हाल ही में अमेरिका और ईरान के बीच हुए संघर्षविराम के बाद भले ही पश्चिम एशिया में हथियारों की आवाज कुछ शांत हुई हो, लेकिन इस संघर्ष ने समुद्री सुरक्षा, वैश्विक व्यापार और समुद्री नाविकों की सुरक्षा को लेकर कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं. इसी संघर्ष के दौरान तीन भारतीय नाविकों की मौत ने भी दुनिया का ध्यान उन खतरों की ओर खींचा है जिनका सामना समुद्र में काम करने वाले लाखों लोग रोज़ाना करते हैं.
25 जून को मनाए जाने वाले “वर्ल्ड सीफेरर्स डे” से पहले News18 से विशेष बातचीत में भारतीय नौसेना के वरिष्ठ और सम्मानित अधिकारी कमोडोर श्रीकांत केसनूर ने तीन भारतीय नाविकों की मौत, समुद्री कानून, भारतीय नाविकों की चुनौतियों और भारत के समुद्री भविष्य पर विस्तार से अपने विचार रखे.
तीन भारतीय नाविकों की मौत पर क्या बोले कमोडोर केसनूर?
कमोडोर केसनूर ने सबसे पहले मृत भारतीय नाविकों के परिवारों के प्रति गहरी संवेदना व्यक्त की. उन्होंने कहा कि ड्यूटी के दौरान भारतीय नाविकों की जान जाना बेहद दुखद है. उन्होंने बताया कि अमेरिकी पक्ष का दावा है कि जिस जहाज ‘सर्टाबेलो’ पर हमला हुआ, वह कथित तौर पर अमेरिकी नाकेबंदी को तोड़ने की कोशिश कर रहा था और संभवतः ईरान से जुड़े प्रतिबंधित सामान के परिवहन में शामिल था. इसी आधार पर उसे निशाना बनाया गया.
हालांकि कमोडोर केसनूर ने कहा कि इस पूरे मामले में कई कानूनी और परिचालन संबंधी सवाल उठते हैं. उन्होंने कहा कि नाकेबंदी युद्ध का एक कानूनी साधन माना जाता है और कई बार यह सीधे युद्ध की तुलना में कम जनहानि वाला विकल्प भी हो सकता है. लेकिन सवाल यह है कि जब औपचारिक युद्ध की घोषणा नहीं हुई थी और अमेरिकी राष्ट्रपति पहले ही संघर्ष समाप्त होने की बात कह चुके थे, तब नाकेबंदी की कानूनी स्थिति क्या थी?
उनके अनुसार नाकेबंदी लागू करना स्वयं युद्ध जैसी कार्रवाई माना जाता है और इसी कारण इसकी वैधता पर विशेषज्ञों के बीच मतभेद हैं.
क्या अमेरिकी कार्रवाई जरूरत से ज्यादा थी?
कमोडोर केसनूर ने कहा कि सबसे बड़ा सवाल यह है कि जहाज को कहाँ निशाना बनाया गया. क्या वह वास्तव में नाकेबंदी क्षेत्र में था या उससे काफी दूर था? क्या वह वास्तव में नाकेबंदी तोड़ रहा था? क्या उसने अमेरिकी निर्देशों का पालन नहीं किया था? या फिर वह गलत पहचान अथवा गलत लक्ष्य निर्धारण का शिकार हुआ?
उन्होंने बताया कि तीन जहाजों: सर्टाबेलो, मेरिवैक्स और जयवीर पर कार्रवाई हुई थी. इनमें से एक जहाज ओमान के तट के पास उस समय निशाना बनाया गया जब वह अपना माल उतार चुका था. कमोडोर केसनूर के अनुसार दूसरा महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि क्या जहाज को रोकने के लिए सीधे मिसाइल दागना जरूरी था. उन्होंने कहा कि सामान्य तौर पर किसी जहाज को रोकने के लिए चेतावनी दी जाती है, उसके आगे फायर किया जाता है, हेलीकॉप्टर भेजा जाता है और अंतरराष्ट्रीय संचार माध्यमों से रुकने के निर्देश दिए जाते हैं.
उन्होंने कहा कि अंतरराष्ट्रीय संघर्षों में “आवश्यकता” और “अनुपातिकता” दो महत्वपूर्ण सिद्धांत होते हैं. ऐसे में यह देखना जरूरी है कि क्या बल प्रयोग आवश्यक था और क्या वह खतरे के अनुपात में था. कमोडोर केसनूर के शब्दों में, उपलब्ध तथ्यों को देखते हुए ऐसा प्रतीत होता है कि अमेरिकी नौसेना ने अत्यधिक बल का प्रयोग किया. उनके अनुसार यदि जहाजों ने वास्तव में निर्देशों का उल्लंघन भी किया था, तब भी मिसाइल हमला आवश्यकता से अधिक कठोर प्रतिक्रिया प्रतीत होती है.
उन्होंने कहा कि उनके विचार में यह घटना नहीं होनी चाहिए थी और मौके पर निर्णय लेने वाले कमांडर को अधिक विवेक का इस्तेमाल करना चाहिए था. हालांकि उन्होंने यह भी जोड़ा कि किसी भी सैन्य कमांडर को मौके पर कई प्रकार के दबावों और सूचनाओं के आधार पर निर्णय लेना पड़ता है.
वर्ल्ड सीफेरर्स डे का महत्व
कमोडोर केसनूर ने कहा कि समुद्री नाविक वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला की सबसे महत्वपूर्ण कड़ी हैं. दुनिया का लगभग 90 प्रतिशत व्यापार समुद्री मार्गों से होता है. यदि जहाज और नाविक सामान की ढुलाई बंद कर दें तो आधुनिक वैश्विक अर्थव्यवस्था ठप पड़ जाएगी. उन्होंने कहा कि आज दुनिया के किसी भी हिस्से में एक क्लिक पर सामान उपलब्ध हो जाता है, लेकिन इसके पीछे समुद्र में काम करने वाले लाखों नाविकों की मेहनत होती है. इसलिए पूरी दुनिया उन पर कृतज्ञता का ऋणी है.
उन्होंने बताया कि अंतरराष्ट्रीय नियम वाणिज्यिक जहाजों को निर्बाध आवाजाही का अधिकार देते हैं. ‘फ्रीडम ऑफ नेविगेशन’ केवल सैन्य या राजनीतिक अवधारणा नहीं है, बल्कि यह नाविकों की सुरक्षा से भी जुड़ी हुई है.
संघर्ष क्षेत्रों में नाविकों के सामने कौन-कौन से खतरे हैं?
कमोडोर केसनूर ने कहा कि दुनिया भर के नाविकों को कई प्रकार के खतरों का सामना करना पड़ता है. कुछ खतरे स्थानीय होते हैं जबकि कुछ क्षेत्रीय या अंतरराष्ट्रीय स्तर के होते हैं. उन्होंने उदाहरण देते हुए अदन की खाड़ी में समुद्री डकैती, अफ्रीका के पश्चिमी तट के आसपास की घटनाओं और हूती जैसे सशस्त्र समूहों द्वारा समुद्री यातायात को दी जाने वाली धमकियों का उल्लेख किया.
उन्होंने कहा कि समुद्री डकैती, आतंकवाद, सशस्त्र लूटपाट, स्थानीय आपराधिक गिरोहों की गतिविधियां, युद्ध, खराब मौसम, प्रशासनिक समस्याएं और संचार संबंधी कठिनाइयां लगातार नाविकों के लिए जोखिम पैदा करती हैं. उनके अनुसार आधुनिक युद्धों में ड्रोन और सटीक निर्देशित मिसाइलों के बढ़ते उपयोग ने समुद्री नाविकों के लिए खतरे को और बढ़ा दिया है, क्योंकि ऐसे हमले दूर से और बिना पर्याप्त चेतावनी के किए जा सकते हैं.
उन्होंने जोर देकर कहा कि नाविकों की सुरक्षा केवल किसी एक देश की जिम्मेदारी नहीं है बल्कि यह पूरी दुनिया की साझा जिम्मेदारी है.
भारतीय नाविकों की स्थिति और चुनौतियां
कमोडोर केसनूर ने बताया कि दुनिया भर में तीन लाख से अधिक भारतीय नाविक कार्यरत हैं. वैश्विक समुद्री समुदाय में भारतीयों की हिस्सेदारी लगभग एक-पांचवें से एक-छठे के बीच है. भारत, फिलीपींस और चीन दुनिया के सबसे बड़े समुद्री मानव संसाधन प्रदाताओं में शामिल हैं. हालांकि उन्होंने एक महत्वपूर्ण विरोधाभास की ओर भी ध्यान दिलाया.
उन्होंने कहा कि भारत दुनिया को बड़ी संख्या में नाविक देता है, लेकिन भारत के कुल व्यापार का केवल लगभग 5 से 6 प्रतिशत हिस्सा भारतीय ध्वज वाले जहाजों के माध्यम से होता है. इसका मतलब है कि अधिकांश भारतीय व्यापार विदेशी जहाजों पर निर्भर है. उन्होंने कहा कि भारत हर साल अंतरराष्ट्रीय शिपिंग कंपनियों को भारी रकम का भुगतान करता है जबकि वैश्विक जहाजरानी क्षमता में भारत की हिस्सेदारी अभी भी बहुत सीमित है.
उनके अनुसार अधिकांश भारतीय नाविक विदेशी ध्वज वाले जहाजों पर काम करते हैं और यही स्थिति कई जटिलताएं पैदा करती है.
विदेशी ध्वज वाले जहाजों की जटिलता
कमोडोर केसनूर ने बताया कि कई जहाज ऐसे देशों में पंजीकृत होते हैं जिन्हें “फ्लैग ऑफ कन्वीनियंस” कहा जाता है. इनमें पनामा, लाइबेरिया, बहामास और पलाऊ जैसे देश शामिल हैं. ऐसे मामलों में जहाज का स्वामित्व एक देश के पास, संचालन किसी दूसरे देश की कंपनी के पास, चार्टर किसी तीसरे देश की संस्था के पास और चालक दल कई अलग-अलग देशों के लोगों से मिलकर बना होता है.
उन्होंने कहा कि ऐसी स्थिति में यदि किसी जहाज पर भारतीय नाविक मौजूद हों और कोई दुर्घटना या हमला हो जाए, तो कानूनी अधिकार क्षेत्र और जिम्मेदारी तय करना बेहद जटिल हो जाता है.
भारतीय नौसेना क्या कर सकती है?
कमोडोर केसनूर ने कहा कि भारतीय नौसेना लगातार समुद्री सुरक्षा में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है. भारतीय युद्धपोत संवेदनशील क्षेत्रों में तैनात रहते हैं और आवश्यकता पड़ने पर बचाव अभियान भी चलाते हैं. उन्होंने समुद्री डकैती विरोधी अभियानों और हाल के कई बचाव अभियानों का उल्लेख करते हुए कहा कि भारतीय नौसेना ने कई बार साहसिक कार्रवाई करके लोगों की जान बचाई है.
हालांकि उन्होंने स्पष्ट किया कि भारतीय नाविक पूरी दुनिया में फैले हुए हैं और किसी भी नौसेना के लिए हर जगह हर समय मौजूद रहना संभव नहीं है. यदि किसी सक्रिय युद्ध क्षेत्र में सीधे हस्तक्षेप किया जाए तो स्वयं नौसेना भी संघर्ष का हिस्सा बन सकती है. उन्होंने कहा कि जहां जरूरत होती है वहां एस्कॉर्ट, काफिला सुरक्षा, चिकित्सा सहायता और निकासी जैसे कदम उठाए जाते हैं, लेकिन हर घटना में तत्काल हस्तक्षेप करना व्यावहारिक नहीं होता.
भारत को आगे क्या करना चाहिए?
कमोडोर केसनूर ने कहा कि समुद्री क्षेत्र भारत के लिए एक बड़ा अवसर है. उन्होंने बताया कि वर्ष 2010 में भारतीय नाविकों की संख्या लगभग 60 हजार थी, जो अब बढ़कर तीन लाख से अधिक हो गई है. उनके अनुसार भारत को अधिक संख्या में भारतीय ध्वज वाले जहाजों की आवश्यकता है. इसके लिए जहाज निर्माण को बढ़ावा देना होगा, उद्योग को प्रोत्साहन देना होगा और कारोबार करने की प्रक्रिया को आसान बनाना होगा.
उन्होंने कहा कि पंजीकरण, बीमा, नियामकीय प्रक्रियाओं और अनुपालन नियमों को अधिक सरल और पारदर्शी बनाने की जरूरत है ताकि अधिक जहाज भारतीय ध्वज के तहत पंजीकृत हों. कमोडोर केसनूर ने यह भी कहा कि भारत को वैश्विक समुद्री संस्थाओं, बीमा व्यवस्था, समुद्री प्रशासन और अंतरराष्ट्रीय निर्णय प्रक्रिया में अपनी भूमिका बढ़ानी चाहिए. उनका मानना है कि भारत की बढ़ती वैश्विक स्थिति को देखते हुए उसे समुद्री मामलों की शीर्ष निर्णय प्रक्रिया में अधिक प्रभावशाली भूमिका निभानी चाहिए.
उन्होंने समुद्री शिक्षा, कौशल विकास और प्रशिक्षित मानव संसाधन बढ़ाने की आवश्यकता पर भी जोर दिया.
युद्ध से भारत के लिए क्या सबक?
बातचीत के अंत में कमोडोर केसनूर ने कहा कि इस पूरे संघर्ष से भारत के लिए सबसे बड़ा सबक आत्मनिर्भरता है. उन्होंने कहा कि किसी भी देश को अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा, आर्थिक शक्ति, सैन्य क्षमता और समुद्री शक्ति को मजबूत करना होगा क्योंकि संकट के समय कोई अन्य देश सहायता के लिए आगे आए, इसकी गारंटी नहीं होती.
उनके अनुसार यदि भारत को वैश्विक स्तर पर सम्मानजनक और प्रभावशाली शक्ति बनना है, आतंकवाद का मुकाबला करना है और किसी भी प्रकार के दबाव का सामना करना है, तो उसे सैन्य शक्ति, समुद्री शक्ति और आर्थिक शक्ति—तीनों को समान रूप से मजबूत करना होगा.
कमोडोर केसनूर ने कहा कि राष्ट्रीय हितों की रक्षा के लिए आत्मनिर्भरता, रणनीतिक सोच और दीर्घकालिक तैयारी ही सबसे महत्वपूर्ण आधार हैं.

