अक्टूबर 1989 की वो गुलाबी ठंड वाली शाम दहशत के साये में घिर गई थी… भागलपुर जिले के छोटे-छोटे गांवों में हवा में धुआं और डर फैल गया था… उसी दौर में दूर-दूर तक रामशिला यात्रा का शोर था और लोग राम मंदिर के लिए ईंटें इकट्ठा कर रहे थे. जुलूस निकल रहे थे, लेकिन 24 अक्टूबर को भागलपुर के तातारपुर मोहल्ले में सरस्वती पूजा का एक जुलूस गुजरा, जिसे कुछ असामाजिक तत्वों ने रोक दिया था… तभी अचानक ही बम फूटने की खबर आई, खबर यह भी कि कुछ लोग घायल हुए… अफवाहें फैल गईं – “मुस्लिमों ने हमला किया”… दूसरी तरफ अफवाह- “हिंदू छात्रों को मार दिया गया”! दोनों बातें झूठी थीं, लेकिन आग लग गई… फिर क्या था.. अगले दिन से हिंसा की लहर दौड़ पड़ी. परबत्ता मोहल्ले में एक कुएं में दर्जनों लाशें मिलीं – कटी-फटी, बच्चे-बूढ़े सब… फिर तो गांव-गांव में इंसानियत खत्म हो गई.
भागलपुर के लोगाइन गांव, चंदेरी गांव , जगदीशपुर ब्लॉक … एसएसपी केएस द्विवेदी पर आरोप लगा कि उन्होंने हिंसा को रोकने की बजाय बढ़ावा दिया. दो महीने तक ये आग सुलगती रही. लोग भागते रहे और बच्चे मांओं की गोद में छिपते. तब केंद्र और राज्य में कांग्रेस की सरकार थी. प्रधानमंत्री राजीव गांधी आए, एसएसपी को हटाया, लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी. ये मंजर सिर्फ दंगा का नहीं था, माहौल इंसानियत के दफन होने का था. आज भी दंगा पीड़ित कई परिवार कहते हैं – ” वो भयावह मंजर हम भूल नहीं पाए”…
दंगे से प्रभावित एक बुजुर्ग महिला अपने घर के अंदर बैठी हैं. ये तस्वीर बाद में ली गईं लेकिन दंगों के बाद की स्थिति दिखाती हैं.
1989 के दंगों की पुरानी कहानी
भागलपुर दंगे 24 अक्टूबर 1989 से शुरू हुए और दो महीने तक चले. आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार करीब 1000 लोग मारे गए. 50 हजार लोग बेघर हुए. तब बिहार में कांग्रेस की सरकार थी और मुख्यमंत्री सत्येंद्र नारायण सिन्हा थे. पुलिस और प्रशासन पर निष्क्रियता के आरोप लगे. कई जगहों पर सामूहिक हत्याएं हुईं. कई परिवारों को पलायन करना पड़ गया और सालों तक इलाके में एक दूसरे के लिए लोगों में अविश्वास की स्थिति रही. बाद में भागलपुर दंगे का नाम लेकर जो राजनीति आगे बढ़ी उसने भी दूरी घटाई नहीं, बल्कि बढ़ा दी.
लालू यादव पर संरक्षण का आरोप
इसके बाद बिहार में सत्ता का दौर बदला लालू प्रसाद यादव 1990 में मुख्यमंत्री बने. दंगों के बाद मुस्लिम वोट कांग्रेस से उनकी ओर मुड़े, लेकिन आरोप लगा कि उन्होंने दंगाइयों को संरक्षण दिया क्योंकि कई आरोपी यादव समुदाय से थे. मुख्य आरोपी कामेश्वर यादव को 2004 में सोनपुर मेले में प्रशस्ति पत्र दिया गया जब लालू की सरकार थी. बाद में उन्हें दोषी ठहराया गया, लेकिन कई मामले लटके या रद्द हो गए. जेडीयू के नेता आरोप लगाते रहे हैं कि लालू यादव ने न्याय की प्रक्रिया को धीमा कर दिया. लालू यादव ने हमेशा बीजेपी और आडवानी पर आरोप लगाया, लेकिन उनके शासन में पीड़ितों को पूरा न्याय नहीं मिला.
भागलपुर दंगों के बाद घायल या प्रभावित लोग. (फोटो आर्काईव)
नीतीश सरकार की जांच और कार्रवाई
बिहार में सत्ता का दौर फिर बदला और नीतीश कुमार 2005 में सत्ता में आए, राज्य में एनडीए सरकार बनी. उन्होंने फरवरी 2006 में जस्टिस एनएन सिंह आयोग गठित किया और आयोग ने जांच एजेंसियों की भूमिका और राहत पर रिपोर्ट दी. अंतरिम रिपोर्ट 2007 में आई और अंतिम रिपोर्ट 2015 में विधानसभा में पेश हुई. नीतीश सरकार ने 27 पुराने मामले फिर से खोले. लोगाइन हत्याकांड में 14 लोगों को 2007 में दोषी ठहराया गया औ कामेश्वर यादव को आजीवन कारावास की सजा मिली. सरकार ने पीड़ितों के लिए मुआवजा पैकेज बढ़ाया. केंद्र से 30 करोड़ रुपये की सहायता दिलाई. 384 परिवारों को पेंशन दोगुनी कर दी गई. कई परिवारों को राहत पहुंची और जमीन वापस दिलाने की कोशिश हुई.
पीड़ितों को मुआवजा और राहत
नीतीश सरकार ने 844 परिवारों को मुआवजा वितरित किया और पेंशन बढ़ाकर हर महीने मदद दी. आयोग की सिफारिश पर 125 आईएएस और आईपीएस अधिकारियों पर कार्रवाई की बात कही गई. कांग्रेस सरकार की भूमिका को दोषी ठहराया गया. पीड़ितों को 1984 सिख दंगे वाले पैकेज के बराबर मुआवजा देने की सिफारिश की गई. कई परिवारों को आर्थिक मदद और पुनर्वास मिला. नीतीश कुमार ने कहा कि उनकी सरकार ने ही पहली बार पीड़ितों को न्याय दिलाने की ठोस कोशिश की.
दंगों से जुड़े इलाके में एक तालाब, जहां कई जगह लाशें फेंकी गई थीं. शांत लेकिन दर्द भरी यादें अब भी जेहन में जिंदा.
अब तक का अपडेट और स्थिति
हालांकि, आज 37 साल बाद भी कई पीड़ित कहते हैं कि पूरा न्याय नहीं मिला. कुछ परिवारों की जमीन अभी भी कब्जे में है. मुआवजा मिला लेकिन पुनर्वास अधूरा है. एनएन सिंह रिपोर्ट के कई सुझाव कागजों पर रह गए और कुछ मामले अदालतों में लंबित हैं. 2013 में पेंशन दोगुनी हुई, लेकिन अब भी कुछ परिवार राहत की मांग कर रहे हैं. बावजूद इसके तथ्य बताते हैं कि दंगे के बाद पहली ठोस कार्रवाई नीतीश काल में हुई. नीतीश कुमार की समृद्धि यात्रा में यह बयान इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि वे राज्यसभा जा रहे हैं और बिहार में नेतृत्व परिवर्तन की चर्चा है. यह पुरानी घटना को याद दिलाकर एनडीए सरकार की उपलब्धियों को बताता है, वहीं आने वाली नई सरकार को जिम्मेदारियों का अहसास भी करवाता है. सच यह भी तो है कि आज घटना के साढे तीन दशक बाद भी भागलपुर दंगे की कहानी बिहार की राजनीति का हिस्सा बनी हुई है.

