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Supreme Court: 21वीं सदी में AI यानी आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस काफी अहम हो चुका है. आम से लेकर खास तक इससे प्रभावित होने लगे है. इसके अनगिनत फायदे गिनाए जाते हैं, पर AI के इस्तेमाल से जुड़ा एक ऐसा मामला सामने आया है, जिससे गंभीर चिंता पैदा हो गई है.

ट्रायल कोर्ट के जज ने AI जेनरेटेड फर्जी फैसले को आधार बनाते हुए निर्णय सुना दिया. सुपीम कोर्ट ने इसपर संज्ञान लिया है. (फाइल फोटो)
नई दिल्ली. देश की सर्वोच्च अदालत ने न्यायिक प्रक्रिया में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) के दुरुपयोग पर कड़ा रुख अपनाते हुए कहा है कि यदि किसी अदालत का फैसला एआई से तैयार किए गए फर्जी या अस्तित्वहीन निर्णयों पर आधारित पाया जाता है, तो यह महज निर्णय में त्रुटि नहीं, बल्कि गंभीर दुराचार (मिसकंडक्ट) माना जाएगा, जिसके कानूनी परिणाम होंगे. सुप्रीम कोर्ट की दो जजों की पीठ ने ऐसे ही एक मामले में सख्त रुख अपनाया है. जस्टिस पीएस नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अराधे ने 27 फरवरी 2026 के अपने आदेश में कहा कि ट्रायल कोर्ट द्वारा कथित रूप से एआई जेनरेटेड, गैर-मौजूद या सिंथेटिक फैसलों पर भरोसा करना न्यायिक प्रक्रिया पर सीधा प्रहार है. अदालत ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि ऐसे गैर-अस्तित्व वाले और फर्जी निर्णयों पर आधारित फैसला निर्णय प्रक्रिया में त्रुटि नहीं, बल्कि दुराचार होगा और इसके कानूनी परिणाम होंगे.
सुप्रीम कोर्ट ने मामले की गंभीरता को देखते हुए अटॉर्नी जनरल आर. वेंकटरमणि, सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता और बार काउंसिल ऑफ इंडिया को नोटिस जारी किया है. साथ ही सीनियर एडवोकेट वरिष्ठ अधिवक्ता श्याम दीवान को इस मामले में कोर्ट की सहायता के लिए नियुक्त किया गया है. यह मुद्दा उस समय सामने आया जब सुप्रीम कोर्ट एक विशेष अनुमति याचिका पर सुनवाई कर रहा था, जिसमें आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट (Andhra Pradesh High Court) के जनवरी 2026 के आदेश को चुनौती दी गई थी. मामला एक दीवानी वाद (सिविल सूट) से संबंधित था, जिसमें विवादित संपत्ति पर निषेधाज्ञा (इंजंक्शन) की मांग की गई थी. सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि यह मामला केवल फैसले के गुण-दोष तक सीमित नहीं है, बल्कि न्यायिक निर्धारण की प्रक्रिया और उसकी विश्वसनीयता से जुड़ा एक संस्थागत चिंता का विषय है.
एआई जेनरेटेड फैसलों पर भरोसा
अदालत के समक्ष प्रस्तुत तथ्यों के अनुसार, ट्रायल कोर्ट ने विवादित संपत्ति की भौतिक स्थिति दर्ज करने के लिए एक अधिवक्ता आयुक्त (एडवोकेट कमिश्नर) नियुक्त किया था. याचिकाकर्ताओं ने अधिवक्ता आयुक्त की रिपोर्ट पर आपत्तियां दर्ज कराईं. हालांकि, अगस्त 2025 में ट्रायल कोर्ट ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया और अपने आदेश में कुछ न्यायिक निर्णयों का हवाला दिया. बाद में याचिकाकर्ताओं ने दावा किया कि जिन निर्णयों का उल्लेख किया गया, वे वास्तविक नहीं थे और एआई टूल्स की मदद से तैयार किए गए थे.
हाईकोर्ट ने दी चेतावनी, पर बरकरार रखा आदेश
सुप्रीम कोर्ट ने नोट किया कि हाईकोर्ट ने इस आपत्ति पर विचार किया और पाया कि जिन फैसलों का हवाला दिया गया था, वे एआई जेनरेटेड थे. हाईकोर्ट ने एक चेतावनी दर्ज करते हुए मामले का गुण-दोष के आधार पर निस्तारण किया और सिविल रिवीजन याचिका खारिज करते हुए ट्रायल कोर्ट के आदेश को बरकरार रखा. इसके बाद याचिकाकर्ताओं ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया. शीर्ष अदालत ने मामले की सुनवाई के लिए सहमति देते हुए नोटिस जारी किया और कहा कि विशेष अनुमति याचिका के निस्तारण तक ट्रायल कोर्ट अधिवक्ता आयुक्त की रिपोर्ट के आधार पर आगे की कार्यवाही न करे. मामले को 10 मार्च 2026 को अगली सुनवाई के लिए सूचीबद्ध किया गया है.
एआई के दुरुपयोग पर बढ़ती चिंता
इस बीच, 17 फरवरी 2026 को एक अलग मामले की सुनवाई के दौरान CJI सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने भी वकीलों द्वारा एआई टूल्स से तैयार याचिकाओं में गैर-मौजूद फैसलों का हवाला दिए जाने की प्रवृत्ति पर गंभीर चिंता जताई थी. अदालत ने विशेष रूप से ‘Mercy vs Mankind’ जैसे कथित निर्णयों का उल्लेख किया, जो वास्तविक न्यायिक रिकॉर्ड में मौजूद नहीं हैं. यह टिप्पणी एक जनहित याचिका (PIL) की सुनवाई के दौरान की गई थी, जिसमें राजनीतिक भाषणों को लेकर दिशानिर्देश तय करने की मांग की गई थी.
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बिहार, उत्तर प्रदेश और दिल्ली से प्रारंभिक के साथ उच्च शिक्षा हासिल की. झांसी से ग्रैजुएशन करने के बाद दिल्ली यूनिवर्सिटी से पत्रकारिता में PG डिप्लोमा किया. Hindustan Times ग्रुप से प्रोफेशनल कॅरियर की शु…और पढ़ें

