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पीएम नरेंद्र मोदी ने 31 जुलाई को कहा था कि उन्हें इस बात का दुख है कि जंतर-मंतर पर विरोध-प्रदर्शन के दौरान न सिर्फ उन्हें, बल्कि उनकी स्वर्गीय मां के लिए भी भद्दी गालियों का इस्तेमाल किया गया. उन्होंने यह भी कहा था कि इन ‘गुमराह बच्चों’ को माफ किए जाने की जरूरत है.
‘इंस्टाग्राम’ पर जारी एक वीडियो संदेश में पीएम मोदी ने कहा कि वह समाज में व्याप्त आक्रोश को समझते हैं, लेकिन यह ‘गुमराह बच्चों’ के साथ अपनापन और उन्हें सही राह दिखाने का समय है.
सीजेपी प्रदर्शन में शामिल कुछ छात्रों ने पीएम मोदी पर अपमानजनक टिप्पणी की थी. (रॉयटर्स)
गत दिनों दिल्ली के जंतर-मंतर पर जेन-जी के आंदोलन के दौरान कतिपय युवाओं द्वारा इस्तेमाल की गई अभद्र भाषा और आपत्तिजनक टिप्पणियों को लेकर प्रधानमंत्री के वीडियो संदेश के बाद अब इस पूरे मामले का पटाक्षेप माना जा सकता है. प्रधानमंत्री ने अपने वीडियो संदेश में उन युवाओं को माफ करने का एलान किया है, जिन्होंने उनके खिलाफ अशोभनीय भाषा में व्यक्तिगत टिप्पणियां की थीं.
एक स्वस्थ लोकतंत्र में गाली-गलौज या आपत्तिजनक नारों का किसी भी तरह से समर्थन नहीं किया जा सकता. यह पूरी तरह गलत है. छात्र आंदोलन से सहानुभूति रखने वालों ने भी इसकी घोर आलोचना की है. खासकर देश के प्रधानमंत्री के खिलाफ अभद्र भाषा को लोकतंत्र में आस्था रखने वाले किसी भी नागरिक ने स्वीकार नहीं किया है और न ही स्वीकार किया जाना चाहिए. ऐसे में प्रधानमंत्री ने गाली-गलौज के आरोपी छात्र-छात्राओं को माफ करके उसी परिपार्टी का उचित निवर्हन किया है, जो भारतीय लोकतांत्रिक प्रणाली का एक हिस्सा रही है. यह इसलिए और भी महत्वपूर्ण है कि अभद्र भाषा का इस्तेमाल करने वाले अनेक युवा तो इतनी कम उम्र के हैं कि उन्हें इसके राजनीतिक निहितार्थ भी शायद नहीं मालूम होंगे. लेकिन यहां यह भी देखना होगा कि भारतीय लोकतांत्रिक परंपरा में ‘आम माफी देना’ कोई नई या अनूठी बात नहीं है, जैसा कि कुछ हलकों में प्रचारित किया जा रहा है.
भारतीय गणराज्य मूल रूप में हमेशा उदार और बड़े दिल वाला रहा है. जब-जब देश में बड़े राजनीतिक आंदोलन हुए और बाद में उनका राजनीतिक समाधान निकला, तब-तब आंदोलन से जुड़े लोगों को माफ कर उन्हें लोकतांत्रिक व्यवस्था की मुख्यधारा में शामिल किया गया. यह परिपाटी इस सोच पर आधारित रही कि यदि कोई व्यक्ति हिंसा का रास्ता छोड़कर लोकतांत्रिक प्रक्रिया में लौटना चाहता है तो उसे दूसरा मौका मिलना चाहिए. इसलिए राजनीतिक रूप से जब भी आंदोलन होते हैं तो आम माफी उसका स्वाभाविक हिस्सा होती है.
देशद्रोह के गंभीर आरोपियों को भी माफी!
हमारी राजनीतिक व्यवस्था ने तो उन लोगों को भी माफ किया है, जिन पर देशद्रोह के गंभीर आरोप रहे. इसका सबसे ज्वलंत उदाहरण मिजोरम के नेता लालडेंगा का है. इन्होंने कभी भारत सरकार के खिलाफ बगावत का झंडा बुलंद किया था. यहां तक कि इनकी सशस्त्र इकाई ‘मिजो नेशनल आर्मी’ (एमएनए) को चीन और पाकिस्तान दोनों से हथियार, धन और प्रशिक्षण भी खुलकर मिला. लालडेंगा पाकिस्तान के हुक्मरानों के भी सतत संपर्क में रहे. लंबे अरसे तक कराची में भी रहे. लेकिन इसके बावजूद जब 1986 में राजीव गांधी सरकार के दौरान शांति समझौता हुआ तो उनका स्वागत किया गया और बाद में वे मिजोरम के मुख्यमंत्री भी बने. इस समझौते के बाद मिजोरम ने बड़ी तेजी से प्रगति की. यह आज केरल के बाद भारत का सर्वाधिक साक्षर प्रदेश है.
इस समझौते के करीब एक साल पहले अगस्त 1985 में आल असम स्टूडेंट्स यूनियन (आसू) और तत्कालीन राजीव गांधी सरकार के बीच हुआ शांति समझौता भी इसी की एक मिसाल है. बांग्लादेश से असम आए अवैध प्रवासियों के खिलाफ ‘आसू’ ने बड़े पैमाने पर आंदोलन किया. इस दौरान हिंसा की अनेक घटनाएं हुईं, जिनमें कई लोगों को जान भी गंवानी पड़ी. सरकारी संपत्ति को भारी नुकसान पहुंचा. लेकिन समझौते के बाद प्रफुल्ल कुमार महंत जैसे आंदोलन से जुड़े नेता लोकतांत्रिक राजनीति का हिस्सा बने. वे दो बार राज्य के मुख्यमंत्री भी निर्वाचित हुए. पंजाब में अकालियों और जम्मू-कश्मीर में शेख अब्दुल्ला के साथ हुए राजनीतिक समझौतों को भी इसी परंपरा के उदाहरण के रूप में देखा जा सकता है. हर जगह मतभेद और टकराव के बावजूद अंततः संवाद और राजनीतिक समाधान का रास्ता अपनाया गया.
भाजपा सरकारों ने भी किए शांति समझौते…
ऐसा भी नहीं है कि इस तरह के समझौते केवल कांग्रेस सरकारों के दौरान हुए. भाजपा सरकारों में भी अतिवादियों के आत्मसमर्पण के बाद पुनर्वास के अनेक उदाहरण देखे जा सकते हैं. वर्ष 1998 में वाजपेयी सरकार के समय पूर्वोत्तर में आत्मसमर्पण करने वाले उग्रवादियों के लिए पुनर्वास योजनाएं शुरू की गई थीं. यह नीति बाद में भी जारी रही और मोदी सरकार ने 2018 में इसे और उदार बनाया. असम के सबसे प्रमुख उग्रवादी संगठन यूनाइटेड लिबरेशन फ्रंट ऑफ असम (ULFA) के एक धड़े के साथ दिसंबर 2023 में मोदी सरकार ने शांति वार्ता की. इस समझौते के तहत असम के विकास के लिए केंद्र सरकार 1.5 लाख करोड़ रुपए के विकास कार्य करने पर सहमत हुई.
कुख्यात डकैतों को भी मिली आम माफी, मुख्यधारा में हुए शामिल…
कुछ उदाहरण कुख्यात डकैतों के भी गिनाए जा सकते हैं. सबसे बड़ा उदाहरण तो फूलन देवी का है. उन पर अनेक हत्याओं सहित गंभीर आरोप थे, लेकिन आत्मसमर्पण और राजनीतिक प्रक्रिया के बाद उन्हें न केवल क्षमादान मिला, बल्कि राजनीति में आने का मौका भी. वे दो बार लोकसभा का चुनाव लड़कर सांसद भी बनीं. इसी तरह, चंबल के अन्य कई कुख्यात डकैतों जैसे माधो सिंह, मोहर सिंह, मलखान सिंह को आत्मसमर्पण के बाद नई जिंदगी शुरू करने का अवसर दिया गया.
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रशीद किदवई देश के जाने माने पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक हैं. वह ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन (ORF) के विजिटिंग फेलो भी हैं. राजनीति से लेकर हिंदी सिनेमा पर उनकी खास पकड़ है. ‘सोनिया: ए बायोग्राफी’, ‘बैलट: टेन एपिस…
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