India
oi-Pallavi Kumari
Parliament
Winter
Session
2025:
संसद
का
शीतकालीन
सत्र
शुरू
होते
ही
एक
बार
फिर
वही
सवाल
खड़ा
हो
गया
है-क्या
इस
बार
सदन
की
कार्यवाही
सुचारु
रूप
से
चल
पाएगी
या
एक
बार
फिर
सरकार
और
विपक्ष
आमने-सामने
होंगे।
इस
बार
टकराव
की
वजह
है
मतदाता
सूची
की
स्पेशल
इंटेंसिव
रिविजन
(SIR)
प्रक्रिया,
जिसे
लेकर
विपक्ष
चर्चा
की
मांग
पर
अडिग
है
और
सरकार
उसे
गैर-जरूरी
विवाद
बता
रही
है।
लेकिन
इस
बार
चिंता
सिर्फ
हंगामे
की
नहीं
है,
बल्कि
संसद
की
लगातार
गिरती
संस्थागत
सेहत
की
है,
जो
अब
विशेषज्ञों
को
भी
परेशान
कर
रही
है।
शीतकालीन
सत्र
की
शुरुआत
ने
एक
बार
फिर
सवाल
उठाया
है
क्या
संसद
अपने
मूल
उद्देश्य,
संवाद
और
सहमति
की
राजनीति
को
दोबारा
पा
सकेगी।

🔵
रोज-रोज
का
हंगामा,
घटती
कार्यवाही-संसद
की
मूल
भावना
पर
प्रहार
पिछले
कुछ
सालों
में
संसद
की
उत्पादकता
लगातार
नीचे
आई
है।
पहले
जहां
घंटों
तक
बहसें
होती
थीं,
आज
चर्चा
शुरू
होने
से
पहले
ही
सदन
स्थगित
हो
जाना
आम
हो
गया
है।
इंडियन
एक्सप्रेस
के
मुताबिक
पूर्व
लोकसभा
महासचिव
पी
डी
टी
आचार्य
कहते
हैं
कि
इस
तरह
की
गिरावट
संसद
के
मूल
उद्देश्य
पर
ही
चोट
करती
है।
उनके
मुताबिक,
“जब
चर्चा
ही
नहीं
होगी
तो
बिलों
का
पास
होना
सिर्फ
औपचारिकता
रह
जाएगा।”
उन्होंने
चेतावनी
दी
कि
अनुच्छेद
107
के
अनुसार,
बिल
तभी
कानून
बन
सकता
है
जब
दोनों
सदनों
की
सहमति
हो,
और
यह
तभी
संभव
है
जब
बहस
और
समझ
के
बाद
फैसला
लिया
जाए।
🔵
मॉनसून
सत्र
के
आंकड़े
बताते
हैं
वास्तविक
स्थिति
PRS
Legislative
Research
के
आंकड़े
इस
गिरावट
को
और
स्पष्ट
करते
हैं।
जुलाई-अगस्त
2024
के
मॉनसून
सत्र
में
लोकसभा
सिर्फ
29%
और
राज्यसभा
मात्र
34%
समय
ही
चल
सकी।
सवाल-जवाब
का
सबसे
अहम
मौका
क्वेश्चन
ऑवर
लगभग
ठप
रहा,
लोकसभा
ने
इसका
सिर्फ
23%
और
राज्यसभा
ने
6%
समय
ही
इस्तेमाल
किया।
हालांकि
आठ
बिल
पास
हुए,
लेकिन
कई
बिना
किसी
गंभीर
चर्चा
के।
उदाहरण
के
लिए
ऑनलाइन
गेमिंग
बिल
लोकसभा
में
सिर्फ
6
मिनट
और
राज्यसभा
में
23
मिनट
में
पास
हो
गया।
लंबे
समय
से
लंबित
मर्चेंट
शिपिंग
बिल
पर
लोकसभा
में
20
मिनट,
जबकि
राज्यसभा
में
10
मिनट
की
चर्चा
हुई।
इस
बीच
लोकसभा
की
आधी
कार्यवाही
सिर्फ
ऑपरेशन
सिंदूर
पर
चली,
ये
दिखाता
है
कि
किस
तरह
संतुलित
विधायी
कामकाज
प्रभावित
होता
है।
🔵
विपक्ष
और
सरकार-जिम्मेदारी
किसकी,
दोष
किसे?
कांग्रेस
सांसद
मनीष
तिवारी
कहते
हैं
कि
संसद
अब
सरकार
के
प्रस्तावों
को
“रबर
स्टैम्प”
करने
का
मंच
बन
रही
है।
उनका
कहना
है
कि
कमेटियों
की
भूमिका
कमजोर
हुई
है
और
तटस्थता
भी
सवालों
में
है।
राज्यसभा
सांसद
सैयद
नसीर
हुसैन
का
कहना
है
कि
यदि
सरकार
चर्चा
के
लिए
जगह
नहीं
देगी,
तो
विपक्ष
का
विरोध
स्वाभाविक
है।
उधर
सरकार
बिलकुल
उलटा
पक्ष
रखती
है।
संसदीय
कार्य
मंत्री
किरेन
रिजिजू
का
कहना
है
कि
“विपक्ष
एक-दो
असफल
नेताओं
के
इशारे
पर
हंगामा
करता
है
और
असली
नुकसान
उनके
ही
सांसदों
का
होता
है।”
बीजेपी
प्रवक्ता
अनिल
बलूनी
ने
कहा
कि
जनता
विपक्ष
के
इस
रवैये
को
देख
रही
है
और
इसी
वजह
से
उन्हें
लगातार
चुनावों
में
नकारा
जा
रहा
है।
🔵
कभी
111%
उत्पादकता,
कभी
39%,
यही
है
संसद
की
नई
कहानी
2024
के
बजट
सत्र
में
उत्पादकता
असामान्य
रूप
से
बढ़
गई
थी,
लोकसभा
111%
और
राज्यसभा
112%
समय
चली।
लेकिन
ये
चमकीले
आंकड़े
अपवाद
हैं।
2024
के
ही
शीतकालीन
सत्र
में
उत्पादकता
गिरकरलोकसभा
52%
और
राज्यसभा
39%
रह
गई।
17वीं
लोकसभा
का
कुल
प्रदर्शन
देखा
जाए
तो
यह
1952
के
बाद
सबसे
कम
बैठकों
वाला
कार्यकाल
साबित
हुआ।
2020
में
कोविड
की
वजह
से
सिर्फ
33
दिन
सत्र
चला।
साथ
ही,
यह
पहली
लोकसभा
थी
जहां
पांच
साल
तक
डिप्टी
स्पीकर
नहीं
चुना
गया,
जो
संस्थागत
संतुलन
में
एक
गंभीर
कमी
मानी
जा
रही
है।
🔵
क्या
सचमुच
संस्थागत
गिरावट
हो
रही
है?
1950-70
के
बीच
संसद
साल
में
औसतन
121
दिन
चलती
थी।
2000
के
बाद
यह
घटकर
68
दिन
हो
गई।
पहली
लोकसभा
साल
में
135
दिन
बैठती
थी,
जबकि
17वीं
लोकसभा
मात्र
55
दिन।
🔵
कमेटियों
के
पास
भेजे
जाने
वाले
बिल
भी
घटे
-
14वीं
और
15वीं
लोकसभा
में
60%
बिल
समितियों
को
भेजे
जाते
थे। -
16वीं
और
17वीं
में
यह
गिरकर
20%
से
भी
कम
रह
गया। -
पंजाब
विश्वविद्यालय
के
प्रोफेसर
अशुतोष
कुमार
ने
अपनी
किताब
में
लिखा
था
कि
बहस
का
स्तर
घट
रहा
है,
सदस्य
गायब
रहते
हैं
और
कई
बार
सदन
में
आवश्यक
क्वोरम
तक
पूरा
नहीं
होता।
🔵
क्या
सिर्फ
आज
का
विपक्ष
जिम्मेदार
है?
क्या
कहते
हैं
आंकड़े
गिरावट
एक
लंबी
प्रक्रिया
है।
UPA-2
के
दौरान
15वीं
लोकसभा
की
उत्पादकता
सिर्फ
61%
और
राज्यसभा
की
66%
थी।
इसलिए
यह
कहना
कि
सिर्फ
मौजूदा
विपक्ष
हंगामा
करता
है,
आंकड़ों
से
साबित
नहीं
होता।
यह
पूरे
राजनीतिक
ढांचे
में
फैला
हुआ
संकट
है।
आपको
जानकर
हैरानी
होगी
कि
संसद
को
चलाने
का
एक
दिन
का
खर्चा
करोड़ों
में
आता
है।
लोकसभा
और
राज्यभा
के
चलने
का
एक
मिनट
का
खर्च
2.5
लाख
है।
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