नई दिल्ली: पूर्व सेना प्रमुख जनरल वीके सिंह ने भारत की सामरिक नीति का दूरगामी खाका पेश किया. न्यूज 18 डेफकॉन 2026 के मंच से उन्होंने रेखांकित किया कि सैन्य ताकत का मकसद केवल सीमा पर युद्ध लड़ना नहीं है, बल्कि कूटनीतिक दबाव से युद्ध को टालना भी है. आधुनिक भू-राजनीति में मिलिट्री डिप्लोमेसी देश की राष्ट्रीय शक्ति का सबसे बड़ा रणनीतिक माध्यम बनकर उभरी है. अब वक्त आ चुका है जब भारत अपनी पुरानी रक्षा नीतियों से बाहर निकले. उन्होंने जोर दिया कि डिफेंस अटाशे की भूमिका सिर्फ औपचारिक बैठकों तक सीमित नहीं रहनी चाहिए. भारत को अगले कुछ सालों में 140 देशों तक अपनी सैन्य पहुंच बनानी होगी. तकनीक, डिफेंस एक्सपोर्ट, साझा अभ्यास और रणनीतिक सूचना तंत्र को मिलाकर भारत को अपनी वैश्विक पकड़ हर हाल में मजबूत करनी होगी. पढ़िए, उनके संबोधन की बड़ी बातें.
क्या सिर्फ जंग लड़ना ही सेना का काम है?
पारंपरिक सोच हमेशा से सेना को युद्ध के मैदान तक सीमित मानती आई है. जनरल वीके सिंह ने इस धारणा पर कड़ा प्रहार किया. उनका मानना है कि वास्तविक सैन्य ताकत वह है, जो जंग की नौबत ही न आने दे.
सैन्य कूटनीति के जरिए रणनीतिक डिटरेंस पैदा किया जा सकता है. जब कोई देश अपनी सैन्य क्षमता का असरदार प्रदर्शन अंतरराष्ट्रीय स्तर पर करता है, तो दुश्मन हमला करने से पहले सौ बार सोचता है. आज की दुनिया में बिना गोली चलाए भी अपनी सुरक्षा सुनिश्चित की जा सकती है.
भारत को अपनी विदेश नीति और रक्षा नीति को अलग-अलग चश्मे से देखना बंद करना होगा. दोनों नीतियां जब एक साथ मिलकर काम करेंगी, तभी भारत अंतरराष्ट्रीय मंच पर एक मजबूत महाशक्ति बनकर उभरेगा. सुरक्षा समझौते और संयुक्त युद्धाभ्यास कूटनीति की सबसे मजबूत रीढ़ होते हैं.
पुराने ढर्रे के डिफेंस अटाशे मॉडल में बदलाव क्यों जरूरी है?
- दशकों से दूतावासों में तैनात डिफेंस अटाशे केवल निगरानी, रिपोर्टिंग और स्वागत कार्यक्रमों तक सीमित रहे हैं. जनरल वीके सिंह ने इस व्यवस्था को पूरी तरह बदलने की जोरदार वकालत की है.
- नए दौर में सैन्य राजनयिकों को रणनीतिक परिणाम देने होंगे. उनका मुख्य काम विदेशी धरती पर भारत के हितों की रक्षा करना और सुरक्षा सहयोग का दायरा बढ़ाना है. डिफेंस अटाशे को केवल सैन्य ज्ञान नहीं, बल्कि कूटनीतिक कौशल और ग्लोबल राजनीति की गहरी समझ होनी चाहिए.
- सैन्य अफसरों को जिस देश में भेजा जाए, वहां की स्थानीय भाषा और राजनीतिक मिजाज की पूरी पकड़ होनी चाहिए. भाषा कोई दिखावे का माध्यम नहीं है, यह रणनीतिक असर पैदा करने की बड़ी क्षमता है. जब अफसर स्थानीय भाषा में बात करेंगे, तो साझेदारी कहीं ज्यादा मजबूत होगी.
140 देशों में भारत कैसे बुनेगा अपना अभेद्य सुरक्षा चक्रव्यूह?
जनरल वीके सिंह ने भारत की रक्षा पहुंच को बड़े पैमाने पर विस्तार देने का व्यावहारिक रोडमैप सामने रखा है. उन्होंने हब एंड स्पोक मॉडल अपनाने की वकालत की है.
भारत को अगले 5 से 7 वर्षों में करीब 80 से 90 डिफेंस विंग स्थापित करने चाहिए. इस तंत्र के जरिए लगभग 130 से 140 देशों तक भारत की सीधी पहुंच बन जाएगी. इसमें रणनीतिक और उभरते साझेदार देशों के लिए अलग-अलग स्तर पर काम होगा.
इस पूरे सिस्टम को चलाने के लिए 150 से 200 बेहद प्रशिक्षित सैन्य राजनयिकों का कोर ग्रुप तैयार करना होगा. इन अधिकारियों को पर्याप्त अधिकार, जरूरी बजट और निर्णय लेने की आजादी दी जानी चाहिए. जब तक जमीन पर वास्तविक उपस्थिति नहीं होगी, तब तक अंतरराष्ट्रीय प्रभाव नहीं बन सकता.
डिफेंस एक्सपोर्ट और तकनीक से कैसे बनेगी धाक?
भारत आज रक्षा उत्पादन के क्षेत्र में तेजी से आत्मनिर्भर हो रहा है. यह बदलाव दुनिया के सामने भारत की नई ताकत पेश करने का शानदार अवसर है.
डिफेंस डिप्लोमेसी को सीधे रक्षा निर्यात से जोड़ा जाना चाहिए. भारत में बने स्वदेशी मिसाइल सिस्टम, आर्टिलरी गन, नेवल प्लेटफॉर्म और आधुनिक ड्रोन आज दुनिया के कई देशों की जरूरत हैं. डिफेंस अटाशे को इन सभी हथियारों की तकनीकी खूबियों की पूरी जानकारी होनी चाहिए.
सैन्य राजनयिकों को मेजबान देशों की सुरक्षा जरूरतों को समझकर उन्हें भारतीय रक्षा उत्पाद अपनाने के लिए प्रेरित करना होगा. इसका मतलब यह कतई नहीं है कि कूटनीति को केवल हथियार बेचने की दुकान बना दिया जाए. मकसद रक्षा तकनीक में को-डेवलपमेंट और को-प्रोडक्शन की मजबूत साझेदारी कायम करना होना चाहिए.
हिंद महासागर से अफ्रीका तक भारत कैसे साधेगा अपना हित?
- ग्लोबल साउथ में प्रभाव बढ़ाने की होड़ मची हुई है. चीन जैसे देश लगातार छोटे देशों को अपने प्रभाव में लेने की कोशिश कर रहे हैं. ऐसे में भारत हाथ पर हाथ रखकर नहीं बैठ सकता.
- भारतीय नौसेना की मौजूदगी आज पूरे हिंद महासागर में स्थिरता की गारंटी बन चुकी है. पोर्ट कॉल, शिप विजिट, एंटी पायरेसी ऑपरेशन और मैरिटाइम डोमेन अवेयरनेस से तटीय देशों के साथ रिश्ते मजबूत हो रहे हैं. आपदा प्रबंधन और राहत कार्यों में भारतीय सेना का मानवीय चेहरा दुनिया देख चुकी है.
- भारत के पास हिंद महासागर से लेकर दक्षिण-पूर्व एशिया, मध्य एशिया, मिडिल ईस्ट और अफ्रीका तक सुरक्षा साझेदारियां बढ़ाने की असीम क्षमता है. भारत की बढ़ती ताकत किसी भी देश के लिए खतरा नहीं है. भारत हमेशा नियम आधारित व्यवस्था और क्षेत्रीय शांति का पक्षधर रहा है.
गोपनीयता के नाम पर सूचना का खालीपन कितना घातक है?
सुरक्षा के नाम पर रणनीतिक संवाद को बंद कमरों में कैद रखना भारी नुकसान पहुंचा सकता है. जरूरत से ज्यादा गोपनीयता रखने से सूचना का खालीपन पैदा होता है. जब आप अपनी बात खुद दुनिया के सामने नहीं रखते, तो विरोधी देश उस खाली जगह को अपने मनगढ़ंत नैरेटिव से भर देते हैं. अंतरराष्ट्रीय स्तर पर देश की सही छवि बनाना भी रक्षा कूटनीति का ही हिस्सा है. इसके लिए पत्रकारों और विचारकों को भी रणनीतिक इकोसिस्टम से जोड़ना बेहद जरूरी है.
साइबर वारफेयर, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, ड्रोन वॉर और स्पेस टेक्नोलॉजी के इस दौर में इंफॉर्मेशन वारफेयर सबसे बड़ा मोर्चा है. भारत को अपनी बात पूरी मजबूती, स्पष्टता और आत्मविश्वास के साथ दुनिया के सामने रखनी होगी. मजबूत मिलिट्री डिप्लोमेसी ही 21वीं सदी के भारत को विश्व मंच पर अग्रणी बनाएगी.

