पश्चिम चम्पारण: करीब 900 वर्ग किलोमीटर में फैले वाल्मीकि टाइगर रिजर्व को बिहार का गौरव कहा जाता है. वर्तमान में यहां 62 से अधिक बाघों का बसेरा है, जो वन्य जीवों के लिए यहां की अनुकूल जलवायु और बेहतरीन बायो डाइवर्सिटी का जीता जागता प्रमाण है. हालांकि, VTR में बाघों की बढ़ती ये संख्या जंगल से सटे ग्रामीण क्षेत्रों में रहने वाले लोगों के लिए अब गले का घेघ बनने लगी है.
बीते कुछ महीनों में यहां इंसानों पर बाघ के हमले के मामलों में अकल्पनीय बढ़ोतरी हुई है. इस बात का अनुमान ऐसे लगाया जा सकता है कि जुलाई से अगस्त के बीच 17 दिनों में ही बाघ और इंसानों के बीच संघर्ष के तीन से अधिक मामले सामने आ चुके हैं. इनमें दो लोगों की मौके पर ही और एक की इलाज के दौरान मौत हो गई है.
पहला मामला 30 जुलाई 2026 को समाने आया. जिसमें बगहा 02 प्रखंड अंतर्गत आने वाले बिसाहा गांव के समीप खेत में बकरी चरा रहे 65 वर्षीय अकलू यादव पर बाघ ने हमला किया.हालांकि इस दौरान आस पास मौजूद लोग मदद की आवाज़ सुन कर मौके पर पहुंचे और अकलू को बाघ के चंगुल से निकाला, लेकिन दुर्भाग्य की बात यह रही कि इलाज के पहले दिन ही उनकी मौत हो गई.
अगले ही दिन 31 जुलाई 2026 को इसानों पर बाघ के हमले का दूसरा मामला भी सामने आ गया.यह घटना मदनपुर वन क्षेत्र के नौरंगिया मिश्रौलिया रेता में घटी, जहां खेत में काम कर रही 45 वर्षीय महिला उमरावती देवी को बाघ ने अपना शिकार बनाया.इस हमले में उमरावती की मौके पर ही मौत हो गई, जिसके बाद पूरे गांव में वन्य जीवों के प्रति डर और आक्रोश का माहौल पैदा हो गया.
अभी इन दो मामलों से ज़िले के लोग उबर ही रहे थें कि शनिवार 15 अगस्त 2026 को एक ऐसी ही घटना घटित हुई, जिसमें बाघ ने वाल्मीकि नगर के भेड़िहारी गांव के बंगाली टोला निवासी 45 वर्षीय कृषक विजय हालदार पर हमला कर दिया. हमला इतना घातक था कि मौके पर ही विजय की मौत हो गई.
विजय के बड़े भाई तपन हालदार बताते हैं कि हर दिन की तरह शनिवार को भी विजय गांव से सटे अपनी खेत में घास काटने के लिए गए. क़रीब 6:30 बजे सुबह में घर से निकले विजय जब 9 बजे तक घर नहीं पहुंचें और उनका फोन भी ऑफ बताने लगा, तो गांव के लोगों ने उन्हें ढूंढने का फैसला किया.खेत के समीप पहुंचते ही सबने देखा कि विजय की साइकिल और काटी गई घास दोनों वहीं पड़ी थी, लेकिन आस पास उनका नामों निशान तक नहीं था.
सबने आगे बढ़कर गन्ने की खेत में प्रवेश किया जहां ज़मीन पर खून और किसी को घसीटकर अंदर ले जाने के निशान दिख रहे थें.कुछ कदम आगे बढ़ते ही ग्रामीणों को वो नज़ारा दिखा, जिसे देख सब थर्रा गए.जमींन पर विजय मृत अवस्था में पड़े थें और उनके चारों तरफ खून ही खून बह रहा था.विजय की गर्दन पर पांच बड़े दांतों के गभीर घाव थें और पीठ पर पंजे का निशान था.
17 दिनों में तीन मौतें
चीख पुकार और चीत्कार के बीच एक बात तो स्पष्ट हो गई कि विजय को भी बाघ ने ही मारा है.मौके पर पहुंची वन विभाग की टीम ने भी इस बात की पुष्टि कर दी.घटना के एक घंटे के अंदर ही स्थिति अनियंत्रित हो गई और गुस्साए लोगों ने वन विभाग और स्थानीय प्रशासन के खिलाफ मोर्चा खोल दिया.17 दिनों के अंदर ही VTR के मदनपुर और वाल्मीकिनगर वन क्षेत्र से सटे गांवों में इंसानों पर बाघ के चार हमलों ने स्थानीय लोगों में भारी आक्रोश और डर का माहौल पैदा कर दिया था.ऐसे में लोगों ने मदनपुर–गोरखपुर मुख्य मार्ग को बंद कर वन विभाग की पेट्रोलिंग जीप को क्षतिग्रस्त कर दिया और कर्मियों को भी अपनी चपेट में लेने लगें.हालांकि कुछ घंटों तक चले विवाद के बाद मामला शांत हुआ और ग्रामीण अपने अपने घर लौटें.
क्यों बढ़ रहे हैं इंसानों पर बाघ के हमले
बाघ और इंसानों के बीच बढ़ते संघर्ष के इस मामले पर लोकल 18 ने वन्य जीवों पर क़रीब दो दशक से काम कर रहे विशेषज्ञ अभिषेक से बात की.उनका कहना है कि सामान्यतः बाघ इंसानों को अपने आहार में शामिल नहीं करते हैं.बूढ़ा होना, बीमार होना या शिकार में असक्षम होने की स्थिति में वो आसान शिकार की तलाश में जुटते हैं और जंगल से बाहर निकल खेतों में चर रहे पालतू मवेशियों को अपना शिकार बनाते हैं. इस दौरान ज्यादातर मामलों में उनका सामना इंसानों से होता है और न चाहते हुए वो इंसान उनके हमले का शिकार बन बैठते हैं.
इतना ही नहीं, इंसानों द्वारा हर दिन जंगल की कटाई करना और बस्तियों को बनाना भी मानव और वन्य जीव के बीच संघर्ष का सबसे बड़ा कारण बनता जा रहा है.दरअसल, जंगल कम होने से शाकाहारी जीव जैसे जंगली सुवर, नीलगाय, हिरण इत्यादि को उनका आहार नहीं मिल पा रहा है और वो जंगल से सटे खेतों में चरने के लिए घुस रहे हैं.उधर बाघ और तेंदुए जैसे मांसाहारी जीव इन शाकाहारी जीवों का पीछा कर इंसानी बस्तियों तक पहुंच रहे हैं, जिससे मानव और उनके बीच संघर्ष की स्थिति उत्पन्न हो रही है.

