पटना. बिहार की राजनीति में लालू प्रसाद यादव सिर्फ एक नाम नहीं, बल्कि एक दौर हैं-जहां सत्ता, संघर्ष, विवाद और जनसमर्थन चारों बराबर मौजूद रहे. कभी बिहार की राजनीति पर निर्विवाद दबदबा रखने वाले लालू आज भले ही कानूनी दायरे और जेल की सज़ा के बीच सीमित हैं, लेकिन उनकी राजनीतिक यात्रा ऐसी है जिसमें उतार-चढ़ाव, अडिगता और अप्रत्याशित मोड़ हमेशा साथ रहे हैं.वर्तमान बिहार की राजनीति में एक बार फिर लालू यादव और उनका परिवार केंद्र में है. बिहार चुनाव में हार की पीड़ा से जूझ रहा यह परिवार इस बार कारण पूर्व मुख्यमंत्री राबड़ी देवी के 10 सर्कुलर रोड स्थित सरकारी आवास को खाली करने के आदेश से दुखी है. सरकार का कहना है कि यह प्रक्रिया नियम के तहत है, लेकिन राजद इसे राजनीतिक बदले की कार्रवाई बता रही है. इस आदेश के साथ ही राजनीतिक माहौल और संवेदनशील हो गया है, क्योंकि इस समय लालू परिवार पहले से ही कई मोर्चों पर चुनौती झेल रहा है.
लालू यदव का ‘मौन’ चर्चा में क्यों?
क्या फिर वही 2010 वाला दौर ?
इतिहास दोहराएगा या बदलेगा?
आज स्थिति 2010 से अलग भी है और बेहद समान भी. तब हार थी और आज भी हार है. तब कानूनी जांचें थीं आज भी हैं. तब परिवार में राजनीतिक असहमति नाम की चीज नहीं थी मगर अब यह और तीखी है. मगर तब लालू जवान थे, आज बीमार और राजनीति से थके हुए हैं. इस बीच बंगला खाली कराने का आदेश सिर्फ प्रशासनिक प्रक्रिया नहीं, बल्कि राजनीतिक संकेतों की भाषा भी माना जा रहा है.। सवाल यह है-क्या यह संदेश विपक्ष के लिए है या राजद परिवार के लिए? राजनीति के जानकारों का मानना है कि आने वाले महीनों में यह मामला पहले से कमजोर होती राजद राजनीति पर और असर डालेगा.
क्या 2025 फिर 2010 दोहरा रहा है?
राजनीति के जानकार कहते हैं कि लालू यादव का राजनीतिक सफर कई मायनों में अनोखा है, जहां सत्ता खोने के बाद भी जनाधार नहीं टूटा, आलोचनाओं के बीच भी समर्थकों का विश्वास बना रहा और हार के बाद भी वापसी की उम्मीद हमेशा ज़िंदा रही. 2010 का वह दौर, जब वे राजनीतिक सदमे में चुपचाप साइडलाइन हो गए थे, यह साबित करता है कि सबसे मजबूत नेता भी कभी-कभी खुद को नए सिरे से समझने के लिए समय लेते हैं. 2015 वापसी की और फिर दौर बदला है, अब 2025 में फिर 2010 का दौर आ गया!
लालू के राजनीतिक मौन पर उठे सवाल!
2025 में आज जब बिहार की राजनीति नए समीकरण गढ़ रही है, एक सवाल फिर उभर रहा है-क्या लालू फिर किसी रूप में वापसी कर सकते हैं या उम्र के इस पड़ाव पर इतिहास 2010 की तरह उनके मौन को राजनीतिक विराम मान चुका है? समय इसका जवाब जरूर देगा, लेकिन एक बात तय है लालू यादव बिहार की राजनीति की कहानी में सिर्फ एक अध्याय नहीं, बल्कि पूरी किताब हैं. कहा जाता है कि 2010 में अंत में राबड़ी देवी ने ही उन्हें राजनीतिक मंच पर वापस लाने में भूमिका निभाई थी. लेकिन सवाल यह कि क्या वह इस बार भी वैसा कर पाएंगी?

