकार के अनुसार ही किया जाना चाहिए. किसान किसी भी दवा को बिना लेबल निर्देश या कृषि विशेषज्ञ की सलाह के न डालें.
मक्का में खरपतवार रोकने का तरीका
मक्के में खरपतवार नियंत्रण के लिए प्रोफेसर की खरीफ सलाह के अनुसार बुवाई के 2-3 दिन के भीतर पर्याप्त नमी वाली जमीन में ‘एट्राजिन’ का प्रयोग किया जा सकता है. सलाह में हल्की मिट्टी में 2 किलो प्रति हेक्टेयर और भारी मिट्टी में 3 किलो प्रति हेक्टेयर की मात्रा बताई गई है. बाद में जरूरत पड़ने पर 15-18 दिन की अवस्था में टेम्बोट्रायोन या टोप्रामेजोन आधारित विकल्पों का इस्तेमाल किया जा सकता है.
मक्का में फॉल आर्मीवर्म से बचाएं फसल
मक्के में पत्तियों के बीच छोटे छेद, पत्तियों पर खुरचन और पौधे के बीच में कीट या उसका मल दिखाई दे तो फॉल आर्मीवर्म की आशंका हो सकती है. शुरुआती अवस्था में नीम आधारित एजाडिरैक्टिन का प्रयोग और प्रकोप बढ़ने पर ‘एमामेक्टिन बेंजनट का छिड़काव किया जाना चाहिए
अरहर में फूल और फलियां आने के समय फली छेदक का प्रकोप बढ़ सकता है. खेत की नियमित निगरानी के साथ फेरोमोन ट्रैप और जैविक नियंत्रण जैसे उपाय अपनाए जा सकते हैं. प्रकोप आर्थिक क्षति स्तर तक पहुंचने पर कृषि विशेषज्ञ की सलाह से स्पिनोसैड, एमामेक्टिन बेंजोएट या फ्लूबेंडियामाइड जैसे कीटनाशकों का इस्तेमाल किया जा सकता है.
दवा से ज्यादा जरूरी है सही समय
प्रोफेसर आर.आर. सिंह के अनुसार किसानों को केवल दवा पर निर्भर रहने के बजाय खेत की नियमित निगरानी करनी चाहिए. बारिश के बाद खरपतवार निकलते ही नियंत्रण, फसल में पानी जमा न होने देना और कीट दिखाई देते ही पहचान करना बेहद जरूरी है. इससे अनावश्यक दवा का खर्च भी बचेगा और फसल को नुकसान से भी बचाया जा सकेगा.
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विवेक कुमार एक सीनियर जर्नलिस्ट हैं, जिन्हें मीडिया में 10 साल का अनुभव है. वर्तमान में न्यूज 18 हिंदी के साथ जुड़े हैं और हरियाणा, उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड की लोकल खबरों पर नजर रहती है. इसके अलावा इन्हें देश-…
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