Shatrughan Sinha Birthday Special By Rasheed Kidwai: परदे पर प्राय: ‘खलनायक’ की भूमिकाएं निभाने वाले अभिनेता और राजनेता शत्रुघ्न सिन्हा ने असल जिंदगी में राजनीति हमेशा नायकत्व के उसूलों के साथ की है. जयप्रकाश नारायण के विचारों से प्रेरित होकर सियासत की सीढ़ियां चढ़ने वाले सिन्हा आज जीवन के उस मोड़ पर आ खड़े हुए हैं, जहां से आगे का राजनीतिक रास्ता बहुत सुहावना और आसान नजर नहीं आता. आज उनकी पार्टी तृणमूल कांग्रेस को उसके कई पुराने और कद्दावर नेता छोड़कर जा चुके हैं, लेकिन ‘शॉटगन’ के नाम से मशहूर सिन्हा अपनी नेता ममता बनर्जी के साथ दिखाई देते हैं.
राजनीति में निष्ठा और वफादारी का यह प्रदर्शन शत्रुघ्न सिन्हा ने कोई पहली बार नहीं किया है. भाजपा में वे अटल बिहारी वाजपेयी और लालकृष्ण आडवाणी के व्यक्तित्व से प्रभावित होकर शामिल हुए थे. यहां तक कि मोदी युग में भी सिन्हा, आडवाणी के प्रति पूरी तरह वफादार बने रहे. बेशक, इस निष्ठा का उन्हें बड़ा सियासी नुकसान भी उठाना पड़ा. मई 2014 में जब नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में पहली कैबिनेट ने शपथ ली तो उसमें सिन्हा का नाम नदारद था. भाजपा के भीतर के कई नेताओं का मानना था कि सिन्हा और नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली भाजपा के बीच बढ़ती दूरी की सबसे बड़ी वजह आडवाणी के साथ उनकी नजदीकी थी. खुद सिन्हा का मानना था कि आडवाणी के प्रति अपनी निष्ठा की कीमत उन्हें चुकानी पड़ी.
पार्टी के कई अन्य वरिष्ठ नेताओं की तरह उन्हें भी लगभग हाशिए पर डाल दिया गया. आखिरकार, साल 2019 में वे भाजपा छोड़ने पर मजबूर हो गए और कांग्रेस का दामन थाम लिया. लेकिन जिस कांग्रेस का उन्होंने जिंदगी भर विरोध किया था, उसमें उनका ज्यादा दिनों तक टिकना अस्वाभाविक ही था. इसलिए करीब दो साल बाद ही वे तृणमूल कांग्रेस में चले गए.
अभिनेताओं के सत्तारूढ़ दल में शामिल होने की तोड़ी परिपाटी…
शत्रुघ्न सिन्हा हिंदी सिनेमा के पहले ऐसे बड़े स्टार थे, जिन्होंने तत्कालीन सत्तारूढ़ दल का हाथ थामने के बजाय विपक्ष की राजनीति को चुना. उनसे पहले के दौर के तमाम बड़े अभिनेताओं का इतिहास देखें, चाहे वह सुनील दत्त हों, अमिताभ बच्चन या फिर राजेश खन्ना, सभी उन्हीं पार्टियों में शामिल हुए जो उस समय सत्ता के शीर्ष पर थीं.
दरअसल, सिन्हा के इस लीक से हटकर चलने वाले रवैये के पीछे जेपी का गहरा प्रभाव था. व्यवस्था विरोधी सिद्धांतों के पैरोकार रहे जेपी के आदर्शों ने सिन्हा के भीतर एक अमिट छाप छोड़ी थी. साल 1975 में जब जेपी ने ‘संपूर्ण क्रांति’ का आह्वान किया तो सिन्हा ने भी तत्कालीन इंदिरा गांधी सरकार के खिलाफ आंदोलनों और गतिविधियों में सक्रिय रूप से भाग लेना शुरू कर दिया था. इसलिए 1990 के दशक में जब सिन्हा ने राजनीति में औपचारिक रूप से शामिल होने का फैसला लिया तो उन्होंने गैर कांग्रेसी मोर्चे को ही चुनना पसंद किया. हालांकि वे हिंदुत्व की विचारधारा के समर्थक नहीं थे, लेकिन अटल बिहारी वाजपेयी के सांचे में ढले होने की वजह से भाजपा में शामिल हो गए. वे ऐसे पहले फिल्म स्टार रहे जो केंद्र सरकार में कैबिनेट मंत्री के ओहदे तक पहुंचे. साल 2002 से 2004 के बीच वाजपेयी सरकार में उन्होंने पहले केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्री और बाद में जहाजरानी मंत्री के रूप में अपनी जिम्मेदारियां निभाईं.
विरोधी दलों में भी बनाए मित्र, प्रतिद्वंद्वियों के रहे प्रशंसक
शत्रुघ्न सिन्हा की राजनीति का एक खूबसूरत पहलू यह भी रहा कि भाजपा में रहते हुए भी उन्होंने विपक्षी पार्टियों में शामिल अभिनेताओं की तारीफ करने में कभी कोई कंजूसी नहीं की. इनमें मुख्य रूप से सुनील दत्त थे, जिन्हें वे अपना बड़ा भाई मानते रहे.
जब भाजपा ने सिन्हा को 1992 में नई दिल्ली लोकसभा क्षेत्र के उपचुनाव में राजेश खन्ना के खिलाफ अपना उम्मीदवार बनाया तो उन्होंने अपने चुनावी भाषणों में प्रतिद्वंद्वी पार्टी के खिलाफ तो तीखे हमले किए, लेकिन प्रतिद्वंद्वी उम्मीदवार राजेश खन्ना के खिलाफ वे एक शब्द भी नहीं बोले. उन्होंने कुछ साल बाद कहा था कि राजेश खन्ना के खिलाफ चुनाव लड़ना उनके राजनीतिक जीवन का सबसे बड़ा अफसोसजनक फैसला था. उन्होंने बाद में राजेश खन्ना से सीधे और परोक्ष, दोनों तरह से माफी भी मांगी थी. उन्होंने यह भी कहा था कि किसी भी परिस्थिति में मुझे अपने सक्रिय राजनीतिक जीवन की शुरुआत किसी उपचुनाव से नहीं करनी चाहिए थी. लेकिन मैं अपने मार्गदर्शक, गुरु और सर्वोच्च नेता लालकृष्ण आडवाणी जी को ‘ना’ नहीं कह सका.
जब सोनिया ने चाय पे बुलाया था…!
भाजपा से उनके मोहभंग और कांग्रेस में जाने की अटकलों के बीच एक बार सिन्हा कांग्रेस नेता कमलनाथ के साथ सोनिया गांधी के आवास पर मुलाकात करने पहुंचे थे. उस समय इस मुलाकात को लेकर राजनीतिक गलियारों में तरह-तरह के कयास लगाए जाने लगे थे, लेकिन बाद में सिन्हा ने इन अफवाहों को सिरे से खारिज कर दिया.
सूत्रों के अनुसार, दरअसल, शत्रुघ्न सिन्हा ने सोनिया गांधी द्वारा आयोजित एक इफ्तार पार्टी में शिरकत की थी, जहां उन्होंने पूर्व प्रधानमंत्री स्वर्गीय राजीव गांधी से जुड़े कुछ बेहद आत्मीय और दिलचस्प संस्मरण सुनाए थे. उन किस्सों से प्रभावित होकर खुद सोनिया गांधी ने उन्हें चाय पर अपने घर आने का न्योता दिया था. लेकिन इस बेहद अनौपचारिक और शिष्टाचार से भरी मुलाकात को मीडिया और सियासी विश्लेषकों ने राजनीतिक रंग देकर बड़ा बवंडर बना दिया था. दिसंबर 2016 में बेंगलुरु लिटरेरी फेस्टिवल के दौरान भी शत्रुघ्न सिन्हा ने खुले तौर पर स्वीकार किया था कि वे व्यक्तिगत रूप से सोनिया गांधी के जबरदस्त प्रशंसक हैं.

