US Tariff On India : टैरिफ की जंग में आखिर भारत की जीत हुई. एक तरफ अटलांटिक महासागर के उस पार बैठे अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का टैरिफ युद्ध और दूसरी तरफ यूरोपीय संघ (EU) की पेचीदा शर्तें… इन दोनों के बीच पिसने के बजाय भारत ने वह हासिल कर लिया है, जो किसी भी देश के लिए एक सपना होता है. भारत ने एक साथ दो मोर्चों पर जीत हासिल की है. पहला, यूरोपीय यूनियन (EU) के साथ फ्री ट्रेड एग्रीमेंट फाइनल करके 27 देशों का विशाल बाजार अपनी मुट्ठी में कर लिया. दूसरा, अमेरिका के साथ 50% के जानलेवा टैरिफ को घटाकर 18% पर लाकर अपने निर्यातकों को बड़ी राहत दी. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की साइलेंट डिप्लोमेसी और रणनीतिक धैर्य ने बाजी पलट दी है.
राजनीति में कहा जाता है कि कभी-कभी आपका प्रतिद्वंद्वी ही आपकी सबसे बड़ी मदद कर देता है. भारत के केस में डोनाल्ड ट्रंप ने यही भूमिका निभाई. जब ट्रंप ने भारतीय सामानों पर 50% टैरिफ लगाने की धमकी दी और उसे लागू करने की दिशा में कदम बढ़ाया, तो पूरी दुनिया को लगा कि भारत का निर्यात बाजार डूब जाएगा. लेकिन इसी डर ने यूरोपीय संघ (EU) को भारत के करीब ला दिया. यूरोप को डर था कि अगर अमेरिका ने भारत के लिए दरवाजे बंद किए, तो भारत पूरी तरह से एशियाई बाजारों या अन्य विकल्पों की ओर मुड़ जाएगा. चीन से पहले ही यूरोप चिढ़ा हुआ है. ऐसे में, भारत को अपने पाले में रखने के लिए EU ने वर्षों से लटके फ्री ट्रेड एग्रीमेंट (FTA) को तेजी से फाइनल किया.
फिर ट्रंप का यू-टर्न
जैसे ही भारत और यूरोप की डील पक्की हुई, अमेरिका को लगा कि वह भारत जैसा बड़ा बाजार और रणनीतिक साझेदार खो सकता है. नतीजा ट्रंप ने ट्रुथ प्रशासन ऐलान कर दिया कि टैरिफ 50% नहीं, बल्कि अब सिर्फ 18% होगा. इसे कहते हैं ‘सांप भी मर गया और लाठी भी नहीं टूटी’.
18% का गणित: भारत को क्या मिला?
2 फरवरी को हुए समझौते के बाद भारतीय वाणिज्य मंत्रालय और निर्यातकों ने राहत की सांस ली है. आंकड़ों की बात करें तो यह डील भारत के लिए संजीवनी से कम नहीं है.
4 लाख करोड़ के एक्सपोर्ट को जीवनदान
वाणिज्य मंत्रालय के अगस्त 2025 के आकलन के अनुसार, भारत का लगभग 48.2 बिलियन डॉलर यानी करीब 4 लाख करोड़ रुपये का एक्स्पोर्ट अमेरिका के 50% वाले टैरिफ की जद में था. अब यह घटकर 18% हो गया है. इसका सीधा फायदा उन सेक्टरों को होगा जो सबसे ज्यादा रोजगार देते हैं:
टेक्सटाइल और गारमेंट्स
भारत का कपड़ा उद्योग, जो बांग्लादेश और वियतनाम से कड़ी टक्कर झेल रहा था, उसके लिए 50% टैरिफ ‘मौत का फरमान’ था. 18% टैरिफ और यूरोप के खुले बाजार के साथ अब तिरुपुर, लुधियाना और सूरत की फैक्ट्रियों में फिर से रौनक लौटेगी. लगभग 11 बिलियन डॉलर का निर्यात अब सुरक्षित है.
जेम्स एंड ज्वैलरी
सूरत और मुंबई के हीरा कारोबारियों के लिए यह सबसे बड़ी खबर है. 10 बिलियन डॉलर के इस व्यापार पर कम टैरिफ का मतलब है कि अमेरिकी बाजार में भारतीय आभूषण अपनी चमक बनाए रखेंगे.
केमिकल और लेदर
4.2 बिलियन डॉलर के ऑर्गेनिक और इनऑर्गेनिक केमिकल और 1 बिलियन डॉलर का लेदर निर्यात अब प्रतिस्पर्धी बना रहेगा. कानपुर और आगरा के चमड़ा उद्योग के लिए यह बड़ी राहत है.
पीएम मोदी की साइलेंट डिप्लोमेसी
- पिछले कुछ महीनों में जब ट्रंप लगातार भारत को ‘टैरिफ किंग’ कह रहे थे और धमकियां दे रहे थे, तब पीएम मोदी और भारतीय विदेश मंत्रालय ने कोई तीखी प्रतिक्रिया नहीं दी. न कोई जवाबी बयानबाजी, न ही कोई सार्वजनिक तकरार.
- भारत ने चुपचाप दो काम किए. यूरोप से पींगे बढ़ाईं. ब्रुसेल्स में EU हेडक्वार्टर के साथ बातचीत तेज की गई. कूटनीतिक चैनलों के जरिए वाशिंगटन को यह समझाया गया कि अगर भारत पर ज्यादा चोट की गई, तो अमेरिकी कंपनियों एप्पल, बोइंग, वॉलमार्ट का भारत में नुकसान होगा.
- ट्रंप का यह मानना कि भारत से अमेरिकी सामानों पर ड्यूटी जीरो होगी और हम उनसे 18% लेंगे, इसे भारत ने स्वीकार कर लिया. यह पीएम मोदी का मास्टरस्ट्रोक था… थोड़ा देकर बहुत कुछ हासिल करना.
0 ड्यूटी का पेंच
ट्रंप ने कहा है कि भारत अमेरिकी सामानों पर ड्यूटी घटाकर ‘शून्य’ (Zero) कर देगा. पहली नजर में यह भारत के लिए नुकसानदेह लग सकता है, लेकिन गहराई में देखें तो यह एक ‘स्मार्ट ट्रेड-ऑफ’ है. हम अमेरिका से क्या खरीदते हैं? भारत अमेरिका से मुख्य रूप से हाई-टेक मशीनरी, विमान (बोइंग), उन्नत टेक्नोलॉजी और कुछ कृषि उत्पाद खरीदता है. अगर इन पर ड्यूटी जीरो होती है, तो भारत की मैन्युफैक्चरिंग लागत कम होगी. सस्ती मशीनरी और टेक्नोलॉजी मिलने से ‘मेक इन इंडिया’ को ही बल मिलेगा. अमेरिकी उत्पादों के आने से भारतीय बाजार में क्वालिटी बढ़ेगी और भारतीय कंपनियों को अपनी गुणवत्ता सुधारने का मौका मिलेगा.
जो पहले से सुरक्षित थे, वे सुरक्षित ही रहेंगे
इस डील की सबसे अच्छी बात यह है कि भारत के ‘कोर एक्सपोर्ट्स’ को इसमें छेड़ा नहीं गया है. इलेक्ट्रॉनिक्स, फार्मा और पेट्रोलियम… ये वो सेक्टर्स हैं जो पहले भी हाई टैरिफ से बाहर थे और अब भी बाहर ही रहेंगे. यानी भारत की दवाइयां और रिफाइंड पेट्रोलियम अमेरिका में बिना किसी रुकावट के जाते रहेंगे. यह भारत की इकोनॉमी की रीढ़ है, जो सुरक्षित है.

