दो साल की उम्र में पहली बार तन्वी को जब सांस लेने में दिक्कत हुई और वह बेहोश हुई तो माता-पिता बेहाल हो गए, वहां डॉक्टरों को दिखाया तो हार्ट में दिक्कत सामने आई. बेटी को हर कीमत पर बेहतर इलाज दिलवाने के लिए वे उसे राजस्थान के कोटा से देश के सबसे बड़े टर्शियरी केयर सेंटर दिल्ली एम्स में लेकर आए. 13 साल तक कोटा से दिल्ली के चक्कर काटते रहे, डॉक्टरों की सलाह सुनते रहे, जांचें कराते रहे, लंबे इंतजार में खुद को दिलासा देते रहे लेकिन उन्हें क्या पता था कि जिस अस्पताल को वे भगवान का द्वार समझ रहे हैं, वहां से उन्हें उनकी बेटी का शव मिलेगा.
दिल्ली के ऑल इंडिया इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज पर एक बेबस पिता ने आरोप लगाए हैं. टाइम्स ऑफ इंडिया की खबर के मुताबिक दो साल की उम्र से बेटी तन्वी को कोटा से एम्स दिल्ली में इलाज कराने ला रहे पिता मुकेश परिहानी का धैर्य और हौसला उस वक्त टूट गया जब उनके हाथ में मंगलवार को एम्स अस्पताल ने उसका शव सौंपा.
दो साल की उम्र में तन्वी के दिल में एक बड़ी खराबी पाई गई थी. एम्स में इलाज के लिए आए तो डॉक्टरों ने बताया कि तन्वी को वेंट्रिकुलर सेप्टल डिफेक्ट और पल्मोनरी एट्रेसिया की परेशानी थी, यानी जन्म से ही उसके दिल में छेद था और उसके फेफड़ों तक खून पहुंचाने वाली नसें ठीक से काम नहीं कर रही थीं. इसकी वजह से उसके शरीर में ऑक्सीजन की कमी रहती थी. यह एक इमरजेंसी कंडीशन थी.
टीओआई को उसके पिता मुकेश परिहानी ने बताया कि वे साल 2012 में बेटी तन्वी को AIIMS दिल्ली लेकर आए. यहां कई महीनों तक जांचों के बाद डॉक्टरों ने सर्जरी की सलाह दी. आखिर में 2014 में कागजों में लिखा गया “यूनिफोकलाइजेशन और कंड्यूट सर्जरी”. यानि बच्ची की एडवांस कार्डियक सर्जरी होनी थी. यह पल्मोनरी एट्रेसिया के लिए होनी थी. इसका खर्च भी बताया गया कि करीब डेढ़ लाख रुपये. परिवार ने तुरंत हामी भर दी और बेटी के ठीक होने की उम्मीद बांध ली.
पिता ने बताया कि इसके बाद फिर सर्जरी के लिए तारीखों पर तारीखें मिलती रहीं और इसी बीच 2015 में सर्जरी की तारीख आई लेकिन दस्तावेज मांगने, जांच होने के बाद भी टाल दी गई. डॉक्टरों ने कोई जवाब भी नहीं दिया कि सर्जरी क्यों नहीं हुई.
इतने साल में तन्वी बड़ी होती गई लेकिन न तो कभी खेल पाई, न स्कूल जा पाई. जब भी वो थोड़ा चलती तो सांस फूल जाती, होंठ नीले पड़ जाते और बेहोश हो जाती, लेकिन एक पिता ने हार नहीं मानी और बस अपनी बेटी की जिंदगी बचाने के लिए वे कोटा से एम्स दिल्ली आकर यहां कई दिन तक बच्ची के इलाज की प्रक्रिया में लगे रहते.
इसी उधेड़बुन और भागदौड़ में 3 साल गुजर गए और फिर 2018 में डॉक्टरों ने कहा कि अब उसकी करेक्टिव सर्जरी नहीं की जा सकती. डॉक्टरों ने कहा कि बच्ची के फेफड़ों की नसें लगभग गायब हो चुकी हैं. सिर्फ दवाओं से चलाया जा सकता है. परिवार चुपचाप यह बात भी सह गया और फिर भी फॉलोअप के लिए आता रहा.
आखिरकार बेटी के हार्ट और लंग ट्रांसप्लांट पर डॉक्टरों में सहमति बनी और उसे 13 साल बाद जब तन्वी 15 साल की हो चुकी थी, अगस्त 2024 में फिर AIIMS नई दिल्ली में भर्ती कराया गया. डॉक्टरों ने कहा कि उसका हार्ट और फेफड़े ट्रांसप्लांट किए जाएंगे, यही एकमात्र इलाज है. उसकी जांचें हुईं, सोमवार शाम को एंडोस्कोपी हुई. ट्रांसप्लांट की तैयारियां होने लगीं, तभी मंगलवार सुबह करीब ढाई बजे उसे थकान और कमजोरी महसूस हुई.
डॉक्टरों ने जांच की तो देखा कि उसके शरीर की ऑक्सीजन गिरने लगी और उसकी ऑक्सीजन 48 प्रतिशत तक पहुंच गई. डॉक्टरों ने ऑक्सीजन दी लेकिन उसे हाइपोक्सिक अटैक आया. ऑक्सीजन नहीं पहुंच पाई और हार्ट ने काम करना बंद कर दिया. सुबह पांच बजकर छह मिनट पर तन्वी को कार्डियक अरेस्ट के बाद मृत घोषित कर दिया गया.
पिता का दर्द और आंसू बयां कर रहे मंजर
मंगलवार को जब पिता मुकेश परिहानी को बेटी का शव दिया गया तो उसकी आंखों में दर्द और आंसू थे, लेकिन उनकी कांपती आवाज में गुस्सा भी था, वे कह रहे थे कि एम्स ने तेरह साल इंतजार करवाया. तारीखें दीं, टालीं. दस्तावेज मांगे, डिस्चार्ज का दबाव डाला. अब बेटी चली गई. अस्पताल से जवाब चाहिए.
क्या बोल रहे एम्स के डॉक्टर?
इस मामले पर 28 अगस्त को बच्ची की मौत से पहले एम्स के डॉक्टरों ने बताया था कि पहले करीब डेढ़ लाख रुपये का अनुमान शायद सर्जरी के लिए था, जब बच्ची की सर्जरी संभव मानी जा रही थी लेकिन पल्मोनरी आर्टरी (फेफड़ों की नस) मौजूद नहीं थी, इसलिए सुधार वाली सर्जरी अब संभव नहीं थी और हार्ट-लंग ट्रांसप्लांट पर विचार किया जा रहा था.
रिकॉर्ड बताते हैं कि वह लगातार फॉलो-अप में रही. 2018 की जांच में लिखा गया था कि उसके फेफड़ों को खून पहुंचाने वाली मुख्य नसें गायब हैं और उसका दिल का ढांचा बहुत जटिल है और सर्जरी जानलेवा हो सकती है.
पिता बोले संतोषजनक जवाब नहीं मिला
पिता मुकेशन परिहानी का कहना है कि उन्हें उनकी बेटी की मौत का संतोषजनक जवाब नहीं दिया गया. उन्होंने आरोप लगाया कि अस्पताल के कर्मचारी बार-बार उनसे दस्तावेज मांगते रहे और कई बार उन्हें डिस्चार्ज लेने का दबाव डालते रहे. उन्होंने यह भी कहा कि उन्हें साजिश का शक है और वह अपनी बेटी की मौत की परिस्थितियों की जांच कराना चाहते हैं.
हालांकि अभी इस मामले में जांच के बाद ही पिता के आरोपों और बच्ची की मेडिकल कंडीशन के बारे में कुछ स्पष्ट रूप से कहा जा सकता है.

