Last Updated:
India First: साल 1907 में कोलकाता के चौरंगी इलाके में शुरू हुआ एलफिंस्टन पिक्चर पैलेस भारत का पहला सिनेमा हॉल था. पारसी कारोबारी जेएफ मदन द्वारा स्थापित यह थिएटर बाद में चैपलिन सिनेमा बना. कभी राजशाही ठाट-बाट का गवाह रहा यह ऐतिहासिक हॉल 119 साल बाद कैसा है?
एलफिंस्टन पिक्चर पैलेस की फाइल फोटो. (Credit- सोशल मीडिया)
India First: आज भारत में छोटे-बड़े शहरों में मल्टीप्लेक्स खुल चुके हैं, जहां दर्शक अपने परिवार के साथ बैठकर फिल्म देखने का मजा लेता है. लेकिन इससे पहले लोग फिल्म देखने के लिए सिनेमा हॉल का रुख करते थे. ऐसे में क्या आप जानते हैं कि भारत का पहला सिनेमा हॉल कहां बना था, जहां राजा-महाराजाओं ने भी फिल्में देखी थीं? आज जब देशभर में मल्टीप्लेक्स और ओटीटी प्लेटफॉर्म मनोरंजन का प्रमुख माध्यम बन चुके हैं, तब शायद ही किसी को याद हो कि भारत का पहला स्थायी सिनेमा हॉल कहां था. ऐसे में बता दें कि वो सिनेमा हॉल कोलकाता के चौरंगी इलाके की कभी शान हुआ करता था, लेकिन अब सिर्फ इतिहास के पन्नों में दर्ज होकर रह गया है. 20वीं सदी की शुरुआत में सिनेमा भारत के लिए बिल्कुल नया अनुभव था. उस समय फिल्मों का प्रदर्शन स्थायी इमारतों में नहीं, बल्कि तंबुओं और अस्थायी बायोस्कोप के जरिए किया जाता था. ऐसे दौर में पारसी उद्योगपति जमशेदजी फ्रामजी मदन (जेएफ मदन) ने एक बड़ा सपना देखा और भारत का पहला थिएटर बना डाला.
जेएफ मदन ने साल 1907 में कोलकाता के 5/1 चौरंगी प्लेस पर एलफिंस्टन पिक्चर पैलेस की स्थापना की थी. इसे भारत का पहला ऐसा स्थायी सिनेमा हॉल माना जाता है, जिसे विशेष रूप से फिल्में दिखाने के उद्देश्य से बनाया गया था. लेकिन जेएफ मदन ने केवल एक सिनेमा हॉल तक खुद को सीमित नहीं रखा. आगे चलकर उन्होंने मदन थिएटर्स के नाम से भारत, बर्मा (अब म्यांमार) और श्रीलंका तक में सिनेमाघरों का बड़ा नेटवर्क खड़ा किया. बता दें कि उस समय एलफिंस्टन पिक्चर पैलेस आधुनिक सुविधाओं और शानदार वास्तुकला के लिए जाना जाता था. यूरोपीय शैली में बने इस थिएटर की भव्य सजावट, नक्काशीदार खंभे और आरामदायक मखमली सीटें लोगों को आकर्षित करती थीं. यहां फिल्म देखना केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि एक खास अनुभव माना जाता था. मूक फिल्मों के दौर में इस थिएटर की एक और खास पहचान थी.
दरअसल, हॉल में मौजूद लाइव ऑर्केस्ट्रा फिल्मी दृश्य के अनुसार संगीत बजाता था, जिससे दर्शकों को फिल्में और भी जीवंत लगती थीं. करीब 1,700 दर्शकों की क्षमता वाले इस सिनेमाघर में उस दौर के ब्रिटिश अधिकारी, बंगाल के राजा-महाराजा और समाज के प्रतिष्ठित लोग फिल्में देखने आते थे. कहा जाता है कि महान अभिनेता उत्तम कुमार के पिता भी इसी थिएटर में प्रोजेक्टर ऑपरेटर के रूप में काम कर चुके थे. समय के साथ फिल्म तकनीक में बदलाव आया और मूक फिल्मों की जगह बोलती फिल्मों ने ले ली. वर्ष 1929 में एलफिंस्टन पिक्चर पैलेस एशिया का पहला ऐसा सिनेमा हॉल बना, जहां स्थायी साउंड सिस्टम लगाया गया. इससे भारतीय दर्शकों को पहली बार आधुनिक साउंड तकनीक के साथ फिल्में देखने का अवसर मिला. बाद में स्वामित्व बदलने के बाद इस थिएटर का नाम पहले आरकेओ एलफिंस्टन और फिर मिनर्वा सिनेमा रखा गया.
मिनर्वा के नाम से यह थिएटर कई दशकों तक हॉलीवुड और हिंदी फिल्मों के दर्शकों के बीच लोकप्रिय बना रहा. लेकिन 1960 और 1970 के दशक में कोलकाता की बदलती सामाजिक और राजनीतिक परिस्थितियों का असर इस ऐतिहासिक थिएटर पर भी पड़ा. शहर में बढ़ते आंदोलन, हिंसक घटनाओं और शाम के समय असुरक्षा के माहौल के कारण लोगों ने सिनेमाघरों का रुख कम करना शुरू कर दिया. धीरे-धीरे दर्शकों की संख्या घटी और थिएटर की आर्थिक स्थिति कमजोर होती चली गई. रखरखाव के अभाव में यह भव्य इमारत धीरे-धीरे जर्जर होने लगी. बाद में कोलकाता नगर निगम ने इस इमारत का अधिग्रहण किया. महान हास्य अभिनेता चार्ली चैपलिन की जन्म शताब्दी के अवसर पर इसका नवीनीकरण कराया गया और इसका नाम चैपलिन सिनेमा रखा गया.
कुछ समय तक यह फिर से दर्शकों को आकर्षित करने में सफल रहा, लेकिन बदलते दौर में सिंगल स्क्रीन थिएटरों की लोकप्रियता लगातार घटती गई. मल्टीप्लेक्स संस्कृति के बढ़ते प्रभाव और प्रशासनिक उपेक्षा के चलते यह ऐतिहासिक सिनेमाघर आखिरकार बंद हो गया. करीब एक सदी तक भारतीय सिनेमा के इतिहास का गवाह रहा यह थिएटर 2000 के दशक में पूरी तरह वीरान हो गया. आखिरकार दिसंबर 2013 में कोलकाता नगर निगम ने इस ऐतिहासिक इमारत को ध्वस्त कर दिया. इसके साथ ही भारतीय सिनेमा के शुरुआती दौर की एक महत्वपूर्ण पहचान हमेशा के लिए खत्म हो गई. आज जहां कभी भारत के पहले स्थायी सिनेमा हॉल में दर्शकों की भीड़ उमड़ती थी, वहां केवल खाली जगह बची है. हालांकि, इमारत अब मौजूद नहीं है, लेकिन एलफिंस्टन पिक्चर पैलेस का नाम भारतीय सिनेमा के इतिहास में हमेशा एक महत्वपूर्ण अध्याय के रूप में याद किया जाएगा.
About the Author
न्यूज़18 हिंदी (Network 18) डिजिटल में सीनियर एसोसिएट एडिटर के तौर कार्यरत. इंटरनेशनल, वेब स्टोरी, ऑफबीट, रिजनल सिनेमा के इंचार्ज. डेढ़ दशक से ज्यादा समय से मीडिया में सक्रिय. नेटवर्क 18 के अलावा टाइम्स ग्रुप, …और पढ़ें

