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राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु 20 जून को अपना 68वां जन्मदिन मना रही हैं_ ओडिशा के एक छोटे से आदिवासी गांव से निकलकर देश की 15वीं राष्ट्रपति बनने तक उनका सफर संघर्ष, साहस और आत्मविश्वास की मिसाल है. जीवन में उन्होंने दो बेटों, मां, भाई और पति को खोने जैसी बड़ी त्रासदियों का सामना किया, लेकिन हार नहीं मानी. आध्यात्म और योग के सहारे उन्होंने खुद को संभाला और सार्वजनिक जीवन में लगातार आगे बढ़ती रहीं. विधायक, मंत्री, राज्यपाल और फिर राष्ट्रपति बनने तक की उनकी कहानी करोड़ों लोगों को प्रेरित करती है.
राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु का आज 68वां जन्मदिन है.
नई दिल्ली. राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु 20 जून को अपना 68वां जन्मदिन मनाने जा रही हैं. देश की प्रथम नागरिक के रूप में उनकी पहचान जितनी बड़ी है, उससे कहीं अधिक प्रेरणादायक उनकी जीवन यात्रा है. ओडिशा के एक छोटे से आदिवासी गांव से निकलकर देश के सर्वोच्च संवैधानिक पद तक पहुंचने का उनका सफर संघर्ष, धैर्य, आत्मविश्वास और अटूट इच्छाशक्ति की मिसाल माना जाता है.
द्रौपदी मुर्मु सिर्फ आदिवासी समाज की ही नहीं, बल्कि पूरे देश की प्रेरणा हैं. उनके जीवन में ऐसे कई मौके आए, जब हालात किसी भी इंसान को अंदर से तोड़ सकते थे. उन्होंने अपने दो जवान बेटों को खोया, मां और भाई का निधन देखा और फिर जीवनसाथी को भी हमेशा के लिए विदा करना पड़ा. लेकिन इन दुखों के बीच भी उन्होंने हार नहीं मानी. उन्होंने खुद को संभाला, आध्यात्म का सहारा लिया और आगे बढ़ती रहीं.
छोटे गांव से शुरू हुई बड़ी यात्रा
- द्रौपदी मुर्मु का जन्म 20 जून 1958 को ओडिशा के मयूरभंज जिले के दूरस्थ उपरबेड़ा गांव में एक संथाल आदिवासी परिवार में हुआ था.
- उस दौर में गांवों में शिक्षा की सुविधाएं सीमित थीं, खासकर लड़कियों के लिए पढ़ाई का रास्ता आसान नहीं था. लेकिन उन्होंने शुरुआत से ही शिक्षा को अपनी ताकत बनाया.
- उनकी प्रारंभिक शिक्षा उपरबेड़ा प्राथमिक विद्यालय में हुई. आगे की पढ़ाई के लिए उन्हें अपने गांव से बाहर जाना पड़ा. आठवीं कक्षा के बाद वे भुवनेश्वर पहुंचीं और पढ़ाई जारी रखी.
- उन्होंने इतिहास रचते हुए अपने गांव की पहली ऐसी लड़की बनने का गौरव हासिल किया, जिसने मैट्रिक परीक्षा पास की और स्नातक की डिग्री हासिल की.
- साल 1979 में उन्होंने भुवनेश्वर के रमादेवी महिला महाविद्यालय से राजनीति विज्ञान और अर्थशास्त्र में कला स्नातक की उपाधि प्राप्त की. इसके एक वर्ष बाद 1980 में उनकी शादी बैंक अधिकारी श्यामचरण मुर्मु से हुई.
संघर्षों ने गढ़ा राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु का व्यक्तित्व
- द्रौपदी मुर्मु का शुरुआती जीवन चुनौतियों से भरा रहा. सीमित संसाधन, सामाजिक कठिनाइयां और आर्थिक चुनौतियां उनके सामने थीं. लेकिन उन्होंने हर मुश्किल का सामना धैर्य और मेहनत के साथ किया.
- परिवार से मिले नैतिक मूल्यों और शिक्षा के प्रति समर्पण ने उन्हें आगे बढ़ने की ताकत दी. यही वह दौर था, जिसने उनके भीतर सेवा भावना और नेतृत्व क्षमता को मजबूत किया.
- द्रौपदी मुर्मु के जीवन का सबसे कठिन दौर वह था, जब उन्होंने अपने परिवार के कई सदस्यों को खो दिया. साल 2009 में उनके 25 वर्षीय बेटे का असमय निधन हो गया. यह सदमा इतना बड़ा था कि वे गहरे अवसाद यानी डिप्रेशन में चली गईं थीं.
- किसी मां के लिए जवान बेटे को खोना सबसे बड़ा दुख माना जाता है. लेकिन यह दुख यहीं खत्म नहीं हुआ. वे धीरे-धीरे खुद को संभाल रही थीं कि चार साल बाद 2013 में एक और हादसे में उनके दूसरे बेटे की भी मौत हो गई.
- एक के बाद एक लगे इन झटकों ने उनकी जिंदगी को पूरी तरह बदल दिया. दूसरे बेटे के निधन के कुछ समय बाद ही उनकी मां और भाई का भी देहांत हो गया. परिवार में लगातार हो रही मौतों ने उन्हें गहरे दुख में डाल दिया.
- इसके बाद 2014 में उनके पति श्यामचरण मुर्मु भी दुनिया को अलविदा कह गए. कुछ ही वर्षों में उन्होंने अपने परिवार के कई करीबी सदस्यों को खो दिया था.
आध्यात्म और योग से मिली नई ताकत
- इतने बड़े दुखों के बावजूद द्रौपदी मुर्मु ने हार नहीं मानी. उन्होंने खुद को टूटने नहीं दिया. मानसिक मजबूती के लिए उन्होंने आध्यात्म का रास्ता चुना और ब्रह्माकुमारी संस्था से जुड़ गईं.
- उन्होंने योग और आत्मचिंतन को अपने जीवन का हिस्सा बनाया. धीरे-धीरे वे डिप्रेशन से बाहर निकलीं और खुद को पहले से अधिक मजबूत बनाया. उन्होंने अपने दुख को अपनी कमजोरी नहीं बनने दिया, बल्कि उसे ताकत में बदल दिया.
- उनकी यह यात्रा बताती है कि कठिन से कठिन परिस्थितियों में भी यदि आत्मविश्वास और धैर्य बना रहे तो इंसान हर चुनौती का सामना कर सकता है.
- द्रौपदी मुर्मु का राजनीतिक सफर भी बेहद प्रेरणादायक रहा है. उन्होंने राजनीति की शुरुआत जमीनी स्तर से की. साल 1997 में वे रायरंगपुर नगर पंचायत में पार्षद चुनी गईं. यही उनके सार्वजनिक जीवन की शुरुआत थी.
- इसके बाद उन्होंने लगातार लोगों के बीच काम किया और अपनी पहचान बनाई. साल 2000 में ओडिशा में भाजपा-बीजेडी गठबंधन सरकार बनने पर उन्हें मंत्री बनने का अवसर मिला. उन्होंने परिवहन, वाणिज्य, मत्स्य पालन और पशुपालन जैसे महत्वपूर्ण विभागों की जिम्मेदारी संभाली.
- उनकी कार्यशैली और जनसेवा के प्रति समर्पण को देखते हुए उन्हें साल 2007 में ओडिशा विधानसभा की ओर से ‘पंडित नीलकंठ दास-सर्वश्रेष्ठ विधायक’ पुरस्कार से सम्मानित किया गया.
दो बार विधायक भी रह चुकी हैं प्रेसीडेंट मैडम
- द्रौपदी मुर्मु रायरंगपुर विधानसभा सीट से भाजपा के टिकट पर दो बार विधायक चुनी गईं. उन्होंने 2000 और 2009 में चुनाव जीतकर विधानसभा पहुंचने का गौरव हासिल किया.
- 2009 का चुनाव उनके राजनीतिक जीवन का महत्वपूर्ण पड़ाव माना जाता है. उस समय बीजेडी ने भाजपा से गठबंधन तोड़ लिया था और मुख्यमंत्री नवीन पटनायक के नेतृत्व में बड़ी जीत दर्ज की थी. इसके बावजूद द्रौपदी मुर्मु ने अपनी सीट बचाकर अपनी राजनीतिक मजबूती साबित की.
- विधायक और मंत्री के रूप में काम करने के साथ-साथ उन्होंने संगठन में भी कई महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां निभाईं. वे भाजपा के अनुसूचित जनजाति मोर्चा की उपाध्यक्ष और बाद में अध्यक्ष रहीं.
- साल 2010 में उन्हें भाजपा की मयूरभंज (पश्चिम) इकाई का जिला अध्यक्ष बनाया गया. 2013 में वे दोबारा इस पद पर चुनी गईं. इसी वर्ष उन्हें भाजपा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी के एसटी मोर्चा का सदस्य भी बनाया गया.
- द्रौपदी मुर्मु के सार्वजनिक जीवन का एक और बड़ा अध्याय 2015 में शुरू हुआ, जब उन्हें झारखंड का राज्यपाल नियुक्त किया गया. वे इस पद तक पहुंचने वाली पहली आदिवासी नेता बनीं.
- उन्होंने 2015 से 2021 तक झारखंड की 9वीं राज्यपाल के रूप में अपनी सेवाएं दीं. इस दौरान उन्होंने संवैधानिक जिम्मेदारियों का निर्वहन करते हुए अपनी अलग पहचान बनाई.
कैसा रहा मैडम द्रौपदी मुर्मु का राष्ट्रपति बनने तक का सफर?
झारखंड की राज्यपाल के रूप में सफल कार्यकाल के बाद द्रौपदी मुर्मु ने भारतीय लोकतंत्र के सर्वोच्च पद तक पहुंचने का इतिहास रचा. उन्होंने 25 जुलाई 2022 को भारत की 15वीं राष्ट्रपति के रूप में शपथ ली. उनका राष्ट्रपति बनना सिर्फ एक राजनीतिक उपलब्धि नहीं था, बल्कि यह देश के लोकतंत्र की ताकत और सामाजिक समावेशन का बड़ा संदेश भी था. एक छोटे आदिवासी गांव की बेटी का राष्ट्रपति भवन तक पहुंचना करोड़ों लोगों के लिए प्रेरणा बन गया.
प्रेसीडेंट द्रौपदी मूर्मू का संस्कृति, भाषा और समाज के लिए क्या योगदान है?
द्रौपदी मुर्मु भारत की सांस्कृतिक और भाषाई विविधता के संरक्षण की समर्थक रही हैं. उन्होंने संथाली भाषा को भारत की आधिकारिक भाषा के रूप में संवैधानिक मान्यता दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. इसके साथ ही वे ‘ओल चिकी’ लिपि के संहिताकरण से जुड़ी पहल का भी हिस्सा रहीं. वे कई आदिवासी सामाजिक, शैक्षिक और सांस्कृतिक संगठनों से जुड़ी रही हैं. स्वाध्याय में उनकी विशेष रुचि रही है और अध्यात्म के प्रति उनकी गहरी आस्था जगजाहिर है. राष्ट्रपति के रूप में भी उन्होंने राष्ट्रपति भवन में भारत की कला और सांस्कृतिक विरासत को बढ़ावा देने के लिए कई पहल की हैं. साथ ही राष्ट्रपति भवन को आम लोगों, बच्चों और दिव्यांगजनों के लिए अधिक सुलभ बनाने की दिशा में भी कई कदम उठाए हैं.
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Anoop Kumar Mishra is currently serving as Assistant Editor at News18 Hindi Digital, where he leads coverage of strategic domains including aviation, defence, paramilitary forces, international security affairs…और पढ़ें

