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Jamui Khaira Naxal attack 2012: स्थानीय पत्रकार सत्येंद्र सिंह भूषण बताते है कि यह 22 मार्च 2012 की बात है. बिहार दिवस के अवसर पर पूरे प्रखंड कार्यालय को सजाया गया था. परिसर का माहौल उत्सव जैसा था. शाम ढलने के साथ ही लोगों की आवाजाही कम होने लगी थी, तभी नक्सलियों ने अपने मंसूबों को अंजाम दिया. उनके अनुसार, नक्सलियों ने प्रखंड कार्यालय परिसर में दो केन बम लगाए थे. इनमें से एक किसी वजह से निष्क्रिय रहा, लेकिन दूसरा बम फट गया. धमाका इतना जोरदार था कि उसकी आवाज पूरे इलाके में गूंज उठी.
जमुईः जिले के खैरा प्रखंड कार्यालय में इन दिनों रोजाना सैकड़ों लोगों की आवाजाही रहती है. गिद्धेश्वर पहाड़ की तलहटी में स्थित इस परिसर में विभिन्न विभागों के दफ्तर हैं. कोई प्रमाण पत्र बनवाने आता है, कोई पेंशन से जुड़ी जानकारी लेने तो कोई किसी सरकारी योजना के काम से. दिनभर यहां लोगों की भीड़ बनी रहती है.
पहली नजर में यह एक सामान्य सरकारी कार्यालय जैसा ही दिखता है और अपने चारों ओर फैले सुंदर वन क्षेत्र के लिए भी जाना जाता है. लेकिन इस रौनक के बीच एक ऐसी घटना की स्मृति भी दबी हुई है, जिसे खैरा के लोग आज तक भुला नहीं पाए हैं. यह उस रात की कहानी है, जब बिहार दिवस के उत्सव की तैयारियों के बीच पूरा प्रखंड कार्यालय आग और धमाकों से दहल उठा था.
बिहार दिवस के दिन ही हुआ था हमला
स्थानीय पत्रकार सत्येंद्र सिंह भूषण बताते है कि यह 22 मार्च 2012 की बात है. बिहार दिवस के अवसर पर पूरे प्रखंड कार्यालय को सजाया गया था. परिसर का माहौल उत्सव जैसा था. शाम ढलने के साथ ही लोगों की आवाजाही कम होने लगी थी, तभी नक्सलियों ने अपने मंसूबों को अंजाम दिया. उनके अनुसार, नक्सलियों ने प्रखंड कार्यालय परिसर में दो केन बम लगाए थे. इनमें से एक किसी वजह से निष्क्रिय रहा, लेकिन दूसरा बम फट गया. धमाका इतना जोरदार था कि उसकी आवाज पूरे इलाके में गूंज उठी.
धमाके के बाद धधक उठा मुख्य भवन
सत्येंद्र के मुताबिक विस्फोट के तुरंत बाद मुख्य भवन आग की लपटों में घिर गया. आग और धमाके से भवन को भारी नुकसान पहुंचा और उसका बड़ा हिस्सा ढह गया. कार्यालय में रखे कई महत्वपूर्ण दस्तावेज, रिकॉर्ड और कागजात जलकर खाक हो गए. सत्येंद्र सिंह भूषण उन चंद लोगों में शामिल थे, जो सबसे पहले घटनास्थल पर पहुंचे. उन्होंने पूरी घटना को करीब से देखा और इसकी रिपोर्टिंग की.
पूरी रात चलता रहा आतंक
सत्येंद्र बताते है कि घटना यहीं पर खत्म नहीं हुई. प्रखंड कार्यालय पर हमला करने के बाद नक्सली बड़ीबाग घाट की ओर बढ़े और वहां एक दर्जन से अधिक ट्रकों को आग के हवाले कर दिया. इसके बाद ललदैया कॉजवे पुल को भी विस्फोट कर उड़ा दिया. उस रात खैरा और आसपास के इलाकों में दहशत और अनिश्चितता का माहौल था.
हालांकि समय के साथ हालात बदल गए. नक्सली घटनाएं अब अतीत की बात बन चुकी है और पूरा क्षेत्र सामान्य जीवन की ओर लौट चुका है. नया प्रशासनिक ढांचा खड़ा हो गया है, सरकारी कामकाज नियमित रूप से चल रहा है और लोग अपने रोजमर्रा के कामों में व्यस्त हैं. इसके बावजूद प्रखंड कार्यालय परिसर में मौजूद पुराने भवन के अवशेष और उस दौर को याद रखने वाले लोगों की स्मृतियां आज भी उस भयावह रात की गवाही देती हैं.
खैरा की नई पीढ़ी शायद उस घटना को केवल किस्सों में सुनती हो, लेकिन जिन्होंने वह रात अपनी आंखों से देखी, उनके लिए 22 मार्च 2012 सिर्फ एक तारीख नहीं, बल्कि डर और बदलते समय की ऐसी कहानी है, जो आज भी उनके मन में ताजा है.

