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मेरठ के बहसुमा क्षेत्र के फिरोजपुर गांव स्थित श्री सिद्ध पीठ शिव मंदिर की चोटी पर कई प्रयासों के बाद भी छत नहीं डल पाई, श्रद्धालु खुले आसमान में जलाभिषेक करते हैं. अभी तक अपने विभिन्न प्रकार के मंदिर देखे होंगे. जिनकी विशालकाय चोटी होती है लेकिन इस मंदिर की अगर बात की जाए तो यहां आज तक छत नहीं डाल पाई. उन्होंने कहा जहां भोले बाबा विराजमान है वहां जरूर आपको छोटा सा मंदिर देखने को मिलेगा. लेकिन उस मंदिर के चारों ओर जो घेरा है जहां अन्य भगवानों की मूर्ति विराजमान की गई है. उसके ऊपर कोई भी छत नहीं है. कई बार प्रयास किया गया.
मेरठ: यूं तो आपने विभिन्न प्रकार के ऐसे मंदिर देखे होंगे. जिनकी गोल आकार चोटी अपने आप में भव्य और दिव्य रूप को दर्शाती है. लेकिन पश्चिम उत्तर प्रदेश के मेरठ से लगभग 60 किलोमीटर दूर बहसुमा क्षेत्र के फिरोजपुर गांव स्थित श्री सिद्ध पीठ शिव मंदिर आज भी रहस्य बना हुआ है. क्योंकि यहां कई बार छत डालने के प्रयास किए गए, लेकिन उसके बावजूद भी मंदिर की चोटी पर छत नहीं डाल पाई है.
5000 साल पुरानी विरासत संजोए है हस्तिनापुर
शोभित विश्वविद्यालय के असिस्टेंट प्रोफेसर एवं हस्तिनापुर से संबंधित विभिन्न मामलों के एक्सपर्ट प्रियंक भारती ने लोकल18 से बताया कि हस्तिनापुर 5000 वर्ष पुरानी विरासत को आज भी सजोए हैं. उन्होंने बताया कि उसे समय हस्तिनापुर राजधानी के तौर पर जानी जाती थी. इसीलिए बहुत बड़ा क्षेत्रफल है जो विभिन्न जनपदों और राज्यों की सीमाओं से लगता है. इन्होंने बताया कि वह फिरोजपुर में जो भगवान भोलेनाथ का मंदिर है वहां की शिवलिंग स्वय शंभु है. क्योंकि एक लोकमान्यता हजारों वर्ष से जुड़ी हुई है कि ग्वाला गाय को चराने के लिए जाते थे. तो उन गायों में से एक गाय प्रतिदिन भगवान भोलेनाथ की शिवलिंग पर दूधभिषेक करने के लिए जाती थी. जिसमें की एक बार उस ग्वाले वाले ने गाय का पीछा किया. तब उसने यह नजारा देखा इसके बाद यहां मंदिर की स्थापना कराई गई.
मंदिर के ऊपर नहीं डल पा रही छत
उन्होंने बताया कि अभी तक अपने विभिन्न प्रकार के मंदिर देखे होंगे. जिनकी विशालकाय चोटी होती है लेकिन इस मंदिर की अगर बात की जाए तो यहां आज तक छत नहीं डाल पाई. उन्होंने कहा जहां भोले बाबा विराजमान है वहां जरूर आपको छोटा सा मंदिर देखने को मिलेगा. लेकिन उस मंदिर के चारों ओर जो घेरा है जहां अन्य भगवानों की मूर्ति विराजमान की गई है. उसके ऊपर कोई भी छत नहीं है. कई बार प्रयास किया गया. लेकिन उसमें सफलता नहीं मिली है. ऐसे में श्रद्धालु यहां खुले आसमान के नीचे ही भोले बाबा पर जलभिषेक करते हुए दिखाई देंगे. वहीं कावड़ यात्रा के दौरान तो यहां लाखों की संख्या में श्रद्धालु आते हैं.
बताते चलें कि यह तीर्थ स्थल के तौर पर अपनी विशेष पहचान रखता है. देश भर के विभिन्न राज्यों से लोग यहां पर भगवान भोलेनाथ के दर्शन करने के लिए पहुंचते हैं. इसके पास ही पुराना ही तालाब भी देखने को मिलेगा जिसकी आकृति उसकी हजारों साल पुरानी विरासत को दर्शाती है. साथ ही यहां एक पुराना कुआं भी मंदिर के मुख्य द्वार के पास ही बना हुआ है.
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मैं रजनीश कुमार यादव, 2019 से पत्रकारिता से जुड़ा हूं. तीन वर्ष अमर उजाला में बतौर सिटी रिपोर्टर काम किया. तीन वर्षों से न्यूज18 डिजिटल (लोकल18) से जुड़ा हूं. ढाई वर्षों तक लोकल18 का रिपोर्टर रहा. महाकुंभ 2025 …और पढ़ें

